डॉ. बाबासाहेब अंबेडकर की जयंती पर्व पर : जागरूकता का दुखद अभाव और प्रचार की अनिवार्यता
✍🏻 नरेंद्र
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भारत के संविधान निर्माता, दलित उद्धारक, सामाजिक न्याय के महान योद्धा डॉ. भीमराव रामजी अंबेडकर का जन्म 14 अप्रैल 1891 को हुआ था। वर्ष 2026 में उनकी 135वीं जयंती की दहलीज पर खड़े हैं। लेकिन यह कितना दुखद और चिंताजनक है कि इतने लंबे समय बीत जाने के बाद भी, जयंती के अवसर पर हमें अभी भी लोगों को जागरूक करना पड़ता है, प्रचार करना पड़ता है, पोस्टर लगाने पड़ते हैं, सोशल मीडिया पर कैंपेन चलाने पड़ते हैं और स्कूल-कॉलेजों में विशेष कार्यक्रम आयोजित करने पड़ते हैं। क्या वाकई डॉ. अंबेडकर की विचारधारा इतनी अपरिचित हो गई है कि उन्हें “प्रचार” की जरूरत पड़ती है? या फिर हमारी समाज-व्यवस्था, शिक्षा प्रणाली और राजनीतिक संस्कृति ने उन्हें इतना सीमित कर दिया है कि उनकी स्मृति केवल एक दिन की औपचारिकता बनकर रह गई है? इस लेख में मैंने इसी दुखद सत्य को विस्तार से उजागर करने की कोशिश की है – क्यों 134 वर्ष बाद भी जागरूकता की कमी है, इसका क्या कारण है, इसके सामाजिक-राजनीतिक परिणाम क्या हैं और इससे बाहर निकलने का रास्ता क्या हो सकता है।
सबसे पहले यह समझना जरूरी है कि डॉ. बाबासाहेब अंबेडकर कौन थे और उनकी विरासत कितनी व्यापक है। वे केवल एक व्यक्ति नहीं, बल्कि एक आंदोलन थे, एक संस्था थे। उन्होंने छुआछूत, जातिवाद और असमानता के खिलाफ आजीवन संघर्ष किया। महाड सत्याग्रह (1927), पूना पैक्ट (1932), और सबसे महत्वपूर्ण – भारतीय संविधान का निर्माण (1950) – ये सब उनके जीवन के ऐसे मोड़ हैं जिन्होंने भारत को आधुनिक लोकतंत्र की दिशा दी। उन्होंने महिलाओं, श्रमिकों, किसानों और दलितों के अधिकारों के लिए लड़ाई लड़ी। “शिक्षित बनो, संघर्ष करो, संगठित हो” – उनका यह मंत्र आज भी प्रासंगिक है। लेकिन दुर्भाग्य से, आज भी बहुत से स्कूलों में बच्चों को अंबेडकर का पूरा जीवन परिचय नहीं पढ़ाया जाता। पाठ्यक्रम में उन्हें केवल “संविधान निर्माता” तक सीमित कर दिया जाता है। उनकी सामाजिक क्रांति, बौद्ध धर्म अपनाने का महत्व, हिंदू समाज की आलोचना और आर्थिक विचारधारा को या तो छोड़ दिया जाता है या संक्षिप्त कर दिया जाता है। नतीजा ? एक पूरी पीढ़ी ऐसी तैयार हो रही है जो अंबेडकर को “जयंती वाला नेता” समझती है, न कि क्रांतिकारी विचारक।
यह जागरूकता की कमी क्यों बनी हुई है ? इसके कई गहरे कारण हैं।
पहला और सबसे बड़ा कारण हमारी शिक्षा प्रणाली है। NCERT के पाठ्यपुस्तकों में कक्षा 6 से 12 तक अंबेडकर का उल्लेख बहुत कम और सतही है। जबकि गांधी, नेहरू, पटेल जैसे नेताओं की जीवनी विस्तार से पढ़ाई जाती है, डॉ. अंबेडकर को अक्सर “दलित नेता” के रूप में पेश किया जाता है, न कि राष्ट्रीय स्तर के विचारक के रूप में। विश्वविद्यालयों में भी “अंबेडकर स्टडीज” केंद्र तो हैं, लेकिन वे मुख्यधारा के पाठ्यक्रम का हिस्सा नहीं बन पाते। ग्रामीण क्षेत्रों में तो स्थिति और भी खराब है। वहाँ स्कूलों में शिक्षक खुद अंबेडकर के बारे में कम जानते हैं। नतीजा – बच्चे बड़े होकर भी नहीं जान पाते कि संविधान के अनुच्छेद 17 (छुआछूत का उन्मूलन) और अनुच्छेद 15, 16 (समानता का अधिकार) अंबेडकर की देन हैं।
