।मूकनायक न्यूज। दिलीप कुमार/सिरोही/राजस्थान।
डिजिटल दुनिया के अपराधियों से लड़ने का सबसे मजबूत हथियार माता-पिता और बच्चों के बीच मजबूत संवाद है। खुली बातचीत, एक समझदारी भरा कदम और समय पर सतर्कता आपके बच्चे को एक बड़े खतरे से बचा सकती है।
आजकल अपराधी सड़कों से ज्यादा सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म्स जैसे Facebook, Instagram, Snapchat और WhatsApp पर सक्रिय हो गए हैं। डिजिटल दुनिया मेंअपराधी खुद को हमउम्र बताकर बातचीत शुरू करते हैं। वे बच्चियों की तारीफ करते हैं और उनकी भावनात्मक कमियों का फायदा उठाते हैं।गुमनामी का फायदा उठाकर ये लोग नाबालिग बच्चियों को सबसे आसान शिकार बनाते हैं।NCRB और UNICEF की हालिया रिपोर्ट्स के मुताबिक, साइबर अपराध के 60% से ज्यादा मामलों में टीनएज लड़कियों को टारगेट किया जाता है। अपराधी अक्सर फेक आईडी बनाकर, किसी लड़के की फोटो या फेमस सेलिब्रिटी के नाम से प्रोफाइल तैयार करते हैं। पहले दोस्ती, फिर इमोशनल बातें, गिफ्ट का लालच जैसे “तुम्हें आईफोन दिला दूंगा,” “महंगे कपड़े या पॉकेट मनी दूंगा”- ऐसे लालच देकर बच्चियों का भरोसा जीता जाता है या गेमिंग-कैरियर का झांसा देकर भरोसा जीतते हैं। हाल ही में ऐसे कई मामले सामने आए हैं जहाँ इंस्टाग्राम पर ‘मॉडलिंग’ का झांसा देकर या स्नेपचेट पर ‘स्ट्रेक्स’ भेजने के बहाने बच्चियों को सुनसान जगहों पर बुलाया गया और उनके साथ अनहोनी होती हैं।दोस्ती होने के बाद ये लोग प्राइवेट फोटो, पर्सनल डिटेल्स या घर का एड्रेस मांगने लगते हैं। कई केस में ब्लैकमेलिंग, मॉर्ड फोटो वायरल करने की धमकी या पैसों की मांग तक बात पहुंच जाती है।एक बार जब बच्ची अपनी फोटो या निजी जानकारी साझा कर देती है, तो अपराधी उसे वायरल करने की धमकी देकर उसे अपनी हर बात मानने पर मजबूर कर देते हैं। Snapchat की डिसअपियरिंग मैसेज और Instagram के ‘Vanish Mode’ जैसे फीचर्स का गलत इस्तेमाल करके सबूत मिटाना इनके लिए आसान हो जाता है। इसलिए माता पिता को अपने बच्चों के साथ डर नहीं, भरोसे का रिश्ता बनाना चाहिए। ऐसा माहौल दें कि वे बिना झिझक, बिना सज़ा के डर के आपसे हर बात शेयर कर सकें।अपनी नाबालिग बेटियों को ये सिखाएं कि इंटरनेट की दुनिया में अगर कोई भी व्यक्ति, मैसेज या रिक्वेस्ट उन्हें थोड़ा भी अजीब, डरावना या असहज लगे, तो छुपाएं नहीं तुरंत मम्मी-पापा या किसी भरोसेमंद बड़े को बताएं।बच्चियों को ये बात अच्छे से समझाएं कि इंटरनेट पर शेयर की गई कोई भी फोटो, वीडियो या जानकारी 100% “प्राइवेट” कभी नहीं होती। एक बार नेट पर गई चीज़, वहां से पूरी तरह मिटाना लगभग नामुमकिन है। स्क्रीनशॉट, डाउनलोड या स्क्रीन रिकॉर्डिंग से कोई भी उसे कॉपी कर सकता है।