Thursday, February 26, 2026
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नारी और शूद्रों की गुलामी

मूकनायक

देश

(राष्ट्रीय प्रभारी ओमप्रकाश वर्मा )

नारी और शूद्रों की गुलामी का मूल कारण हमारे धार्मिक धर्म ग्रन्थ ही हैं

सालंकारा चभोग्या
च सर्वस्त्रां सुन्दरी प्रियामः |
यो ददाति च विप्राय
चन्द्रलोके महीवते ||
पुराण- देवी भागवत श्लोक 9/30
जो ( व्यक्ति ) भोग करने योग्य, सुन्दर, कुमारी कन्या को वस्त्र आभूषणों सहित विप्रों को दान करेगा वह सीधे चन्द्र लोक पहुँच जायेगा | ( यहाँ विप्रों का तात्पर्य किसी जाति विशेष का नहीं वल्कि पंडा पुजारी , पुरोहित, पाखंडी कथा वाचक, विवाह पढ़ने वाले, महन्त धर्मगुरुओं या ढोंगी संत ऋषियों से है )
अब क्या कोई बतायेगा कि ये चंद्रलोक कहाँ है ? अगर केवल चन्द्रमा की बात की जाये तो वैज्ञानिक लोग वहाँ पहुँच कर देख चुके हैं | कंकरीली पथरीली बंजर भूमि के अलावा वहाँ पर अभी तक किसी प्रकार का जीवन होने का भी कोई प्रमाण नहीं मिला है | तो फिर मरने के बाद कोई भी स्त्री पुरुष वहाँ पर कौन सा राज करेंगे ? और हाँ इन्हीं धर्म ग्रन्थों की वजह से राम रहीम, राम पाल, आशाराम बापू जैसे हजारों ढोंगी संत महात्मा हमारे देश की भोली भाली जनता की धन धरती लूटते रहे और उनकी भोली भाली मासूम बेटियों का शोषण कर उनके साथ भोग विलास और अय्याशी करते रहे एवं अब तक कर रहे हैं |
क्या आपने कभी भी अपनी औरतों महिलाओं बेटियों की भलाई की खातिर इन धर्म ग्रन्थों को पढ़कर ठीक से समझा या चिन्तन मनन किया है ? जो अपनी बेटियों कन्याओं को देव विवाह के नाम पर उनके बाल्यकाल 11. 13. साल की उम्र में ही एक वस्तु समझ कर इन पाखंडियों को दान करते रहे हैं |
इसी प्रकार कन्या रूपी नारी को ईश्वर की इच्छा और देवी देवताओं के नाम पर देवदासी ( भोग की वस्तु ) बनाकर मन्दिरों के पंडा पुजारियों को दान करना या कराना सम्पूर्ण नारी जाति पर किया जाने वाला सबसे ऊँचे दर्जे का अत्याचार है |
इन अबलाओं के साथ ये पाखंडी लोग भोग विलास, अय्याशी करते हैं तो फिर कम उम्र की मासूम बेटियों कन्याओं का गर्भ धारण करना, सन्तान का जन्म होना स्वाभाविक व प्राकृतिक है |
इन मासूम बेटियों की शारीरिक क्षमता विकसित न होने के कारण हजारों लड़कियाँ पंडा पुजारी पुरोहितों द्वारा किये गये भोग विलास के प्रथम दिन या गर्भावस्था से प्रसव पीड़ा तक ही दम तोड़ देती हैं | या फिर मार दी जाती हैं |
क्योंकि इनका कोई रिकार्ड लड़की के माँ बाप या अन्य किसी को कभी नहीं बताया जाता है |
संयोग से जो भी मातायें व उनके शिशु बच जाते हैं | तो सवाल आता है कि इन अवैध संतानों का पालन पोषण कौन करेगा ? उसके लिए भी इन पाखंडियों ने व्यवस्था धर्म ग्रन्थों के माध्यम से कर रखी थी कि देवी देवताओं ईश्वर की संतानो को ईश्वर को ही समर्पित कर दिया जाये |
