लेखक – मदन मोहन भास्कर
कुर्सी और पद हमेशा सम्मान के प्रतीक माने जाते हैं। कोई व्यक्ति जब किसी ऊँचे पद पर पहुँचता है तो लोग उससे उम्मीद करते हैं कि वह न्यायप्रिय होगा, संवेदनशील होगा और अपने अधीन काम करने वाले कर्मचारियों के साथ सम्मानजनक व्यवहार करेगा। लेकिन दुर्भाग्य की बात यह है कि कुछ लोग कुर्सी पर बैठते ही खुद को कानून, व्यवस्था और इंसानियत से ऊपर समझने लगते हैं। उनके लिए पद सेवा का माध्यम नहीं, बल्कि घमंड और तानाशाही का हथियार बन जाता है। ऐसे लोग अपने पद की ताकत का इस्तेमाल लोगों को प्रेरित करने के लिए नहीं, बल्कि उन्हें दबाने के लिए करते हैं। उनके कार्यालय में अनुशासन कम और भय का माहौल ज्यादा दिखाई देता है। कर्मचारी अपनी योग्यता से नहीं, बल्कि अधिकारी के मूड से काम करने को मजबूर होते हैं। वहाँ सम्मान नहीं, सिर्फ आदेश चलते हैं। आवाज़ उठाना तो दूर, कोई अपनी परेशानी तक खुलकर नहीं बता पाता। आज के दौर में यह समस्या कई संस्थानों और विभागों में देखने को मिलती है। कुछ अधिकारी खुद को इतना बड़ा समझने लगते हैं कि उन्हें अपने कर्मचारियों की मेहनत, उनकी भावनाएँ और उनकी समस्याएँ दिखाई ही नहीं देतीं। वे भूल जाते हैं कि किसी भी संस्था की असली ताकत उसके कर्मचारी होते हैं। अगर कर्मचारी मानसिक रूप से प्रताड़ित होंगे, तो संस्था कभी मजबूत नहीं बन सकती। एक शायरी याद आती है कि – कुर्सी मिली तो लहजा बदल गया उनका,
हर बात में बस हुक्म निकल गया उनका,
जो कल तक इंसानियत की बातें करते थे,
आज हर बात पर घमंड दिखता उनका।
ऐसे तानाशाही प्रवृत्ति वाले लोग अक्सर अपने कर्मचारियों से बर्बरता पूर्वक व्यवहार करते हैं। छोटी-छोटी गलतियों पर सार्वजनिक अपमान, सबके सामने डाँटना, मानसिक दबाव बनाना और हर समय डर का वातावरण बनाए रखना उनकी आदत बन जाती है। उन्हें लगता है कि कठोरता ही नेतृत्व की पहचान है, जबकि सच्चाई इससे बिल्कुल उलट है। एक अच्छा नेता या पदाधिकारी वह होता है जो अपनी टीम को साथ लेकर चले, उनका मनोबल बढ़ाए और मुश्किल समय में उनके साथ खड़ा रहे। दुखद बात यह है कि ऐसे अधिकारी अपनी आलोचना सुनना भी पसंद नहीं करते। जो कर्मचारी सच बोलने की कोशिश करता है, उसे निशाना बनाया जाता है। कभी ट्रांसफर का डर, कभी नौकरी का दबाव, तो कभी किसी भी बात पर सवाल उठाकर उसे चुप कराने की कोशिश की जाती है। यह व्यवहार केवल व्यक्ति विशेष का नहीं, बल्कि पूरे कार्य वातावरण का नुकसान करता है। कुर्सी का नशा इंसान को अंधा बना देता है। उसे लगता है कि उसकी शक्ति हमेशा बनी रहेगी, लेकिन इतिहास गवाह है कि तानाशाही कभी स्थायी नहीं होती। जो लोग अपने पद का दुरुपयोग करते हैं, वे कुछ समय के लिए लोगों को डरा सकते हैं, लेकिन दिलों में सम्मान कभी हासिल नहीं कर सकते। क्योंकि जिन्हें अपने पद पर बहुत गुरूर होता है,
वक्त का पहिया उनसे भी जरूर होता है।
आज जो दूसरों को झुकाने में लगे हैं,
कल उनका भी हिसाब भरपूर होता है। किसी भी संस्था में कर्मचारियों का सम्मान सबसे महत्वपूर्ण होता है। एक सम्मानजनक व्यवहार कर्मचारियों में ऊर्जा भर देता है, जबकि अपमानजनक व्यवहार उनकी कार्यक्षमता को खत्म कर देता है। जब किसी कर्मचारी को बार-बार नीचा दिखाया जाता है, उसे मानसिक प्रताड़ना दी जाती है,उसकी मेहनत की कद्र नहीं की जाती और उसे इंसान नहीं बल्कि मशीन समझा जाता है, तब वह अंदर से टूटने लगता है। फिर वह वो करने के लिए मजबुर हो जाता है जो वह नहीं करना चाहता। आज आवश्यकता इस बात की है कि पद पर बैठे लोग यह समझें कि कुर्सी स्थायी नहीं होती। आज जो अधिकारी है, कल वह आम इंसान भी हो सकता है। इसलिए शक्ति का प्रदर्शन करने के बजाय संवेदनशीलता और नेतृत्व क्षमता दिखाना जरूरी है। जो व्यक्ति अपने कर्मचारियों को सम्मान देता है, वही असली अर्थों में बड़ा अधिकारी कहलाने योग्य होता है। कई बार देखा जाता है कि ऐसे तानाशाही मानसिकता वाले लोग अपने आसपास चापलूसों की भीड़ बना लेते हैं। सच बोलने वाले उनसे दूर हो जाते हैं और सिर्फ हाँ में हाँ मिलाने वाले लोग उनके करीब रह जाते हैं। धीरे-धीरे उन्हें वास्तविकता दिखाई देना बंद हो जाती है। वे खुद को सर्वश्रेष्ठ समझने लगते हैं और यही उनका सबसे बड़ा पतन बन जाता है। समाज और संस्थाओं को ऐसे व्यवहार के खिलाफ आवाज़ उठानी चाहिए। कर्मचारियों का मानसिक सम्मान और सुरक्षित कार्य वातावरण उनका अधिकार है। किसी को भी यह अधिकार नहीं कि वह अपने पद की ताकत से किसी का आत्मसम्मान कुचल दे। अंत में बस इतना कहना उचित होगा कि पद बड़ा नहीं होता, बड़ा होता है व्यवहार,
सम्मान बाँटने वाला ही बनता है असली सरदार,
जो कुर्सी के दम पर इंसानियत भूल जाते हैं,
वक्त उन्हें आईना जरूर दिखाते हैं। एक सच्चा अधिकारी वही है जो अपनी टीम को परिवार की तरह माने, उनके दुख-सुख को समझे और अपने पद को सेवा का माध्यम बनाए, न कि तानाशाही का हथियार।