दूसरा कारण :- सामाजिक-राजनीतिक है। भारत में जाति व्यवस्था अभी भी जिंदा है। 2023-24 के विभिन्न सर्वेक्षणों (NFHS-5 और अन्य रिपोर्टों) के अनुसार, ग्रामीण भारत में अभी भी 30-40% आबादी छुआछूत का सामना करती है। शादी-ब्याह, नौकरियों और गाँव की पंचायतों में जाति का प्रभाव स्पष्ट है। ऐसे में अंबेडकर की विचारधारा को “खतरनाक” माना जाता है क्योंकि वे जाति को जड़ से उखाड़ फेंकने की बात करते थे। कुछ राजनीतिक दल उन्हें केवल वोट बैंक के रूप में इस्तेमाल करते हैं। जयंती पर बड़े-बड़े रैली निकालते हैं, मूर्तियाँ सजाते हैं, लेकिन उनके विचारों को लागू करने में कोई दिलचस्पी नहीं दिखाते। विपक्षी दल उन्हें “अपना” बताते हैं, सत्ताधारी दल “राष्ट्रीय” बताते हैं – लेकिन असल में दोनों ही उन्हें प्रचार का माध्यम बनाते हैं, न कि प्रेरणा स्रोत।
तीसरा कारण :- मीडिया और लोकप्रिय संस्कृति है। मुख्यधारा के टीवी चैनल और समाचार पत्र जयंती के दिन मात्र 2-3 मिनट की खबर दिखाते हैं। सोशल मीडिया पर #AmbedkarJayanti ट्रेंड करता है, लेकिन ज्यादातर मीम्स, कोट्स और सेल्फी के रूप में। गहरी बहस, उनके ग्रंथों (जैसे “एनिहिलेशन ऑफ कास्ट”, “कास्ट इन इंडिया”, “बुद्धा एंड हिज धम्म”) पर चर्चा बहुत कम होती है। बॉलीवुड या ओटीटी प्लेटफॉर्म पर भी अंबेडकर पर कोई बड़ी फिल्म या वेब सीरीज नहीं बनी है जो उनकी पूरी जिंदगी को सही ढंग से दिखाए। जबकि गांधी पर दर्जनों फिल्में हैं। यह चुप्पी जानबूझकर है या नहीं, लेकिन इसका असर यह पड़ता है कि युवा पीढ़ी अंबेडकर को “पुराना” या “दलित मुद्दों तक सीमित” मान लेती है।
चौथा कारण :- आर्थिक और शहरी-ग्रामीण विभाजन है। शहरों में मध्यम वर्ग के युवा अंबेडकर को पढ़ते हैं क्योंकि वे अम्बेडकराइट संगठनों, यूट्यूब चैनलों या किताबों तक पहुँच पाते हैं। लेकिन ग्रामीण भारत, छोटे कस्बों और गरीब बस्तियों में स्थिति अलग है। वहाँ बिजली, इंटरनेट और किताबों की कमी है। दलित युवा जो सबसे ज्यादा अंबेडकर से जुड़ना चाहते हैं, उन्हें संसाधन नहीं मिलते। 134 वर्ष बाद भी उनके गांवों में स्कूलों के नाम पर अंबेडकर विद्यालय हैं, लेकिन उनमें पढ़ाई की गुणवत्ता इतनी खराब है कि बच्चे 10वीं पास करके भी अंबेडकर के नाम का मतलब नहीं समझ पाते।
इस जागरूकता अभाव के परिणाम बहुत गंभीर हैं :-
सबसे बड़ा परिणाम यह है कि सामाजिक न्याय की लड़ाई अधर में लटकी रहती है। आरक्षण को “विपरीत भेदभाव” कहा जाता है, जबकि डॉ. अंबेडकर ने इसे अस्थायी उपाय माना था। लेकिन आज भी 75 वर्ष बाद आरक्षण की जरूरत क्यों बनी हुई है ? क्योंकि शिक्षा और नौकरियों में समानता नहीं आई। 2024 के विभिन्न आंकड़ों के अनुसार, उच्च शिक्षा में दलितों की भागीदारी अभी भी 15% से नीचे है (जबकि आबादी में उनका हिस्सा 16.6% है)। नौकरियों में प्रमोशन में बाधाएँ, आत्महत्या की घटनाएँ (जैसे रोहित वेमुला, पायल तड़वी केस) – ये सब अंबेडकर की चेतावनी को सही साबित करते हैं कि यदि जाति नहीं मिटी तो लोकतंत्र भी कमजोर होगा।