इन उपायों में शिशु को जन्म के उपरान्त ही गला दबाकर मार दिया जाये, उनकी माताओं के स्तनों पर धतूरे का लेप लगाकर स्तनपान कराकर मार दिया जाये, दूध से भरे पात्र या गड्ढे में डुबोकर मार दिया जाये, गंगादान के बहाने जल में प्रवाहित करके मार दिया जाये |
इन सब अत्याचारों के बावजूद जो बच्चे वाली स्त्रियां बची रही उनके साथ फिर वही पुराना खेल खेला जाने लगा | जब तक उनसे जी नहीं भर जाता अथवा जब तक नयी कन्यायें, देवदासियां पर्याप्त मात्रा में नहीं आ जाती | बहुत सी देवदासियाँ कन्याओं को जन्म देती थीं | अगर सुन्दर पुत्री ने जन्म लिया तो पुरानी देवदासियों से उनका पालन पोषण करवाया और सहवास योग्य हो जाने पर उन्हें भी देवदासी बना लिया | तब ये पाखंडी पुजारी यह भी भूल जाते कि यह उनकी ही स्वयं की बेटियाँ भी हो सकती हैं |
उसके बाद तो ये देवदासी रूपी पुरानी नारियां मठ मंदिरों आश्रमों या बड़े घरानों के बाहर नौकरानियों की तरह काम करने को विवश होती भीख मागती या फिर वैश्यावृत्ति की ओर धकेल दी जातीं |
इनके नवजात शिशु बच्चे अगर बालक हैं तो धक्के खाने के लिए बाहर फिकवा दिये जाते और यदि सुन्दर बालिकायें हैं तो पुरानी देशवासियों नौकरानियों से इनका पालन पोषण करवाना जिससे उन्हें पाखंडियों को फिर से सेवा कराने हेतु नयी देवदासियां मिल सकें | विदित हो कि इस प्रकार की नयी देवदासियाँ स्वयं उन्हीं पंडा पुजारियों की संतानें हो सकती हैं और वही लोग उनसे पुनः भोग विलास करने लगते हैं | अगर देवदासी से उत्पन्न बालक हैं तो उन्हें मन्दिर से बाहर फिकवा दिया जाता | अगर किस्मत से किसी दयालु महिला या पुरुष ने इनकी जीवन रक्षा की तो ऐसे पुरुष बच्चे ईश्वर की संतान यानी हरिजन कहलाये |
यहाँ याद दिलाने की जरुरत है कि कुछ लोग अछूत बहिष्कृत समाज के लोगों को भी हरिजन नाम से संबोधित करने लगते हैं जो कि सामाजिक ही नहीं संवैधानिक रूप से भी गलत है | कोर्ट ने भी इस शब्द को गैर संवैधानिक मानकर दंडनीय अपराध घोषित कर दिया है |
आज के हजारों आश्रमों मठ मन्दिरों में दो चार से लेकर सैकड़ों या यूँ कहा जाये कि पूरे देश में लाखों की संख्या में देवदासियां महिलाओं नौकरानियों साधवियों के रूप में रह रहीं हैं | जिनमें बहुत सी दिन के उजाले में भक्त भक्तिनी शिष्या साध्वी बनकर रहती हैं और रात के अंधेरे में पाखंडियों के भोग विलास की वस्तु बन जाती हैं |
क्या यही इस देश का पौराणिक धार्मिक ग्रन्थों का काला हिन्दुत्व है | हिन्दू या सिन्धु शब्द तो एक कल्चर सभ्यता का पर्याय है जो महानता का प्रतीक है | जिसमें अनेकों धर्म सम्प्रदाय समाहित हैं | सनातन हिन्दू बौद्ध जैन आर्य समाज कबीर पंथी रविदासी सिख आदि सभी इसी सभ्यता के अंग हैं |
लेकिन पाखंडियों की सभी कुप्रथाओं को पाखंडियों के कहने पर या उपदेश देने पर जिन्होंने आसानी से मान लिया | इनके अत्याचार को सहन कर लिया | वह उनके नजदीकी और सछूत हिन्दू शूद्र कहलाये |
