भारतीय एकता, मानव विकास, हमारा प्रयास
भारत विविध जातियों, वर्णों, उपजातियों और सामाजिक समूहों वाला देश है। हजारों जातियों में विभाजित भारतीय समाज में आजादी के बाद भी जाति-पाति, ऊंच-नीच, भेदभाव और छुआछूत जैसी सामाजिक विसंगतियां पूरी तरह समाप्त नहीं हो सकी हैं। ऐसे सामाजिक परिवेश में दशरथ मांझी का जीवन संघर्ष, संकल्प और मानवीय संवेदना की अद्भुत मिसाल है।
दशरथ मांझी, जिन्हें आज पूरी दुनिया ‘माउंटेन मैन’ के नाम से जानती है, का जन्म 14 जनवरी 1934 को बिहार के गया जिले के गहलौर गांव में एक अत्यंत गरीब मुसहर समुदाय में हुआ था। मुसहर समुदाय परंपरागत रूप से चूहा पकड़ने के काम से जुड़ा रहा है और आज भी यह समुदाय सामाजिक एवं आर्थिक रूप से वंचित वर्गों में माना जाता है। यह समुदाय मुख्य रूप से उत्तर प्रदेश, बिहार, झारखंड और पश्चिम बंगाल में पाया जाता है। पड़ोसी देश नेपाल के तराई क्षेत्र में भी इसकी आबादी निवास करती है।
दशरथ मांझी के माता-पिता के नाम का आधिकारिक ऐतिहासिक दस्तावेजों में कोई सर्वमान्य एवं प्रामाणिक उल्लेख नहीं मिलता है। हालांकि, नवीन उपलब्ध जानकारियों के आधार पर उनके पिता का नाम मंगरु मांझी बताया जाता है, जो मजदूरी करते थे।
गरीबी के कारण दशरथ मांझी बचपन में ही घर से निकल गए थे। उन्होंने करीब सात वर्ष तक धनबाद की कोयला खदान में काम किया। इसके बाद जब वे वापस गांव लौटे तो उनके पिता ने उनका विवाह फाल्गुनी देवी के साथ कर दिया। उनके दो बच्चे हुए—पुत्र भागीरथ मांझी और पुत्री लौंगिया देवी।
पत्नी की मौत ने बदल दी जिंदगी
गहलौर गांव के पास स्थित पहाड़ के कारण अतरी और वजीरगंज ब्लॉक तक पहुंचने के लिए ग्रामीणों को लगभग 55 किलोमीटर की दूरी तय करके घूमकर जाना पड़ता था। सामने लंबा, चौड़ा और ऊंचा पहाड़ रास्ते में बाधा बना हुआ था। हालांकि कुछ लोग पहाड़ पर चढ़कर रास्ता पार कर लेते थे, लेकिन यह मार्ग अत्यंत कठिन और जोखिम भरा था।
एक दिन दशरथ मांझी की पत्नी फाल्गुनी देवी उनके लिए खाना लेकर पहाड़ पार कर रही थीं। इसी दौरान उनका पैर फिसल गया और वे घायल हो गईं। पहाड़ के कारण अस्पताल पहुंचने में अधिक समय लग गया और समय पर उपचार न मिल पाने के कारण उनकी मृत्यु हो गई।
पत्नी की इस दुखद मृत्यु ने दशरथ मांझी को भीतर तक झकझोर दिया। उन्होंने संकल्प लिया कि जिस पहाड़ के कारण उनकी पत्नी को समय पर इलाज नहीं मिल सका, उसी पहाड़ को काटकर वे रास्ता बनाएंगे, ताकि भविष्य में किसी और को ऐसी त्रासदी का सामना न करना पड़े।
छेनी और हथौड़े से पहाड़ को काटने का संकल्प
दशरथ मांझी ने छेनी और हथौड़ा उठाया और अकेले ही पहाड़ काटने का काम शुरू कर दिया। गांव के लोगों ने उन्हें पागल तक कहा, लेकिन वे अपने संकल्प से तनिक भी विचलित नहीं हुए। उन्होंने वर्षों तक कठिन परिस्थितियों में लगातार मेहनत की।
केवल हथौड़े और छेनी के सहारे उन्होंने लगभग 360 फीट लंबा, 30 फीट चौड़ा और 25 फीट ऊंचा पहाड़ काटकर रास्ता बना दिया। वर्ष 1960 से 1982 तक लगातार 22 वर्षों के अथक परिश्रम के बाद उनका सपना साकार हुआ।
दशरथ मांझी द्वारा बनाए गए इस रास्ते ने अतरी और वजीरगंज ब्लॉक के बीच की दूरी को लगभग 55 किलोमीटर से घटाकर मात्र 15 किलोमीटर कर दिया। इससे गहलौर और आसपास के गांवों के लोगों के लिए अस्पताल, स्कूल और बाजार तक पहुंचना काफी आसान हो गया।
उनका यह कार्य केवल पहाड़ काटने का काम नहीं था, बल्कि यह मानव संकल्प, श्रम, प्रेम और सामाजिक सरोकार की ऐसी मिसाल बन गया, जिसे देश-दुनिया में सम्मान मिला।
संघर्ष को मिली राष्ट्रीय पहचान
17 अगस्त 2007 को 73 वर्ष की आयु में पित्ताशय के कैंसर से दशरथ मांझी का निधन हो गया। उनके निधन के बाद भी उनका संघर्ष और उनकी बनाई राह लोगों को प्रेरित करती रही।
बिहार सरकार ने उनके नाम पर दशरथ मांझी पथ का निर्माण कराया और उन्हें मरणोपरांत बिहार रत्न से सम्मानित किया। उनके जीवन और संघर्ष पर बॉलीवुड में ‘मांझी द माउंटेन मैन’ नाम से फिल्म भी बनाई गई, जिसमें अभिनेता नवाजुद्दीन सिद्दीकी ने दशरथ मांझी की भूमिका निभाई। भारत सरकार ने वर्ष 2016 में उनके सम्मान में डाक टिकट भी जारी किया।
दशरथ मांझी का जीवन यह संदेश देता है कि दृढ़ संकल्प, अथक परिश्रम और मानव कल्याण की भावना के सामने बड़ी से बड़ी बाधा भी टिक नहीं सकती। उन्होंने जिस पहाड़ को दुनिया के लिए असंभव समझा जाता था, उसे अपने हाथों की मेहनत से रास्ते में बदल दिया।
ऐसे महान संघर्षशील महापुरुष को उनके स्मृति दिवस पर शत-शत नमन एवं वंदन।
डॉ. जी. पी. मानव
सेवानिवृत्त उप प्राचार्य
(केन्द्रीय विद्यालय संगठन, भारत सरकार, नई दिल्ली)
संस्थापक एवं वर्तमान अध्यक्ष
मानव विकास संस्थान, उत्तर प्रदेश

