Thursday, February 26, 2026
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बहत्तर छेद, सूप तो सूप चलनी भी खटके

मूकनायक

देश

“राष्ट्रीय प्रभारी ओम प्रकाश वर्मा”

7 और 2 मिलकर 72 बनता है | 7+2 का योग 9 होता है | 9 का मतलब नौ ग्रह | ये ग्रह कभी अच्छे नहीं समझे गये | हमेशा इनकी दशा और दिशा बदलने की बात पुराणों में की गयी है | हमारे देश की सीधी सादी भोली जनता को पाखंडियों ने ग्रह दशा खराब बताकर और उन ग्रहों का प्रभाव दूर करने के लिये होम हवन कथा भागवत करवाने के उपाय बताकर खूब लूटा है | कोई मांगलिक है उसकी शादी फलां से नहीं हो सकती है, उपाय करना होगा, कुछ खर्चा करना होगा फिर शुभ हो जायेगा | किसी की बारहवीं बृहस्पति खराब है, किसी पर शनि का साया है, किसी पर शनि चढ़ा हुआ है आदि आदि | अरे भाई यदि शनि ग्रह की तर्कसंगत वैज्ञानिक बात की जाये तो शनि हमारी पृथ्वी से 700 गुना बड़ा है | अगर वह किसी के ऊपर चढ़ जायेगा तो उस बेचारे की तो चटनी बन जायेगी |
दूसरे यह कि क्या कभी किसी ने चलनी के छेद गिने हैं ? शायद इसीलिए मनुवादियों ने चलनी के बहत्तर छेद बताये हैं | कि एक वर्ग विशेष, चलनी के छेद गिनने में ही लगा रहे | यानी मनुवादियों के बनाये पाखंडी पौराणिक अंधविश्वासी मकड़जाल में ही फँसा रहे |
यह मुहावरा पावरफुल या शक्तिशाली अथवा उच्च वर्ग के लोगों द्वारा कमजोर या निम्न वर्ग के लोगों की औकात बताने वाला व्यंगात्मक शोषण का प्रतीक है |
दूसरे सूप शब्द पुरुष प्रधान है जिसकी तुलना अपने को स्वयंभू दबंग ऊँची जाति का समझने वालों द्वारा शूद्र या कमजोर वर्ग को नीचा दिखाने के लिये की गयी है |
चलनी (आटा छानने वाली छन्नी) शब्द नारी प्रधान है |
यानी कि नारी को तो कमजोर से भी कमजोर समझा गया है | उसे इंसान ही नहीं वल्कि हमेशा पुरुष की दासी या सेविका ही समझा गया है | क्योंकि भारतीय नारी एक कमजोर से कमजोर वर्ग के पुरुष के भी अधीन ही रही है |
कमजोर वर्ग व नारी को नीचा दिखाने वाले ऐसे सैकड़ों मुहावरे हमारे देश में प्रचलित हैं जिन्हें हम रोज सुनते हैं और अज्ञानता में स्वयं भी प्रयोग करते हैं | जो भी हो बोलने वाले के मन में स्वयं के पावरफुल होने का अहंकार तो होता ही है |
कब तक दूर भागोगे मनुवाद से ?
कमजोर वर्ग एवं नारी का धार्मिक सामाजिक आर्थिक राजनैतिक व शारीरिक शोषण के साथ साथ मानसिक शोषण मनुवाद का मूल सिद्धांत है | यहाँ मनुवाद का तात्पर्य केवल किसी विशेष या जाति वर्ग के लोगों को ही न समझा जाये, वल्कि वे लोग जो ऊँच-नीच, छुआछूत, मानव मानव में भेदभाव करने वाले, शोषित,वंचित, असहाय लोगों, लिंगभेद और नारी के प्रति दुर्भावना रखते हैं वे भी असली मनुवाद के पोषक हैं | ये मनुवादी न सिर्फ बाहर से आये हुये लोग हैं वल्कि कुर्सी के लालची सत्ताधारी लोग भी हैं जो सिर्फ अपना या स्वयं के, अपने परिवार, जाति और गोत्र के लिए ही उपरोक्त दूसरे जाति वर्ग या विरोधी विपक्षी पार्टी के लोगों पर अत्याचार करते हैं |
विचारणीय विषय यह भी है कि मनुवाद ने एक विशेष वर्ग या शूद्र वर्ण वर्ग के लिये शोषण का भी विशेष प्राविधान किया है | क्योंकि मनुवादी आर्य अपने को शूद्र वर्ण से अलग, या हो सकता है बाहरी देशों से आया हुआ मान सकते हैं | लेकिन नारी, स्त्री या महिलायें बेटियाँ तो समान रूप से सभी वर्गों की समान रूप से उनकी अपनी ही होती हैं | फिर भी मनुवादियों ने समस्त नारी जाति को अत्याचार और शोषण के दलदल में क्यों धकेल दिया ?
