Friday, April 17, 2026
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महात्मा ज्योतिबा फुले: सामाजिक क्रांति की मशाल

11 अप्रैल को जब पूरा देश महात्मा ज्योतिबा फुले की जन्म जयंती मना रहा है, तब हमें याद आता है कि भारत की सामाजिक क्रांति के सबसे बड़े योद्धा, सबसे साहसी विचारक और सबसे निर्मम सत्य के शोधक आज भी जीवित हैं—उनके विचारों में, संघर्षों में और उन लाखों-करोड़ों शोषितों के चेहरों में, जिन्हें उन्होंने इंसानियत का दर्जा दिलाया।

ज्योतिबा फुले कोई साधारण समाज सुधारक नहीं थे। वे क्रांति के प्रणेता थे। उन्होंने ब्राह्मणवाद की जड़ों को चीरकर रख दिया और साबित कर दिया कि असली धर्म इंसानियत है, न कि जन्म-आधारित ऊंच-नीच। 1827 में जन्मे इस महान पुरुष ने बचपन से ही देखा कि कैसे शूद्र और अति-शूद्रों को शिक्षा से वंचित रखा जाता है, कैसे स्त्रियों को पशु से भी बदतर समझा जाता है। लेकिन ज्योतिबा ने चुप रहना स्वीकार नहीं किया। उन्होंने विद्रोह किया—खुलकर, बिना किसी समझौते के।

सत्य शोधक समाज की स्थापना उनके जीवन का सबसे बड़ा मील का पत्थर थी। 1873 में स्थापित इस समाज ने ब्राह्मणवादी अंधविश्वासों और धार्मिक शोषण के खिलाफ सीधा युद्ध छेड़ दिया। ज्योतिबा ने कहा— “शिक्षा के बिना मुक्ति असंभव है।” और उन्होंने सिर्फ कहा नहीं, किया भी। उन्होंने भारत में पहला लड़कियों का स्कूल खोला—1848 में, जब लड़कियों को पढ़ाने का विचार भी पागलपन माना जाता था। उनकी पत्नी सावित्रीबाई फुले उनके साथ कंधे से कंधा मिलाकर इस अभियान में जुट गईं। दोनों ने पत्थरों और गोबर की बौछार, गाली-गलौज और सामाजिक बहिष्कार सब सहा, लेकिन पीछे नहीं हटे। आज जब हम स्त्री शिक्षा की बात करते हैं, तो ज्योतिबा और सावित्रीबाई को भूलना नामुमकिन है। वे सचमुच स्त्री शिक्षा के जनक हैं।

ज्योतिबा विधवा स्त्रियों के सबसे बड़े पोषक थे। उन्होंने विधवा विवाह का समर्थन किया, विधवाओं के लिए आश्रम चलाए और सबसे बड़ी क्रांति यह कि उन्होंने स्वयं एक ब्राह्मण विधवा को गोद लेकर उसे बेटी का दर्जा दिया। उन्होंने ब्राह्मण के पुत्र को अपना वारिस बनाया और शिक्षित कर डॉक्टर बनाया। सती प्रथा और देवदासी प्रथा के वे कट्टर विरोधी थे। उन्होंने साबित कर दिया कि ये प्रथाएं धर्म नहीं, बल्कि क्रूर शोषण हैं। उन्होंने ब्राह्मणवाद को जड़ से चुनौती दी क्योंकि वे जानते थे कि जन्म-आधारित वर्ण व्यवस्था इंसानियत का सबसे बड़ा दुश्मन है।

उनका लेखन आग उगलता था। “गुलामगिरी” पुस्तक में उन्होंने ब्रिटिश शासन की आलोचना करते हुए भी हिंदू समाज की आंतरिक गुलामी को और भी खतरनाक बताया। उन्होंने किसानों, शूद्रों और स्त्रियों को एकजुट होने का आह्वान किया। उनका नारा था— “सर्वजन सुखाय”। वे इंसानियत के पुजारी थे। जाति, धर्म, लिंग से ऊपर उठकर उन्होंने हर इंसान को बराबर का अधिकार दिया।

आज जब हम देखते हैं कि समाज में अभी भी जातिवाद, लिंगभेद और अंधविश्वास के अवशेष बाकी हैं, तब ज्योतिबा फुले की याद हमें झकझोर देती है। वे हमें बताते हैं कि असली स्वराज्य तब तक अधूरा है, जब तक अंतिम दलित, अंतिम स्त्री और अंतिम किसान को शिक्षा, सम्मान और समानता नहीं मिल जाती।

महात्मा ज्योतिबा फुले की जन्म जयंती पर हमें सिर्फ श्रद्धांजलि नहीं, उनके सपनों को पूरा करने का संकल्प लेना चाहिए। हमें उनके जैसे आक्रामक, साहसी और निर्भीक बनना होगा। ब्राह्मणवाद नहीं, इंसानियत; अंधविश्वास नहीं, विज्ञान और शिक्षा; शोषण नहीं, समानता—यही ज्योतिबा का संदेश है।

ज्योतिबा फुले अमर हैं।
उनकी क्रांति की मशाल अमर है।
उनका सपना—एक समतामूलक, न्यायपूर्ण और शिक्षित भारत—अभी भी पूरा होना बाकी है।

आइए, आज उनके जन्मदिन पर हम सब संकल्प करें—
“ज्योतिबा की राह पर चलेंगे,
शोषण की हर दीवार तोड़ेंगे,
और एक ऐसे भारत का निर्माण करेंगे, जहाँ हर इंसान सिर ऊंचा करके जी सके।”

जय ज्योतिबा! जय सत्य शोधक!!
भारत माता की जय

🙏🌹 बाबू लाल बारोलिया, अजमेर 🌹🙏

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