मूकनायक/रिपोर्टर इंद्रसेन गौतम बस्ती/ उत्तर प्रदेश
बस्ती। जनपद के सल्टौआ ब्लॉक स्थित सामुदायिक स्वास्थ्य केंद्र (CHC) अमरौली सुमावली की बदहाल व्यवस्था ने सरकारी स्वास्थ्य सेवाओं के दावों की पोल खोल दी है। एक ओर सरकार बेहतर और सुलभ स्वास्थ्य सुविधाएं देने की बात करती है, वहीं दूसरी ओर इस सीएचसी की जमीनी हकीकत बेहद चिंताजनक बनी हुई है। यहां विकास केवल कागजों तक सीमित नजर आता है, जबकि मरीजों को बुनियादी सुविधाओं के लिए भी जूझना पड़ रहा है।
अस्पताल में स्थापित एक्स-रे मशीन इस अव्यवस्था का सबसे बड़ा उदाहरण बनकर सामने आई है। स्थानीय लोगों के अनुसार, मशीन को आए काफी समय बीत चुका है, लेकिन अब तक एक भी गरीब मरीज का एक्स-रे नहीं हो सका है। ग्रामीणों का आरोप है कि शुरुआत से ही खराब मशीन उपलब्ध कराई गई थी, इसके बावजूद कागजों में इसे “कार्यरत” दिखाकर बजट का उपयोग किया जा रहा है। इससे भ्रष्टाचार की आशंका भी गहराती जा रही है।
इस संबंध में जब अस्पताल के डॉक्टरों से बात करने की कोशिश की गई, तो वे कैमरे से बचते नजर आए। हालांकि, अनौपचारिक बातचीत में डॉक्टर ने स्वीकार किया कि मशीन कुछ समय तक चली, लेकिन बाद में खराब हो गई। सवाल यह है कि इतने लंबे समय से खराब पड़ी मशीन को ठीक कराने की दिशा में कोई ठोस कदम क्यों नहीं उठाया गया।
सीएचसी अधीक्षक से संपर्क करने का प्रयास किया गया, लेकिन उनका फोन स्विच ऑफ मिला, जिससे जिम्मेदारी और जवाबदेही पर सवाल उठते हैं। डॉक्टरों का कहना है कि वे हर महीने इस समस्या की रिपोर्ट मुख्य चिकित्सा अधिकारी (CMO) को भेजते हैं, लेकिन अब तक कोई कार्रवाई नहीं हुई। वहीं, सीएमओ ने खुद को नया बताते हुए मामले की जानकारी न होने की बात कही और कहा कि उन्हें इस संबंध में कोई रिपोर्ट नहीं मिली है। यह बयान पूरे तंत्र की कार्यप्रणाली पर सवाल खड़े करता है।
इस लापरवाही का सीधा असर गरीब मरीजों पर पड़ रहा है। अस्पताल में जहां एक्स-रे मात्र ₹1 की पर्ची पर होना चाहिए, वहीं मरीजों को मजबूरन बाहर निजी केंद्रों पर ₹300 से ₹400 तक खर्च करने पड़ रहे हैं। इससे न केवल आर्थिक बोझ बढ़ रहा है, बल्कि डॉक्टरों द्वारा मरीजों को बाहर भेजे जाने से निजी संस्थानों को लाभ पहुंचाने की आशंका भी पैदा हो रही है।
समस्या केवल एक्स-रे मशीन तक सीमित नहीं है। अस्पताल में डॉक्टरों की अनुपस्थिति भी एक गंभीर मुद्दा है। मरीजों को घंटों इंतजार करना पड़ता है और कई बार डॉक्टर अपने केबिन में मौजूद नहीं मिलते। जब उनसे इस बारे में पूछा जाता है, तो वे जवाब देने से बचते हुए अधीक्षक के पास भेज देते हैं।
कुल मिलाकर, सीएचसी अमरौली सुमावली की स्थिति स्वास्थ्य विभाग की कार्यप्रणाली पर गंभीर सवाल खड़े करती है। अब देखना होगा कि जिम्मेदार अधिकारी इस मामले का संज्ञान लेकर सुधारात्मक कदम उठाते हैं या फिर यह लापरवाही यूं ही जारी रहती है। सरकार के “जीरो टॉलरेंस” के दावे इस सच्चाई के सामने कितने खरे उतरते हैं, यह आने वाला समय बताएगा।

