मूकनायक/राष्ट्रीय प्रभारी ओमप्रकाश वर्मा
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सामाजिक ताने-बाने पर मंडराता खतरा एक स्वस्थ और समृद्ध समाज की नींव हमेशा ‘आपसी जुड़ाव’, ‘सहानुभूति’ और ‘भाईचारे’ के पत्थरों पर टिकी होती है। समाज कोई ईंट-पत्थरों से बनी इमारत नहीं, बल्कि इंसानी रिश्तों और जज्बातों से बुना हुआ एक तानाबाना है, लेकिन आज के आधुनिक दौर में इस ताने-बाने को मतभेद और मनभेद की दीमक खोखला कर रही है। समाज में हर इंसान का अलग-अलग दृष्टिकोण होना या मतभेद होना स्वाभाविक है और यही से नए विचारों और प्रगति का जन्म होता है, परंतु समस्या तब विकराल रूप ले लेती है, जब यह मतभेद अहंकार की वजह से मनभेद (दिलों की दूरी) में बदल जाता है। आज लोग विचारों की भिन्नता को व्यक्तिगत दुश्मनी मान बैठते हैं। “यदि तुम मेरी विचारधारा से सहमत नहीं हो, तो तुम मेरे शुभचिंतक नहीं हो सकते”—यही संकीर्ण सोच समाज को ध्रुवीकरण की ओर धकेल रही है।
आज वर्चुअल दुनिया में लोग एक-दूसरे के करीब आ रहे हैं, लेकिन हकीकत में अपनों से ही दूर होते जा रहे हैं। कमेंट बॉक्स की बहसें अब परिवारों और पड़ोस के रिश्तों में कड़वाहट घोल रही हैं। जब दिलों में मैल आ जाता है, तो मिलकर काम करने की सामूहिक शक्ति खत्म हो जाती है। जिस समाज की ऊर्जा आपसी विवादों और मनमुटाव में नष्ट होगी, वह विकास की नई ऊंचाइयों को कभी नहीं छू सकता।समाज की प्रगति केवल ऊंची इमारतों, तकनीकी आविष्कारों या जीडीपी से नहीं नापी जा सकती। असली प्रगति इस बात में है कि एक नागरिक के रूप में हम एक-दूसरे के कितने करीब हैं। मतभेदों का स्वागत कीजिए क्योंकि वे बुद्धि को निखारते हैं, लेकिन मनभेदों को अपने आंगन में कदम मत रखने दीजिए क्योंकि वे समाज को उजाड़ देते हैं। जब तक दिलों के फासले कम नहीं होंगे, तब तक एक समरस और सशक्त समाज की कल्पना अधूरी है।
बिरदी चंद गोठवाल
प्रदेश प्रभारी मूकनायक, हरियाणा