और जिन्होंने विरोध किया संघर्ष किया और आज भी कर रहे हैं वह समाज से बहिष्कृत कर दिये गये उन्हें अवर्ण अछूत घोषित करके धन सम्पति से वंचित कर दिया गया | उनके साथ दूसरे प्रकार के अन्याय अत्याचार किये गये जो आज भी जारी हैं | आज के एससी-एसटी इसी वर्ग श्रेणी में आते हैं | जिन्होंने कभी भी इन पाखंडियों की घिनौनी कुप्रथाओं को स्वीकार नहीं किया |
एक बात और बताते चलें कि पंडा पुजारियों की अवैध संताने जो मठ मन्दिरों आश्रमों के बाहर फिकवा दी जाती थी और जिनका पालन पोषण स्थानीय निवासियों ने किसी दयालुता वश किया, इन पाखंडियों ने उन्हें ईश्वर की संतान बताकर उन्हें हरिजन नाम दिया | जबकि यह सिद्ध है कि ये हरिजन नाम की संतानें इन्हीं मठ मन्दिरों आश्रमों के पंडा पुजारियों धर्मगुरुओं और ढोंगी साधुओं की ही हैं |
इन संतानों का शूद्र अछूत एससी-एसटी से कोई लेना देना नहीं है | सुप्रीम कोर्ट ने भी इन लोगों यानी एससी-एसटी को हरिजन कहने पर अपराध मानकर कानूनी प्रतिबन्ध लगा दिया है |
आज के युग में पढ़े लिखे एससी-एसटी ओबीसी चिन्तन करें, मनन करें, अपना असली इतिहास खोजें तो पता चलेगा कि ये सब एक जैसे पूर्वजों की संतानें हैं जो पाखंडियों द्वारा किये गये शोषण अत्याचारों की वजह से एक दूसरे से अलग होते चले गए | अब उनमें इतनी
भेदभाव ऊँच-नीच की भावना आ गयी है कि लगता है जैसे ये दूसरे दूसरे ग्रहों के प्राणी हैं |
बाबा साहब डा. भीम राव अंबेडकर ने संविधान के आर्टिकल 13 के अनुसार संविधान लागू होने से पहले नारी और शूद्रों के लिए प्रचलित गैर बराबरी वाले सभी नियम कानून को जो मनुस्मृति ग्रन्थों पुराणों पर आधारित थे | जिनकी वजह से भारत की नारी व शूद्र समाज ( एससी-एसटी ) ओबीसी के सभी लोग दीन हीन दुर्दशा में जीवन यापन करने को मजबूर थे | एक ही लाइन लिखकर सभी धार्मिक ग्रन्थों के पुराने नियमों कानूनों को जो बिसमता पर आधारित थे संविधान आर्टिकल लिखकर एक ही लाईन में शून्य घोषित कर दिया है |
अभी भी थोड़ा बहुत अवसर बचा है संविधान बचाने का और अपने हक अधिकार प्राप्त करने का व सम्मान पूर्वक जीने का कि सभी एससी-एसटी ओबीसी संगठित होकर सचेत हो जायें |
ओबीसी जो संख्या में अधिक है यदि अपने को एससी-एसटी का बड़ा भाई मानते हैं तो अपने एससी-एसटी भाइयों को वही प्यार व सहयोग दें जो बड़ा भाई छोटे भाई को देता है और यदि एससी-एसटी जिन्होंने पाखंडियों के शोषण अत्याचार के विरुद्ध हमेशा ही संघर्ष किया, आज भी कर रहे हैं जिससे कि आज ये आर्थिक तौर पर कमजोर हैं | लेकिन मानसिक तौर से आज भी मजबूत हैं यदि उन्हें बड़ा भाई मानते हैं तो उन्हीं की तरह अन्याय व शोषण के विरुद्ध संघर्ष करें और उनके आन्दोलनों में बढ़ चढ़ कर सहयोग करे |
भारत की अछूत बहिष्कृत कही जाने वाली जातियों में एक जाति प्रमुख है | सभी जानते हैं कि इन्हें दक्षिण पश्चिमी मध्य प्रदेश, महाराष्ट्र में महार और उत्तर भारत में चमार कहा जाता है | इनकी अनेकों जातियाँ बना दी गई हैं ताकि ये कभी संगठित न हो जायें, जैसे जाटव दोहरे अहिरवार कुरील सखवार मेघवाल रविदसिया आदि | ये जातियाँ अधिकतर महापुरुषों की वाणियाँ ग्रहण कर उनका पालन करती हैं | जैसे बुद्ध कबीर संत रविदास, गुरु नानक साहब तुकाराम ज्योतिबा फूले पेरियार रामासामी नायकर बाबा साहब आदि |
