मूकनायक/राष्ट्रीय प्रभारी ओमप्रकाश वर्मा
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प्रकृति में जब कोई वृक्ष का पत्ता अपना असली रंग (हरापन) खोकर पीला या भूरा पड़ने लगता है, तो वह यह संकेत देता है कि अब उसका टहनी से जुड़े रहने का सामर्थ्य खत्म हो चुका है। ठीक उसी तरह, जब कोई इंसान आपके प्रति अपना स्वभाव बदलता है, अपनी निष्ठा बदलता है, तो वह मानसिक रूप से आपसे पहले ही अलग हो चुका होता है। किसी लेखक ने बहुत सटीक कहा है कि “पत्तों ने जब भी रंग बदला है, हमेशा जमीन पर ही गिरे हैं।” जो लोग अपनी जड़ों (रिश्तों और मूल्यों) को छोड़कर रंग बदलते हैं, वे अंततः अपने अस्तित्व की ऊँचाई खो देते हैं। जिस तरह जमीन पर गिरा पत्ता धीरे-धीरे धूल में मिल जाता है, उसी तरह अस्थिर स्वभाव वाले लोग भी समय के साथ अपनी महत्ता खो देते हैं।
इसलिए जब कोई बदल जाए, तो आंसू बहाने के बजाय उसे विदा करना बेहतर है। उदाहरण के तौर पर, पेड़ जब पुराने पत्ते गिराता है, तभी उस पर नई और ताजी कोपलें आती हैं। आपके जीवन से भी एक इंसान का जाना, किसी बेहतर और सच्चे इंसान के आने की जगह बनाता है क्योंकि मुरझाए हुए पत्ते टहनी पर केवल बोझ होते हैं। जो इंसान आपके साथ दिल से नहीं जुड़ा, उसका साथ आपके विकास को रोक देता है। इसलिए स्वयं की जड़ों को मजबूत रखें, हवाएं चलेंगी और पत्ते रंग भी बदलेंगे, यह आपके हाथ में नहीं है। आपके हाथ में बस इतना है कि आप उस ‘पेड़’ की तरह अडिग रहें, जिसकी जड़े जमीन में गहरी हैं। जो बदल गए, उन्हें उनके हाल पर छोड़़ दीजिए। याद रखिए, गिरता वही है जो अपनी मौलिकता खो देता है। ”जो आपका है, वह कभी बदलेगा नहीं; और जो बदल गया, वह कभी आपका था ही नहीं।”
बिरदी चंद गोठवाल
प्रदेश प्रभारी मूकनायक, हरियाणा