इंटरनेट पर मिला हर चेहरा दोस्त नहीं होता। चाहे DP कितनी भी अच्छी हो, फॉलोअर्स कितने भी हों। इसलिए किसी भी अनजान व्यक्ति की फ्रेंड रिक्वेस्ट, फॉलो रिक्वेस्ट या मैसेज रिक्वेस्ट को बिना सोचे ‘Decline’ या ‘Ignore’ करें क्योंकि असली दोस्ती कमेंट बॉक्स में नहीं बनती हैं।माता पिता अपनी बच्चियों को समझाए कि अपने घर का पता, स्कूल का नाम, कोचिंग की टाइमिंग, लाइव लोकेशन या “अभी मैं बाहर हूँ मार्केट में या मॉल में हूं” जैसी स्टोरी कभी भी पब्लिक न करें। चेक-इन, जियो-टैग और स्टोरी लोकेशन स्टिकर बंद रखें। अपराधी इन्हीं डिटेल्स से आपका रूट मैप बनाते हैं।भरोसा सबसे बड़ा सेफ्टी टूल है, लेकिन भरोसे के साथ थोड़ा टेक्निकल लॉक भी जरूरी है। बच्चों के फोन में Google Family Link, Microsoft Family Safety या Apple Screen Time जैसे पैरेंटल कंट्रोल ऐप्स का इस्तेमाल करके भी सुरक्षित किया जा सकता हैं।इसके अलावा हर सोशल मिडिया अकाउंट को हमेशा प्राइवेट रखना चाहिए।Instagram, Facebook, Snapchat आदि हर ऐप की सेटिंग में जाकर अकाउंट को Private’ कर दें। पब्लिक अकाउंट मतलब आपका घर बिना दरवाज़े का यानि कोई भी अंजान व्यक्ति निजी पोस्ट जानकारी देख सकता हैं। Private मोड में सिर्फ आपके Approved फॉलोअर्स ही फोटो, रील्स और स्टोरी देख पाएंगे। साथ ही ‘Message Requests from Strangers’ और ‘Tagging’ को भी ऑफ कर दें।जरूरी बात ये भी हैं कि पैरेंटल कंट्रोल ‘जासूसी’ के लिए नहीं, ‘सुरक्षा’ के लिए है। ऐप इंस्टॉल करने से पहले बच्चे को बैठाकर प्यार से समझाएं “ये तुम्हारी सेफ्टी बेल्ट है। जैसे कार में बेल्ट लगाते हैं, वैसे ही नेट की दुनिया में ये ऐप लगाते हैं।”बच्चों के चेतावनी के संकेत पहचानें, डांट नहीं सहारा दें। अगर आपकी बच्ची अचानक गुमसुम रहने लगे, छोटी-छोटी बात पर चिड़चिड़ाए, फोन आते ही स्क्रीन उलट दे या छिपाने लगे, और देर रात तक जागकर चुपके-चुपके चैटिंग करे तो इन्हें ‘टीनएज मिजाज़’ कहकर नज़रअंदाज़ न करें। ये डिजिटल दुनिया में किसी परेशानी के साइलेंट सिग्नल हो सकते हैं।ऐसे में सतर्क हो जाएं, पर सख्त नहीं। फोन छीनने या गुस्सा करने से बच्चा और दूर हो जाएगा। उसकी आंखों में आंख डालकर, प्यार से पूछेंः “बेटा, सब ठीक है न? अगर कोई परेशान कर रहा है तो मैं हूं न तुम्हारे साथ। तुम अकेली नहीं हो।” हिम्मत दें।याद रखें, डर बच्चे को चुप कराता है और भरोसा उसे बोलना सिखाता है। आपका एक शांत सवाल, एक गर्म जादू की झप्पी, उसे किसी बड़े खतरे से बचा सकती है। डिजिटल दुनिया के अपराधियों से लड़ने का सबसे मजबूत हथियार है माता-पिता और बच्चे के बीचठ जुड़ता हुआ संवाद और माँ बाप की सतर्कता।
दिलीप कुमार(डि के सिरोही),Btech, MA, Phd(hc), गोल (सिरोही) राजस्थान, 9982678596

