



“जल, जंगल, जमीन और अस्तित्व की रक्षा के लिए संविधान सम्मत संघर्ष जारी रहेगा”
मूकनायक/ गौतम बालबोंदरे (उप संपादक ) छत्तीसगढ़
सूरजपुर/सरगुजा।
छत्तीसगढ़ के सरगुजा संभाग अंतर्गत सूरजपुर जिले के मदनपुर क्षेत्र में प्रस्तावित कोयला खनन परियोजना को लेकर आदिवासी समाज में गहरी चिंता और आक्रोश देखने को मिल रहा है। SECL द्वारा क्षेत्र के लगभग 22 गांवों को खनन परियोजना के दायरे में लाने की तैयारी के बीच शनिवार 17 मई 2026 को मदन नगर, प्रतापपुर ब्लॉक में सर्व आदिवासी समाज द्वारा संभाग स्तरीय सम्मेलन आयोजित किया गया, जिसमें हजारों की संख्या में ग्रामीण, युवा, महिलाएं और सामाजिक पदाधिकारी शामिल हुए।
सम्मेलन में ग्रामीणों ने अपनी पीड़ा व्यक्त करते हुए कहा कि जिन पहाड़ों, जंगलों, नदियों और भूमि पर सदियों से उनके पूर्वजों का जीवन, संस्कृति और अस्तित्व टिका हुआ है, आज वही क्षेत्र विकास के नाम पर विनाश की ओर धकेला जा रहा है। ग्रामीणों ने आरोप लगाया कि बिना पर्याप्त जनसहमति, पुनर्वास की स्पष्ट नीति और संवैधानिक प्रक्रियाओं के खनन विस्तार की तैयारी की जा रही है, जिससे आदिवासी समाज के अस्तित्व पर संकट उत्पन्न हो गया है।
पांचवीं अनुसूची और पेसा कानून की अनदेखी का आरोप
सम्मेलन में वक्ताओं ने कहा कि सरगुजा संभाग संविधान की पांचवीं अनुसूची के अंतर्गत आने वाला अनुसूचित क्षेत्र है, जहां आदिवासी समुदायों के सामाजिक, सांस्कृतिक और भूमि अधिकारों की विशेष संवैधानिक सुरक्षा सुनिश्चित की गई है।
वक्ताओं ने कहा कि संविधान के अनुच्छेद 244 के तहत अनुसूचित क्षेत्रों में प्रशासन और जनजातीय हितों की रक्षा के लिए विशेष प्रावधान किए गए हैं। वहीं पेसा कानून 1996 ग्राम सभाओं को स्थानीय संसाधनों, भूमि अधिग्रहण और विकास परियोजनाओं पर निर्णय लेने का अधिकार देता है। इसके अतिरिक्त वन अधिकार अधिनियम 2006 आदिवासी और परंपरागत वनवासियों को वन भूमि पर पारंपरिक अधिकार प्रदान करता है।
ग्रामीणों का कहना है कि यदि किसी परियोजना के कारण आदिवासी समुदायों का विस्थापन होता है, तो ग्राम सभा की स्पष्ट सहमति, पारदर्शी पुनर्वास नीति और संवैधानिक प्रक्रिया अनिवार्य है। बिना इन प्रक्रियाओं के किसी भी प्रकार की कार्रवाई को ग्रामीणों ने अन्यायपूर्ण बताया।
“यह केवल भूमि नहीं, हमारी पहचान और संस्कृति का प्रश्न”
सम्मेलन को संबोधित करते हुए सर्व आदिवासी समाज युवा प्रभाग के प्रांतीय अध्यक्ष सुभाष परते ने कहा कि यह संघर्ष केवल जमीन बचाने का नहीं, बल्कि आदिवासी अस्मिता, संस्कृति और संवैधानिक अधिकारों की रक्षा का संघर्ष है। उन्होंने कहा कि आदिवासी समाज सदियों से प्रकृति के साथ सहअस्तित्व में जीवन जीता आया है और आज उन्हीं मूल निवासियों को विकास की अंधी दौड़ में उजाड़ने की तैयारी की जा रही है।
उन्होंने कहा कि संविधान ने आदिवासी समाज को सम्मानपूर्वक जीवन जीने का अधिकार दिया है। यदि किसी भी प्रकार से असंवैधानिक बलपूर्वक विस्थापन का प्रयास किया गया तो सर्व आदिवासी समाज लोकतांत्रिक और संवैधानिक तरीके से उसका विरोध करेगा।
सम्मेलन में उठी प्रमुख मांगें
सम्मेलन में ग्रामीणों एवं सामाजिक प्रतिनिधियों द्वारा कई महत्वपूर्ण मांगें रखी गईं, जिनमें—
ग्राम सभाओं की सहमति के बिना किसी भी खनन परियोजना पर रोक
वन अधिकार कानून एवं पेसा कानून का पूर्ण पालन
विस्थापन से पूर्व पारदर्शी पुनर्वास एवं रोजगार नीति
आदिवासी संस्कृति, धार्मिक स्थलों और प्राकृतिक संसाधनों की सुरक्षा
स्थानीय जनप्रतिनिधियों एवं प्रशासन द्वारा ग्रामीणों के साथ खुली जनसुनवाई
संविधान प्रदत्त अधिकारों की रक्षा हेतु स्वतंत्र निगरानी व्यवस्था
संवैधानिक चेतना और सामाजिक एकता का संदेश
सम्मेलन में वक्ताओं ने युवाओं से संविधान, अधिकारों और सामाजिक एकता के प्रति जागरूक रहने का आह्वान किया। उन्होंने कहा कि आदिवासी समाज की शक्ति उसकी एकजुटता, संस्कृति और प्रकृति से जुड़ी जीवनशैली में निहित है।
कार्यक्रम में प्रांतीय अध्यक्ष युवा प्रभाग सुभाष परते, संभागीय अध्यक्ष राजा क्षितिज सिंह, डॉ. अमृत मारवी, आर.एन. टेकाम, बीपीएस पोया एवं सत्यनारायण पैकरा सहित प्रदेश, संभाग, जिला एवं ब्लॉक स्तर के अनेक पदाधिकारी उपस्थित रहे।
सम्मेलन का समापन “जय आदिवासी – जय संविधान” के उद्घोष के साथ हुआ, जहां उपस्थित ग्रामीणों ने अपने संवैधानिक अधिकारों की रक्षा के लिए संगठित होकर संघर्ष जारी रखने का संकल्प लिया।