इसका सीधा तात्पर्य यही लगता है कि मनुवादी लोग स्त्रियों को पुरुष की बराबरी का दर्जा ही नहीं देना चाहते हैं | जबकि किसी भी देश की लगभग आधी जनसंख्या नारी या स्त्री जाति की होती है |
जिस प्रकार आर्य हूण शक कुषाण मुगल, इस्लाम अंग्रेज पुर्तगाली आदि या अन्य विदेशी आक्रान्ता भारत पर आक्रमण करके यहीं पर शासक बन गये | ये लोग अपने साथ सैनिकों की संख्या के अनुपात में महिलायें नहीं लाये थे | यहीं की बेटियों महिलाओं से शादियां करके घर बसा लिये |
शायद इसी प्रकार की कहानी अपने को आर्य कहलाने वाले मनुवादियों की भी रही है | यहाँ पर ये समझना भी जरूरी है कि प्राचीन समय में कृषि योग्य भूमि को इड़ा, इला, इरा अरा भी कहा जाता था | और कृषि भूमि पर काम करके अनाज फल आदि उगाने वाले को ही अरिया अथवा आर्या कहा जाता था | हालाँकि बुद्ध काल में अरिय शब्द महानता का प्रतीक था | इस पर अलग से एक पूरा टॉपिक लिखा जा सकता है | अतः संक्षेप में कहा जा सकता सकता है कि इसी अरिया की खोज में बहुत से विदेशी लोग भारत में आये | अपने पशु पालन का व्यवसाय भी भारत के चरागाहों में किया | गुजारा अच्छा होने लगा तो यहीं पर बस गये | धीरे धीरे छल कपट या दया के रूप में यहाँ के मूल निवासियों से माँग कर या दान लेकर यहाँ की भुमि हथियाने लगे | जब स्थिति मजबूत हो गयी तो कई विदेशी कबीलों के सरदार यहाँ के ही राजा बन बैठे और स्वयं को आर्य बताने लगे | अन्यथा यहाँ भारत के मूल निवासी ही असली आर्य हैं |
इन विदेशी मूल के अपने को स्वतः आर्य बताने वाले पुरुषों का डीएनए भी मूल भारतीय पुरुष लोगों के डीएनए से मैच नहीं करता है | लेकिन महिलाओं का अधिकतम लगभग 99% से भी अधिक डीएनए भारतीय मूल की महिलाओं के डीएनए से मैच करता है | यहाँ स्पष्ट करना जरूरी है कि पुरुष का डीएनए हमेशा पुरष के डीएनए से और महिला का डीएनए हमेशा महिला के डीएनए से मिलता (मैच करता) है और इसी क्रम में आगे की पीढ़ियों में ट्रान्सफर होता है |
अब आगे अन्तर सिर्फ इतना है कि इस्लाम या अन्य धर्म वालों ने भारतीय नारी को गुलाम और शोषण का शिकार बनाकर तो रखा और महिलाओं को पुरुषों की बराबरी का अधिकार भी नहीं दिया लेकिन उनसे उत्पन्न संतान बेटे बेटियों महिलाओं को पूरी तरह अपना लिया | लेकिन मनुवादियों ने तो अपने घर की महिलाओं बेटियों को पूरी तरह से कभी अपनाया ही नहीं |
शायद उन्हें आज भी डर सता रहा है कि कहीं उनकी महिलायें बेटियाँ फिर से अपने पुराने समाज में वापस न चली जायें और उनके पाखंड अंधविश्वास को अपने पुराने समाज में जाकर उजागर न कर दें | हालाँकि आज के संवैधानिक युग में ऐसा कुछ होने की संभावना बहुत ही कम है | (आदर्श प्रेम विवाह एक अपवाद हो सकता है) | फिर भी इन मनुवादियों ने नारी जाति पर शोषण अत्याचार उत्पीड़न आज तक जारी रखा है | उन पर अनेकों तीज त्योहार व्रत पर्व