मूकनायक /देश
राष्ट्रीय प्रभारी ओमप्रकाश वर्मा
“डॉ भीमराव अंबेडकर का मानना था कि यह जातिवाद और महिलाओं के साथ भेदभाव को बढ़ावा देता है”।
25 दिसंबर 1927 को बाबासाहेब डॉक्टर अंबेडकर जी ने सामूहिक रूप से ब्राह्मणों द्वारा लिखा गया ग्रंथ मनुस्मृति का दहन किया था जिसमें शूद्र जाति के लोगों के साथ और महिलाओं के साथ बहुत भेदभाव किया जाता था। उनके शूद्रों के साथ दुर्व्यवहारकिया जाता था। मनुस्मृति में शुद्ध और महिलाओं को अपमानित करने और उन्हें गुलाम बनाए जाने के नियम बनाए गए थे।
मनुस्मृति में शूद्रों और ओबीसी के लिए बहुत ही घटिया बातें लिखी गई थी। मनुस्मृति कहता है कि शूद्रों को गुलाम बनाया जा सकता है और यह ब्राह्मणों द्वारा लिखा गया ग्रंथ था मनुस्मृति के अनुसार ब्राह्मण शूद्रों को खरीद सकता था और उन्हें भेज सकता था और नौकर की तरह उनसे काम करवा सकता था उनका मानना था कि ईश्वर ने उन्हें गुलाम बनाए जाने के लिए ही धरती पर भेजा है इनका मानना था कि नीचे जाति वाले लोगों का जन्म है इसलिए हुआ है कि वह उच्च जाति वाले लोगों के के लिए काम करें और उनके लिए गुलामी का जीवन स्वीकार करें। मनुस्मृति में ब्राह्मणों द्वारा उच्च जाति के लिए सारे अधिकार दिए गए थे जबकि नीचे जाती यानी शूद्र जातियों के लिए सारे हक और अधिकार छीन लिए गए थे। और मनु तो यह तो कहता है कि यदि कोई शुद्ध किसी उच्च जाति के वर्ग का अपमान करता है तो उसकी जीभ को काट देना चाहिए क्योंकि वह नीचे जाति का है।
मनुस्मृति में मनु यह तक कहता है कि यदि कोई शूद्र जाति का इंसान किसी उच्च जाति के साथ अपना नाम जोड़ता है या उच्च जाति के इंसान के साथ अपना नाम जोड़ता है तो एक लंबी लोहे की ग्राम रोड उसके मुंह में डाल दी जाएगी। मनुस्मृति में उच्च जाति के लोगों को उनकी जातियों को देखते हुए कार्य सौंपे गए थे। जैसे ब्राह्मण को पूजा पाठ का काम सौंपा गया था क्षत्रिय को समाज के शासन और रक्षक के रूप में कार्य भार दिया गया था। वैश्या को कृषि व्यापार पशुपालन व अन्य व्यवसायिक गतिविधियां सौंप दी गई थी। जबकि शूद्रों को इन सब की गुलामी का काम सौंप दिया गया था। इन सब के अनुसार शूद्रों के नाम ऐसे होने चाहिए जिससे इन्हें गुलामी यह दासता का भाव आए।
मनुस्मृति में महिलाओं के लिए लिखा गया है कि कि वे आभूषण और पूजा पाठ के पात्र हैं लेकिन उन्हें घर के बाहर कोई अधिकार नहीं है। मनोज स्मृति में महिलाओं को कमजोर और मंदबुद्धि वाले कमजोर प्राणी है। उन्हें बाल्यावस्था में पिता के सहारे और और युवावस्था में पति के सहारे और वृद्धावस्था में पुत्र के सहारे पर रहना चाहिए। उन्हें किसी भी प्रकार की कोई स्वतंत्रता प्राप्त नहीं होनी चाहिए। मनु के अनुसार अगर महिला को स्वतंत्र छोड़ दिया जाए तो वह नैतिकता का पिता का हनन करेंगे और समाज में बुराई के कामों को आगे बढ़ाएंगी। उन्हें कोई शिक्षा का अधिकार नहीं था। या यूं कहें कि उन्हें किसी भी प्रकार का कोई भी अधिकार या स्वतंत्रता नहीं दी गई थी एक तरह से उनके लिए भी यह गुलामी की ही जिंदगी थी।
इन सभी चीजों को देखते हुए बाबासाहेब ने गहन अध्ययन की मनुस्मृति का गहन अध्ययन किया और उसके बाद ही 25 दिसंबर 1927 को मनुस्मृति को जलाने का काम किया। ताकि निम्न जाति के लोग और महिलाओं को उनके हक और अधिकार दिलाए जा सके और उसके बाद संविधानके तरीके से जीवन यापन किया जा सके।
इस तरह से बाबासाहेब ने हम सबको हक और अधिकार दिलाने के लिए मनुस्मृति का ध्यान करना ही उचित समझा और जो आज हम जीवन जीवननयापन कर रहे हैं वह सिर्फ और सिर्फ संविधान की देन है।
जय भीम नमो बुद्धाय
जय संविधान
डॉ भीमराव अंबेडकर
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लेखक: नीलम सोनीपत
सामाजिक चिंतक और जिला ब्यूरो