आज भी ये जातियाँ अपने को द्रविड़ नागवंशी मौर्यवंशी क्षत्रिय और महाराज बली के वंशज मानते हैं | इन्होंने कभी किसी की गुलामी स्वीकार नहीं की और न ही अपने मान सम्मान इज्जत से किसी के साथ समझौता किया | इनके विचार पाखंडी पुजारियों मनुवादियों के अनुकूल नहीं रहे, फलस्वरूप इन्हें राजाओं के राज्यों से निष्कासित कर बहिष्कृत अछूत बना दिया गया |
अन्य पिछड़ा वर्ग, एसटी, मायनॉरिटी जो इनके डीएनए के भाई हैं | सभी का कर्तव्य बनता है कि इन्हें साथ लेकर चलें |
शोषण और अन्याय के विरुद्ध कुछ जाति वर्ग के अधिकांश लोग जागृत हो रहे हैं | लेकिन वाकी के लोग कुम्भकर्ण जैसी गहरी नींद में सो रहे हैं | उन्हें भी जगाने की जरूरत है | नहीं तो वे खुद तो पतन के गर्त में जा ही रहे हैं वाकी सभी को भी पतन की ओर घसीट कर रहेंगे |
नारी की बात की जाये तो यह देखा जा सकता है कि किसी खास वर्ग की नारी का ही उत्पीड़न नहीं होता रहा है वल्कि संपूर्ण वर्ग की सभी नारी जाति महिला वर्ग का सभी जाति वर्ण में सदैव से उत्पीड़न इन्हीं मनुवादी ग्रन्थों के कारण होता रहा है | एक पुजारी से लेकर एक अछूत की स्त्री भी हमेशा दासी बना कर रखी गई है | ऐसी पुरुष मानसिकता पाखंडियों ने बना रखी है | उन्हें हमेशा पुरुष की दासी बनाकर रखा गया | अपने पति यानी पुरुष की रक्षा के नाम पर सारे तीज त्योहार के उपवास व्रत तीज चौथ, करवाचौथ, सोलह शुक्रवार, सोलह सोमवार आदि आदि पता नहीं कितने व्रत उपवास सभी महिलाओं पर थोप दिये गये | पहले उनसे यही व्रत जबरन करवाये जाते थे | सदियों की गुलामी के कारण अब तो यही महिलायें इन तीज त्योहारों के व्रत पति की लम्बी उम्र हेतु व्रत उपवास, करवाचौथ आदि मनाना अपना धर्म और शान समझने लगी हैं | भला कोई पुरुष अपनी जीवन साथी महिला की जीवन रक्षा के लिए कभी कोई उपवास व्रत रखता है क्या ?
बाबा साहब डा. भीमराव अंबेडकर ने संविधान के आर्टिकल 15 द्वारा धर्म, जाति, मूलवंश, जन्मस्थान या लिंग भेद के आधार पर होने वाले भेदभाव को समाप्त कर दिया है | हिन्दू कोडबिल के द्वारा सभी वर्ग की महिलाओं के हित में जो भी उचित था कानूनी संरक्षण दिलवाया |
इन महिलाओं को तो और भी उत्साह से अपने हक अधिकरों के लिए संगठित होकर प्रयास करना ही चाहिये | इसी प्रकार बहुजन यानी ओबीसी एससी एसटी के हित के लिए हमेशा संघर्ष रत रहे | ये सब लोग संविधान की धारा 341. 342. 343 को पढ़ें और चिन्तन मनन करें |
यह लेख बहुजन समाज के विविध लेखकों विचारकों के कई लेखों से प्रेरणा लेकर लिखा गया है | अगर कोई और सुधार करना चाहता है तो लेखक को कोई आपत्ति नहीं है |

लेखक:
देवी दयाल दिनकर (मैनेजर)
बाबा खयालीदास के पीछे
चमन गंज फफूंद
जिला- औरैया ( उप्र ) 206247
9415771347

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