Tuesday, September 29, 2026
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धारा 118 का हटना: राजनीति बनाम यथार्थ

लोगों को स्थानीयता और सांस्कृतिक भावना के नाम पर ठगकर बाहरी पूंजीपतियों को हिमाचल पहले ही सौंपा जा चुका है। मूकनायक/ डॉ. नीरज कुमार/ शिमला संभाग प्रभारी: हिमाचल प्रदेश में भूमि से जुड़ी धारा 118 को हटाने या शिथिल करने की बहस ने एक बार फिर सियासी और सामाजिक विमर्श को गरमा दिया है। यह मुद्दा सिर्फ कानून का नहीं, बल्कि पहाड़ की पहचान, अस्मिता और आर्थिक आत्मनिर्भरता से जुड़ा प्रश्न बन गया है। राजनीति इसे निवेश और विकास का मामला बताती है, जबकि यथार्थ इससे कहीं अधिक गहरा है। यह स्थानीय लोगों के अधिकार, भूमि सुरक्षा, और सामाजिक संतुलन का सवाल है। धारा 118 का ऐतिहासिक संदर्भ हिमाचल प्रदेश भूमि सुधार अधिनियम, 1972 की धारा 118 के तहत, गैर-हिमाचली नागरिकों द्वारा कृषि भूमि की खरीद-बिक्री पर रोक लगाई गई थी। उद्देश्य था: सीमित कृषि भूमि को बाहरी पूंजीपतियों और रियल एस्टेट कारोबारियों से बचाना। यह कानून दरअसल उस सामाजिक चेतावनी का परिणाम था जो शिमला, मनाली, कसौली और धर्मशाला जैसे इलाकों में भूमि हस्तांतरण और सांस्कृतिक असंतुलन के रूप में दिखी। समय के साथ यह कानून हिमाचल की भौगोलिक और सामाजिक विशिष्टता का प्रतीक बन गया। संविधान बनाम भूमि सुरक्षा संविधान का अनुच्छेद 19(1)(e) नागरिकों को देश में कहीं भी निवास करने और संपत्ति अर्जित करने की स्वतंत्रता देता है। लेकिन अनुच्छेद 19(5) राज्य को जनहित में प्रतिबंध लगाने की अनुमति भी देता है। हिमाचल ने इसी संवैधानिक अधिकार का उपयोग किया। इसलिए यह कहना कि धारा 118 असंवैधानिक है, अधूरा तर्क है, क्योंकि उत्तराखंड, नगालैंड, सिक्किम, और अरुणाचल प्रदेश में भी समान भूमि सुरक्षा कानून लागू हैं। राजनीतिक पाखंड और दोहरा रवैया धारा 118 हिमाचल की राजनीति में भावनात्मक मुद्दा है। जब नेता विपक्ष में होते हैं, तो इसे “पहाड़ी अस्मिता की ढाल” बताते हैं, और जब सत्ता में आते हैं, तो “निवेश आकर्षण” के नाम पर इसे शिथिल करने की बात करने लगते हैं। कांग्रेस और भाजपा- दोनों ने अलग-अलग समय पर 118 में संशोधन या छूट के रास्ते खोले। उद्योगपतियों को कोल्ड स्टोरेज, होटल, हॉस्पिटल, और शैक्षिक संस्थान स्थापित करने की अनुमति दी गई। इससे यह स्पष्ट है कि धारा 118 कभी पूर्ण प्रतिबंध नहीं रही, बल्कि “सरकारी स्वीकृति” की प्रक्रिया के माध्यम से बाहरी पूंजी पहले ही प्रवेश कर चुकी है। हिमाचल के अधिकतर बड़े शहरों में दुकानदार और उद्योगपति अधिकतर बाहरी ही है, समरहिल, चायल, सोलन, शिमला, मनाली जैसे शहरों में तो आलम यह है कि बाहरी पूंजीपति व्यापार मंडलों और अन्य पूंजीगत संसाधनों के माध्यम से स्थानीय पूंजीपतियों को हांकने औऱ नियमित करने की स्थिति में आ गए है। धारा 118 के कारण बाहरी जमीन नही ले सकते इसलिए अपने हिमाचली कामगारों और विश्वासपात्र नौकरों के नाम पर जमीन लेकर वास्तविक मालिक बन गए है। यथार्थ: क्या 118 विकास में बाधा है? यह प्रश्न बार-बार उठता है कि क्या इस कानून के रहते राज्य निवेश से वंचित रह गया? उत्तर है नहीं। राज्य में DLF, Adani Agri Fresh, Patanjali, Jindal Group, Radisson, और कई होटल-चेन वैधानिक अनुमति लेकर पहले ही सक्रिय हैं। समस्या कानून नहीं, बल्कि निवेश नीति, नौकरशाही प्रक्रियाओं की जटिलता और अवसंरचना की कमजोरी है। 