मूकनायक/राष्ट्रीय प्रभारी ओमप्रकाश वर्मा
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प्रकृति हो या मानवीय व्यवहार, हर चीज़ का अपना एक सही समय होता है। जीवन में सफलता और सार्थकता केवल इस बात पर निर्भर नहीं करती कि हम क्या करते हैं, बल्कि इस पर भी निर्भर करती है कि हम उसे कब करते हैं। समय की महत्ता को समझाने के लिए कच्चे फल और असामयिक शब्दों का उदाहरण अत्यंत सटीक है। प्रकृति का नियम है कि फल को मीठा और पुष्ट होने के लिए एक निश्चित समय तक वृक्ष से पोषण प्राप्त करना पड़ता है। यदि हम अधीर होकर किसी फल को मौसम से पहले तोड़ लेते हैं, तो वह ना केवल स्वाद में कसैला और खट्टा होता है, बल्कि स्वास्थ्य के लिए भी लाभकारी नहीं होता। ठीक इसी तरह, जीवन में बिना तैयारी के किया गया कोई भी कार्य अधपके फल की भाँति कड़वा अनुभव देता है।
शब्दों में भी अपार शक्ति होती है, लेकिन उनकी शक्ति उनके ‘संदर्भ’ और ‘समय’ में निहित होती है। यदि हम किसी परिस्थिति को पूरी तरह समझे बिना, वक्त से पहले प्रतिक्रिया देते हैं, तो वह अक्सर विवाद या पछतावे का कारण बनती है। सही बात भी अगर गलत समय पर कही जाए, तो वह अपना मूल्य खो देती है। उदाहरण के लिए, क्रोध में बोला गया सच भी सुनने वाले को केवल चुभता है, सुधारता नहीं। जिस प्रकार मौसम आने पर वृक्ष खुद-ब-खुद मीठे फल देते हैं, उसी प्रकार सही वक्त पर बोले गए शब्द समाज में सम्मान और शांति लाते हैं। हमें यह समझना चाहिए कि हर बीज को पौधा बनने में समय लगता है। वक्त से पहले बोले गए शब्द केवल शोर पैदा करते हैं और वक्त से पहले तोड़े गए फल केवल बर्बादी। जीवन की सार्थकता इसी में है कि हम समय की गति को पहचानें और उसके साथ तालमेल बिठाकर चलें।
बिरदी चंद गोठवाल
प्रदेश प्रभारी मूकनायक, हरियाणा

