मूकनायक/राष्ट्रीय प्रभारी डॉ ओमप्रकाश वर्मा
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ज्ञान और लेखनी की यह सूक्ति मानव सभ्यता के विकास और सामाजिक चेतना का मूल मंत्र है। अज्ञानता समाज का सबसे बड़ा अंधकार है, जो कुप्रथाओं, अंधविश्वास और शोषण को जन्म देता है। जब जीवन में ज्ञान का प्रकाश फैलता है, तो भ्रम के बादल छंट जाते हैं। ज्ञान व्यक्ति को सही और गलत का भेद सिखाता है। यह विवेक को जाग्रत कर इंसान को मानसिक गुलामी से मुक्त कराता है। एक ज्ञानी समाज को आसानी से गुमराह नहीं किया जा सकता। ज्ञान की इसी ताकत को जब लेखनी की शक्ति मिलती है, तो वह क्रांति का रूप ले लेती है। तलवार से कहीं अधिक धारदार शब्द होते हैं।
इतिहास गवाह है कि जब-जब दमन और अन्याय बढ़ा है, तब-तब लेखनी ने आम जनमानस को उनके अधिकारों के प्रति सचेत किया है। बाबासाहेब डॉ अंबेडकर के संविधान की ताकत हो या मुंशी प्रेमचंद के साहित्य की गूंज, लेखनी ने हमेशा शोषितों को अपनी आवाज उठाने का हौसला दिया है। जब ज्ञान और लेखनी का यह संगम होता है, तभी एक सजग, न्यायप्रिय और सशक्त समाज की नींव पड़ती है। सजगता से नागरिक अपने कर्तव्यों को समझते हैं, न्यायप्रियता से समता और निष्पक्षता का जन्म होता है, और सशक्तीकरण से समाज का हर वर्ग मुख्यधारा में शामिल होता है। अतः, यदि हमें एक आदर्श राष्ट्र का निर्माण करना है, तो हमें शिक्षा और अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता को बढ़ावा देना होगा। ज्ञान के दीप जलाकर और लेखनी की धार को मजबूत करके ही हम एक खुशहाल और प्रगतिशील भविष्य का निर्माण कर सकते हैं।
बिरदी चंद गोठवाल, नारनौल
प्रदेश प्रभारी मूकनायक, हरियाणा