118 हटने का आर्थिक पक्ष: बैंकिंग और भूमि मूल्य :-बहस का एक व्यावहारिक पक्ष यह है कि धारा 118 हटने से भूमि का बाजार मूल्य कई गुना बढ़ सकता है। आज जहाँ ग्रामीण क्षेत्र में जमीन की औसत कीमत 5 से 8 लाख प्रति बीघा है, वहाँ बाहरी मांग आने पर यह 12 से 15 लाख तक पहुँच सकती है। यह वृद्धि केवल संपत्ति मूल्य तक सीमित नहीं रहेगी, इसका सीधा असर बैंकिंग और ऋण-व्यवस्था पर पड़ेगा। 1. लोन और क्रेडिट विस्तार बैंक भूमि के बाजार मूल्य के आधार पर ऋण देते हैं। यदि किसी किसान की 1 बीघा जमीन का मूल्य 2 लाख है और बैंक 60% तक ऋण देता है, तो उसे लगभग 1.2 लाख का लोन मिलेगा। लेकिन वही भूमि यदि 10 लाख मूल्य की हो जाती है, तो बैंक उसी पर 6 लाख रुपये तक का ऋण दे सकता है। इससे ग्रामीण क्षेत्र में नकदी प्रवाह (Liquidity) बढ़ेगा और किसान स्वरोजगार, बागवानी या पर्यटन कार्यों में निवेश कर पाएंगे। 2.भूमि एक “लिविंग एसेट” बनेगी अभी भूमि बैंकिंग दृष्टि से कम मूल्यवान है, परंतु मूल्यवृद्धि के बाद यह “Active Collateral” बन जाएगी। इससे किसान और ग्रामीण वर्ग की ऋण लेने की सौदेबाज़ी शक्ति बढ़ेगी। लेकिन खतरे भी उतने ही गहरे हैं 1. भूमि बिकने का दबाव: ऊँचे दामों का आकर्षण छोटे किसानों को जमीन बेचने के लिए प्रेरित कर सकता है, जिससे स्थायी विस्थापन और “भूमिहीनता” बढ़ेगी। 2. रियल एस्टेट सट्टा और सामाजिक असंतुलन: बाहरी पूंजी का बड़ा हिस्सा कृषि नहीं, बल्कि रियल एस्टेट निवेश के रूप में आएगा। इससे स्थानीय युवा “किरायेदार या मज़दूर” बन सकते हैं। 3. पर्यावरणीय खतरे: अनियंत्रित निर्माण, जलस्रोतों पर दबाव, और भूस्खलन जैसी समस्याएँ और बढ़ेंगी। 4. आर्थिक विषमता: बड़े भू-स्वामी अधिक लाभ लेंगे, जबकि सीमांत किसान पीछे रह जाएंगे। राजनीतिक विडंबना और दोहरा चेहरा हिमाचल की राजनीति में विडंबना यह है कि जिन नेताओं ने “पहाड़ी हित” के नाम पर 118 का बचाव किया, वही लोग स्वयं या अपने परिचितों के माध्यम से भूमि खरीद में शामिल रहे हैं। छराबड़ा में प्रियंका गांधी वाड्रा का फार्म हाउस, कसौली, मनाली, धर्मशाला और सोलन में बाहरी उद्योगपतियों के फार्म, रिज़ॉर्ट और होम-स्टे यह दर्शाते हैं कि 118 “कानूनी” दीवार है, लेकिन “व्यवहारिक” दरवाज़े पहले से खुले हैं। अर्थात धारा 118 का हटना सिर्फ कानूनी या राजनीतिक फैसला नहीं यह हिमाचल के भविष्य की सामाजिक-आर्थिक दिशा तय करेगा। कानून को पूरी तरह समाप्त करने के बजाय, इसका संतुलित पुनर्गठन आवश्यक है। 

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