उपवास पतिव्रत धर्म के नाम पर पाखंड के द्वारा पाबन्दियाँ लगा दी गई हैं | यहाँ तक कि उन्हें पति के मरने पर सती यानी पति की चिता के साथ जीवित होकर भी जल कर प्राण त्यागने के लिए मजबूर कर दिया था, अंग्रेजी शासन ने इस पृथा पर कानूनी रोक लगाई थी और अब तो संवैधानिक युग है | फिर भी दूसरे रूप में उनके मन मस्तिष्क में पूरी तरह बैठा दिया गया है कि यदि वह पति के लिये व्रत नहीं करेगी तो पति की आयु कम हो जायेगी और उसे विधवापन की मुसीबतों का सामना करना पड़ेगा | घोर नर्क में जाना पड़ेगा आदि आदि | जबकि पुरुष अपनी महिलाओं के लिये कोई व्रत उपवास नहीं रखता है | पति के लिए तो ब्याहता पत्नी को छोड़ देना, त्याग कर देना, जुये तक में दाँव पर लगा देना या पत्नी का मर जाना कोई विशेष मायने नहीं रखता था | क्योंकि इनके पौराणिक धर्म ग्रन्थों के अनुसार एक पुरुष कई कई शादियाँ कर सकता था | एक पत्नी के जीवित रहते या मर जाने पर दूसरी पत्नी या रखैल रख लेना इनके लिये जायज था |
व्यभिचार कैसा भी हो चाहे पर स्त्री गमन या पर पुरुष गमन, स्त्री-पुरुष दोनों के लिये ही समान रूप से दोषपूर्ण है तो फिर केवल एक स्त्री के लिये ही इतनी सारी पाबन्दी क्यों ? पुरष के लिए उतनी पाबन्दी क्यों नहीं ?
कोई भी मनुवादी ग्रन्थ पुराण रामायण, महाभारत, भागवत पुराण या उपनिषद उठाकर देखा जाये, कहीं कम या अधिक महिलाओं पर शोषण अत्याचार के प्रसंग अवस्य ही मिलेंगे | लेकिन इन प्रसंगों को भी इन पाखंडियों ने देवों की कृपा बताकर भोली भाली महिलाओं को गुमराह कर रखा है | मनुस्मृति ने तो पूरी स्त्री जाति की दुर्दशा ही कर डाली है | इसीलिए मनुवादियों ने आज भी मनुस्मृति को अपनी महिलाओं की पहुँच से दूर ही रखा है | सबसे पहले तो उन्हें पढ़ने लिखने का अधिकार ही नहीं दिया था | आजाद भारत में जब बाबा साहब डा. भीमराव जी ने संविधान लिखा तो भारत के सभी दबे कुचले गरीब असहाय पुरुषों और महिलाओं की स्कूली शिक्षा अनिवार्य कर दी | मनुवादी मानसिकता से ग्रसित लोग करते भी तो क्या ? अब तो महिलाओं में भी शिक्षा का प्रसार हो चुका है | फिर भी इन पाखंडी लोगों ने नया षडयंत्र चालू कर दिया | उन्होंने अपनी महिलाओं को पतिव्रत धर्म के लिए रामायण, गीता, गौरी गणेश, लक्ष्मी, दुर्गा पूजा, व्रत उपवास, आरती, श्रंगार तक ही सीमित कर रखा है |
शूद्रों के लिये भी धर्मशास्त्रों में लिख रखा है |
शूद्र का अपना कोई धन नहीं होता है |
यदि कोई शूद्र धन एकत्र करता है तो राजा का कर्तव्य है कि शूद्र का धन छीनकर विप्रों को दान कर दे | क्योंकि
शूद्र का कमाया हुआ धन भी विप्रों का ही है | शूद्र का धन व धर्म तो सिर्फ विप्रों की सेवा करना और उनके चरणों का धोवन पीना है |
दूसरे यही मनुवादी पाखंडी बीच बीच में इन बेचारी महिलाओं और कमजोर शूद्रों को ताना मारते हुए याद दिलाते रहते है – – –