दूसरा परिणाम :- राजनीतिक है। अंबेडकर ने चेतावनी दी थी कि राजनीतिक स्वतंत्रता बिना सामाजिक-आर्थिक स्वतंत्रता के व्यर्थ है। आज हम देखते हैं कि चुनावों में जाति समीकरण सबसे बड़ा फैक्टर है। पार्टियाँ जाति के नाम पर वोट मांगती हैं, लेकिन अंबेडकर के “एक व्यक्ति, एक वोट, एक मूल्य” के सिद्धांत को लागू नहीं करतीं। परिणाम – लोकतंत्र मजबूत दिखता है, लेकिन सामाजिक समता कमजोर रहती है।
तीसरा परिणाम :- सांस्कृतिक है। अंबेडकर ने कहा था – “मैं हिंदू नहीं बनना चाहता क्योंकि हिंदू धर्म मुझे इंसान नहीं मानता।” उन्होंने 1956 में 5 लाख अनुयायियों के साथ बौद्ध धर्म अपनाया। लेकिन आज भी बहुत से लोग इसे “धर्म परिवर्तन” कहकर नकारते हैं। उनकी बौद्ध दर्शन की व्याख्या को नजरअंदाज कर दिया जाता है। नतीजा – युवा पीढ़ी को लगता है कि अंबेडकर “हिंदू विरोधी” थे, जबकि वे वास्तव में “जातिवाद विरोधी” थे।
फिर भी कुछ प्रगति भी हुई है। पिछले 20-25 वर्षों में अम्बेडकराइट आंदोलन मजबूत हुआ है। दिल्ली, मुंबई, पुणे, लखनऊ जैसे शहरों में युवा विद्वान, लेखक, वकील और छात्र उनके ग्रंथों का अध्ययन कर रहे हैं। सोशल मीडिया पर “Dalit History Month” जैसे कैंपेन चल रहे हैं। कुछ राज्य सरकारों (महाराष्ट्र, उत्तर प्रदेश) ने अंबेडकर स्मृति पार्क, विश्वविद्यालय और पुस्तकालय बनाए हैं। लेकिन ये प्रयास अभी भी छिटपुट हैं, व्यवस्थित नहीं।
तो अब सवाल यह है – इस दुखद स्थिति से कैसे निकलें?
सबसे पहले शिक्षा प्रणाली में बदलाव। अंबेडकर को कक्षा 8 से 12 तक अनिवार्य पाठ्यक्रम का हिस्सा बनाना चाहिए। उनके सभी 22 खंडों वाले लेखन को सरल भाषा में उपलब्ध कराना चाहिए। हर स्कूल में “अंबेडकर चेयर” या अध्ययन केंद्र स्थापित करने चाहिए।
दूसरा – मीडिया और संस्कृति। सरकारी और निजी चैनलों को अंबेडकर पर साल भर कार्यक्रम चलाने चाहिए, न कि केवल जयंती पर। बॉलीवुड को उनकी जीवन पर बड़ी फिल्म बनानी चाहिए। यूट्यूब, इंस्टाग्राम पर सर्टिफाइड कंटेंट क्रिएटर्स को प्रोत्साहन मिलना चाहिए।
तीसरा – राजनीतिक इच्छाशक्ति। सभी पार्टियों को अंबेडकर को “राष्ट्रीय” नेता मानकर उनके विचारों को नीतियों में शामिल करना चाहिए – जैसे भूमि सुधार, शिक्षा का अधिकार, स्वास्थ्य और रोजगार में समानता। आरक्षण को केवल नौकरियों तक सीमित न रखकर, निजी क्षेत्र में भी विस्तार देना चाहिए।
चौथा – व्यक्तिगत स्तर पर जिम्मेदारी। हर शिक्षित नागरिक को अपने घर, मोहल्ले और गाँव में अंबेडकर की किताबें बाँटनी चाहिए, चर्चा करनी चाहिए। जयंती को केवल रैली का दिन न बनाकर, पूरे वर्ष “अंबेडकर जागरण” अभियान चलाना चाहिए।
अंत में, डॉ. अंबेडकर की 134 वर्ष बाद भी जागरूकता की जरूरत इस बात का सबूत है कि हमने उनकी विरासत को अपनाया नहीं, केवल पूजा की है। जयंती मनाना आसान है, लेकिन उनके सपनों को साकार करना कठिन। यदि हम सचमुच उन्हें श्रद्धांजलि देना चाहते हैं तो हमें उनके मंत्र को अपनाना होगा – “शिक्षित बनो, संघर्ष करो, संगठित हो।” जब तक समाज में छुआछूत, जातिवाद और असमानता रहेगी, तब तक अंबेडकर की जयंती “प्रचार” की जरूरत महसूस होती रहेगी। लेकिन अगर हम सच में बदलना चाहें तो यह दुखद सत्य कल की बात बन सकता है। आइए, इस जयंती पर संकल्प करें कि हम अंबेडकर को केवल पोस्टर पर नहीं, बल्कि अपने व्यवहार, नीतियों और शिक्षा में जीवित करेंगे। तभी उनकी 134 वर्ष पुरानी चेतावनी सार्थक होगी और भारत वास्तव में समतामूलक लोकतंत्र बन सकेगा।

