मूकनायक/राष्ट्रीय प्रभारी ओमप्रकाश वर्मा
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चेतना के सूर्य और आधुनिक भारत के निर्माता डॉ. भीमराव अंबेडकर वह व्यक्तित्व हैं, जिन्होंने सदियों से अंधकार में जी रहे करोड़ों लोगों के जीवन में शिक्षा, समानता और अधिकारों का नया सवेरा लाया। उन्होंने केवल राह नहीं दिखाई, बल्कि उस राह पर आने वाली हर बाधा को अपने तर्कों और संघर्षों से ढ़हा दिया। बाबा साहब का मानना था कि शिक्षा ही वह शेरनी का दूध है, जो इसे पिएगा, वह दहाड़ेगा। उन्होंने समाज के वंचित वर्ग को यह समझाया कि बिना मानसिक क्रांति के भौतिक स्वतंत्रता अधूरी है। उनके लिए शिक्षा का अर्थ केवल डिग्रियां हासिल करना नहीं, बल्कि स्वयं के अस्तित्व और स्वाभिमान को पहचानना था।
डॉ. अंबेडकर ने जिस भारत का सपना देखा था, उसकी नींव ‘समानता’ पर टिकी थी। उन्होंने जातिगत भेदभाव की बेड़ियों को तोड़ने के लिए अपना पूरा जीवन समर्पित कर दिया। भारतीय संविधान के माध्यम से उन्होंने यह सुनिश्चित किया कि देश का हर नागरिक—चाहे वह किसी भी जाति, धर्म या लिंग का हो—कानून की नजर में बराबर हो । अधिकार कभी मांगने से नहीं, बल्कि संघर्ष से मिलते हैं—यह पाठ अंबेडकर जी ने पूरी दुनिया को पढ़ाया। काला राम मंदिर सत्याग्रह से लेकर महाड़ सत्याग्रह तक, उनके हर आंदोलन का उद्देश्य केवल सुविधाएं प्राप्त करना नहीं, बल्कि मनुष्य को उसकी गरिमा वापस दिलाना था।
“शिक्षित बनो, संगठित रहो और संघर्ष करो।” — यह केवल एक नारा नहीं, बल्कि आत्म-सम्मान के साथ जीने का एक संपूर्ण दर्शन है। आज हम जिस आधुनिक और लोकतांत्रिक भारत में सांस ले रहे हैं, उसकी जड़ों को सींचने का काम डॉ. अंबेडकर के विचारों ने किया है। उनके विचार आज भी उतने ही प्रासंगिक हैं, जितने दशकों पहले थे। वे एक ऐसे मार्गदर्शक थे जिन्होंने न केवल दबे-कुचले वर्ग को उनके ‘हक’ से रूबरू कराया, बल्कि उन्हें समाज की मुख्यधारा में सम्मानजनक स्थान दिलाने के लिए एक मजबूत संवैधानिक कवच भी प्रदान किया। डॉ. अंबेडकर का जीवन इस बात का प्रमाण है कि एक अकेला व्यक्ति यदि ज्ञान और संकल्प से लैस हो, तो वह पूरे समाज का भाग्य बदल सकता है।
बिरदी चंद गोठवाल
प्रदेश प्रभारी मूकनायक, हरियाणा