“सूप तो सूप चलनी भी खटके यामें बहत्तर छेद”
लेकिन यदि गौर किया जाये तो मनुवादियों की सोच में ही बहत्तर छेद विद्यमान हैं | इन्हीं कलुषित 72 छेदों के बल पर ही यहाँ के मानव जगत को 6743 जातियों में बाँट कर रख दिया है | इन्हें अनपढ़ अशिक्षित रखने का षडयंत्र कर रखा है ताकि ये शिक्षित जागरूक होकर संगठित न हो जायें | क्योंकि शिक्षित जागरूक इंसान को गुलाम बनाना कठिन है |
मनुवादियों ने यहाँ के बहुतेरे बलशाली वर्ग को जिन्हें मान्यवर कांसीराम जी ने बहुजन कहा है | सभी बहुजनों को मनुवादियों ने जाति पाति ऊँच-नीच भेदभाव छुआछूत की भावना से ग्रसित कर दिया है और इसी फूटन का लाभ उठाकर हजारों वर्षों से इन पर शासन कर रहे हैं | सिर्फ शासन ही नहीं वल्कि अन्याय अत्याचार दमन शोषण के द्वारा दुख दर्द देने से भी बाज नहीं आ रहे हैं | बहुजनों के मानवीय अधिकार भी छीन लेते रहे हैं |
इन सभी बहत्तर छेदों के शोषण से उद्धार पाने के लिये बस एक ही प्रमुख ग्रन्थ है, वो है भारत का संविधान | खास करके शूद्र अछूत गरीब असहाय और महिलाओं के लिए | इसलिए मनुस्मृति व मनुवाद के साथ नहीं संविधान के साथ रहो | संविधान का अध्ययन करो, पालन करो और संविधान के लिये जिम्मेदार लोगों से संविधान का पालन कराओ | सरकार किसी की भी हो अगर कोई सरकार भी संविधान का ठीक से पालन नहीं कर रही है तो उसका सपोर्ट मत करो |
या फिर स्वयं संविधान रक्षक बनो यानी सत्ता में भागीदारी सुनिश्चित करो | आपको अपने अधिकार पाने के लिए –
इसके लिये शिक्षित होना
संवैधानिक ज्ञान हासिल करना
स्वतंत्र वैज्ञानिक चेतना जागृत करना
संगठित होना
इसके साथ ही अन्याय के विरुद्ध संगठित संघर्ष करना भी जरूरी है |
अगर सभी बहुजन भाई ऐसा करने में असमर्थ रहे तो बहत्तर छेद वाली चलनी की तरह अपनी दुर्दशा कराने के लिए तैयार रहें |
इसलिए बहुजन भाई अपने समाज को बचाने के साथ साथ संविधान की सुरक्षा के लिए एकजुट होकर लड़ना सीखें |
जिन लोगों ने पचासों साल तक शासन किया और अपने पचासों साल के कार्यकाल में भी पूरी ईमानदारी से बहुजनों के हक अधिकार पूरे न किये हों | चुनावों के समय संविधान दिखाकर वोट की खातिर संविधान बचाने की बात कहकर बहुजनों का वोट हड़प लेते हैं | ऐसे लोगों से भी सावधान रहने की जरूरत है |
संगठित रहें लेकिन अलग अलग जातीय अथवा मनुवादियों की तरह गैर बराबरी वाले संगठन न बनायें | आपसी जातीय ऊँच-नीच, छुआ छूत, भेदभाव खत्म नहीं कर सकते तो भी कम तो कर ही सकते हैं |
आगे जीत आपकी पक्की है |
संविधान किसी भी वर्ग के स्त्री या पुरुष की पूर्ण रक्षा के लिये पर्याप्त है | बशर्ते कि उसका सही ढंग से पालन होता रहे |


लेखक
देवी दयाल दिनकर (मैनेजर)
बाबा खयालीदास के पीछे
चमन गंज फफूंद
जिला- औरैया ( उप्र ) 206247
9415771347

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