Tuesday, September 29, 2026
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“संविधान हाथ में, घोड़े पर सम्मान—लेकिन सिस्टम पर सवाल: ललितपुर की बिन्नाइकी ने सरकार की मंशा पर खड़े किए प्रश्न”

विजयराम आजाद उप सम्पादक।

ललितपुर जनपद के खितवास चौकी क्षेत्र अंतर्गत ग्राम चढ़रऊ में अहिरवार समाज के रामसिंह पुत्र गिल्लू की बिन्नाइकी पहली बार घोड़े पर निकली—एक ऐसा दृश्य जो आजादी के दशकों बाद भी “ऐतिहासिक” कहलाने को मजबूर है। यह आयोजन जहां सामाजिक बदलाव का प्रतीक बना, वहीं इसने शासन-प्रशासन और सरकारों की मंशा पर गंभीर सवाल भी खड़े कर दिए। मौके पर भीम आर्मी भारत एकता मिशन और आजाद समाज पार्टी के कार्यकर्ताओं सहित बड़ी संख्या में लोग मौजूद रहे, जिनके सहयोग से यह संभव हो सका।

सबसे बड़ा सवाल यही है कि जब संविधान सभी नागरिकों को समानता और गरिमा का अधिकार देता है, तो फिर एक दलित दूल्हे को घोड़े पर बैठकर बिन्नाइकी निकालने के लिए प्रशासन से गुहार क्यों लगानी पड़ती है? क्यों आज भी सामाजिक दबाव और भय ऐसा है कि बिना पुलिस और संगठनों की मौजूदगी के एक सामान्य परंपरा भी पूरी नहीं हो पाती? यह स्थिति सीधे तौर पर सरकारों की इच्छाशक्ति पर सवाल खड़ा करती है।

सरकारें अक्सर मंचों से “सबका साथ, सबका विकास” और सामाजिक समरसता की बात करती हैं, लेकिन जमीनी हकीकत यह है कि दलित समुदाय को अपने बुनियादी सम्मान के अधिकार के लिए भी संघर्ष करना पड़ रहा है। अगर सरकार वास्तव में संवैधानिक मूल्यों के प्रति गंभीर होती, तो ऐसे मामलों में विशेष व्यवस्था या दबाव की जरूरत ही नहीं पड़ती। गांवों में पहले से ही ऐसा माहौल होता जहां कोई भी नागरिक बिना भय के अपने अधिकारों का उपयोग कर सके।

इस पूरे घटनाक्रम में प्रशासन ने जरूर सक्रियता दिखाई और शांति बनाए रखने के लिए बैठक कर बिन्नाइकी निकलवाई, लेकिन यह “समाधान” नहीं बल्कि “तात्कालिक प्रबंधन” भर है। असली सवाल यह है कि क्या सरकारों ने ऐसा स्थायी सामाजिक वातावरण बनाने के लिए ठोस कदम उठाए हैं, जहां जाति के आधार पर किसी को रोका न जाए? अगर नहीं, तो यह मानना पड़ेगा कि सरकार की नीतियां और उनकी मंशा दोनों ही धरातल पर कमजोर साबित हो रही हैं।

इस ऐतिहासिक आयोजन में उप संपादक मूकनायक विजयराम आजाद की विशेष भूमिका रही, जिन्होंने मौके पर पहुंचकर न केवल पूरी घटना की रिपोर्टिंग की, बल्कि गांव में घोड़े की लगाम पकड़कर इस ऐतिहासिक क्षण को साकार करने में प्रत्यक्ष योगदान दिया। वहीं कुंवर लाल गौतम, महेंद्र चौधरी, कृपाल गौतम (कुम्हैढ़ी पत्रकार), शिव यादव (जिलाध्यक्ष युवा मोर्चा, आजाद समाज पार्टी), राहुल गौतम, इंद्रपाल सूर्यवंशी, प्रभुदयाल गौतम और राहुल (ललितपुर) सहित अन्य लोग भी इस अवसर पर मौजूद रहे और सामाजिक एकजुटता का परिचय दिया।

दूल्हे का हाथ में संविधान लेकर घोड़े पर बैठना सिर्फ एक प्रतीक नहीं था, बल्कि यह एक तरह से सरकार और व्यवस्था को आईना दिखाना भी था, कि जिन अधिकारों को लागू करना राज्य की जिम्मेदारी है, उन्हें पाने के लिए आज भी आम नागरिक को संघर्ष करना पड़ रहा है।

ललितपुर की यह घटना एक चेतावनी भी है और एक सवाल भी क्या भारत में संविधान सिर्फ किताबों तक सीमित रहेगा, या सरकारें इसे जमीन पर उतारने की वास्तविक जिम्मेदारी निभाएंगी?

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