मूकनायक
राजस्थान/ जोधपुर
जिला ब्यूरो चीफ गोपाल भारतीय
लगभग पिछले एक दशक से देश ओर देश/राज्यों में एक हालत बनी हुई है। आंबेडकर आंदोलन मजबूत हुआ है सोशल मीडिया का अच्छा खासा असर संबंधित समुदायों पर हुआ है। इसके साथ ही सत्ता में मौजूद सरकारों ने समाज के विशेष वर्गों को टारगेट किया भी किया है। अनुसूचित जाति जनजाति में जो लोग सक्षम हैं उन्हें वर्तमान में कोई खास फर्क महसूस नहीं होता पर दुर्बल परिवारों पर प्रत्यक्ष असर पड़ता है। हर एक दो महीने में इस समुदाय को बड़ी हानि करने वाली नीति,घटना,बयानबाजी हुई है। इसके प्रत्युत्तर में दलित आदिवासी समुदाय ने विभिन्न आंदोलन धरने प्रदर्शन रणनीतियां तैयार की है। खास कर के मैं राजस्थान के लिए कहूं तो ऐसी विभिन्न घटनाओं में लगभग अच्छे लीडर तैयार हुए हैं जिनमें पोटेंशियल है कि वे अच्छा आलंदोलन और समाज को राह दिखा सकें। ऐसी स्थिति में लीडर तो तैयार हुए हैं लेकिन उनके इनकम का कोई स्त्रोत नहीं रहते। ऐसी हालत में मजबूरीवश या तो किसी नेता के अधीन काम करेंगे,या पार्टियों को पकड़ने की कोशिश करेंगे,या घर फुक कर सड़क पर आ जाएंगे। जिस समुदाय के अधिकार सम्मान के लिए विभिन्न पार्टियों,नेताओं,बाहुबलियों से,पूंजीवादियों से सीधी टक्कर ये लोग लेते हैं और उन्हें अपना धुर विरोधी बना लेते हैं। जिनका सामना उन्हें जीवन भर करना पड़ता है। और बड़ी दुश्मनीय हो जाती हैं। एक तो आंदोलनकारी समाज को स्वाभिमानी बनाना चाहता है खुद बहुत खुद्दार बनता है और वह खुद सड़क पर आ जाता है। जिन लोगों को समाज के लिए विरोधी बनाता है उन से दुश्मनी मोल लेकर इसको जीवन भर झेलता है। ओर जिन लोगों/समाज/जाति के अधिकारों के लिए लड़ता है उन सब को उस आंदोलनकारी से कोई लेना देना नहीं होता। आंदोलनकारी सीधा किसी को लाभ देता है तो ठीक है वरना इस बड़े समाज को जो अदृश्य सामाजिक सुरक्षा उनके लड़ने से मिलती है उसकी कोई वैल्यू नहीं समझता। हाल ही में जमीन से संबंधित कानून में संशोधन को लेकर पूरे राज्य में उदासीनता बनी हुई है।
ऐसी हालत में आरक्षित सीटों से चुने हुए sc st के नेतागणों का जमीर मर गया है। Sc st आयोग गायब है।
यह तमाम बातें मैं इसलिए लिख रहा हूं,कि बहुत लोगों के काल मेसेज आते हैं,विभिन्न घटनाएं होती हैं सरकारों के फरमान आते हैं लेकिन बहुत से लीडर को इन तमाम चीजों से गंभीर आहत होते हुए भी मूक दर्शक बनकर रहना पड़ता है। आर्थिक रूप से हमारा समान अभी कमजोर है जिन से ब्याज पर पैसे लेते हैं जिनके मजदूरी जाते हैं उन सब में कुछ को छोड़ दें तो ब्याज पर पैसे देने वाले काम देने वाले अलग अलग तरह का शोषण करते हैं। दलित आदिवासियों के पास जमीन कम है आर्थिक तंगी पर उन्हें भी कौड़ियों के भाव बेच देंगे क्यों कि सक्षम लोग खरीदने को तैयार बैठे हैं। यह चोट बहुत बड़ी चोट है जिसका बड़े स्तर पर नुकसान उठाना पड़ेगा। अभी वक्त है रणनीति तैयार कर सरकार को बैकफुट पर लाने के लिए योजना बनानी चाहिए।

