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(जन्म-11.04.1827-मृत्यु-28.11.1890)
सामाजिक क्रांति के पितामह, भारतीय मूलनिवासी बहुजन समाज को गुलामी का एहसास कराने वाले, उनमें ज्ञान की ज्योति जलाने वाले, बाबा साहेब डॉ भीम राव अम्बेडकर के दूसरे गुरू महात्मा ज्योतिबा राव फूले जी के जन्मदिन पर मानव विकास संस्थान की ओर से शत-शत नमन-वंदन एवं श्रद्धा सुमन समर्पित करते हैं।
महात्मा ज्योतिबा राव फूले जी का जन्म 11 अप्रैल 1827ई.को महाराष्ट्र के सतारा जिले में बहुजन समाज की ‘माली’ जाति में हुआ था। उनके पिता का नाम गोविन्द राव और माता का नाम चिमनाबाई था। जिन्हें ‘मनु-विधान’ के मुताबिक शिक्षा प्राप्त करने की आजादी नहीं थी। समय बदल रहा था। ईस्ट इंडिया कंपनी द्वारा भारत में ‘दासता उन्मूलन अधिनियम- 1833’ और मैकाले द्वारा प्रस्तुत ‘मिनिट्स ऑन एजूकेशन (1835) लागू किये जा चुके थे। यह मनुवादी व्यवस्था पर आधारित सामाजिक व्यवस्था को बदलने वाली एक सबसे बड़ी पहल थी। जिसमें जॉन स्टुअर्ट मिल की उल्लेखनीय भूमिका रही।
1848 में मात्र 21 वर्ष की अवस्था में उन्होंने सार्वजनिक जीवन में प्रवेश किया। उससे पूर्व वर्ष 1840 में उनका विवाह मात्र 9 वर्ष की सावित्रीबाई फूले से हुआ था । वे पढ़ना चाहती थीं। लेकिन उन दिनों लड़कियों को पढ़ाने का रिवाज़ नहीं था। शिक्षा के प्रति पत्नी की ललक देख कर ज्योतिबा राव फूले जी ने उन्हें पढ़ाना शुरू कर दिया। जिसका विरोध ब्राह्मणवादियों ने किया। परंतु फूले जी अपमानित होते हुए भी अपनी बात पर अड़े़ रहे। पत्नी को शिक्षित करने के बाद, तीन वर्षों में पति-पत्नी ने 18 स्कूलों की स्थापना की। उनमें से तीन स्कूल लड़कियों के लिए थे।
1854 ई. में एक मिशनरी स्कूल में सवैतनिक पढ़ाने लगे क्योंकि उन्हें जीवन निर्वाह की उन्हें शक्त जरूरत थी। विद्यालय में फूले जी की बहुत प्रशंसा हुई।
24 सितंबर, 1873 को पुणे में, सत्य शोधक समाज की स्थापना के मौके पर आए प्रतिनिधियों को संबोधित करते हुए महात्मा ज्योतिबा राव फूले जी ने कहा था-
‘अपने मतलबी ग्रंथों के सहारे हजारों वर्षों तक शूद्रों को नीच मानकर ब्राह्मण (भट्ट, जोशी, उपाध्याय आदि) लोग उन्हें लूटते आए हैं। उन लोगों की गुलामगीरी से शूद्रों को मुक्त कराने के लिए, सद् उपदेश और ज्ञान के द्वारा उन्हें उनके अधिकारों से परिचित कराने के लिए धर्म और व्यवहार-संबंधी ब्राह्मणों के बनावटी और धर्मसाधक ग्रंथों से उन्हें मुक्त कराने के लिए सत्यशोधक समाज की स्थापना की गई है।
आधुनिक भारत के इतिहास में 19वीं शताब्दी में अनेक बहुजन महापुरुषों ने जन्म लिया। यदि उनमें से किसी एक को ‘आधुनिक भारत का वास्तुकार’ चुनना पड़े तो वे महात्मा ज्योतिबा राव फूले जी ही होंगे क्योंकि उनका कार्यक्षेत्र व्यापक था। स्त्री शिक्षा, बालिकाओं की भ्रूण हत्या, विधवा विवाह, बालविवाह, जातिप्रथा और छुआ- छूत का उन्मूलन, धार्मिक आडंबरों का विरोध आदि ऐसा कोई क्षेत्र नहीं है, जहां उन्होंने अपनी उपस्थिति दर्ज न कराई हो। 28 नवम्बर, 1890 को महात्मा ज्योतिराव फूले जी का परिनिर्वाण हो गया।
बाबा साहेब डॉ भीम राव अम्बेडकर ने 10 अक्तूबर, 1946 ई. को अपनी चर्चित रचना शूद्र कौन थे ? को महात्मा ज्योतिबा राव फूले जी के नाम समर्पित किया था।
बाबा साहेब डॉ भीम राव अम्बेडकर ने उन्हें अपना गुरू मानते हुए कहा है कि, यदि इस धरती पर महात्मा ज्योतिबा राव फूले जी जन्म नही लेते तो अम्बेडकर का भी निर्माण नही होता।
महान समाज सुधारक की महान पत्नी “सावत्री”-
3 जनवरी, 1831ई. में खन्डोजी नेवसे के घर जन्मी सावित्री बाई फूले के साथ 1840 ई. में 9 वर्ष की उम्र में विवाह महात्मा ज्योतिबा राव फूले के साथ हो गया था। उनका जीवन साथी एक आदर्श पुरूष था। जो महिलाओं की शिक्षा का समर्थक था। जिसने सावित्रीबाई फूले को स्वयं पढ़ाकर शिक्षिका बनाया।
जब महात्मा ज्योतिबा राव फूले को उनके रूढ़िवादी पिता ने घर से निकाल दिया था, तब उस्मान शेख ने महात्मा फूले को रहने के लिए घर दिया और उनके शिक्षा कार्य को बढ़ाने के लिए अपनी बहन फातिमा शेख को सावत्री बाई फूले की सहायता के लिए शिक्षिका बनाया। सावित्री बाई फूले भारत की पहली महिला शिक्षिका थीं। 1848ई. से लेकर 1852 ई.तक चार साल की अवधि में उन्होंने 18 स्कूल खोले थे।
फूले दम्पति दुनिया के इतिहास में अदभुत पति पत्नी हुए हैं, जो दोनों ही महान समाज सुधारक रहे हैं। 28 नवम्बर 1890 को महात्मा ज्योतिबा फुले की मृत्यु के बाद उनके अनुयायियों के साथ सावित्रीबाई फूले ने भी सत्य शोधक समाज को दूर-दूर तक पहुँचाने, अपने पति के अधूरे कार्यों को पूरा करने व समाज सेवा का कार्य जारी रखा। सन् 1897 में पुणे में भयंकर प्लेग फैला। प्लेग के रोगियों की सेवा करते हुए माता सावित्रीबाई फूले स्वयं भी प्लेग की चपेट में आ गईं और 10 मार्च सन् 1897ई. को उनका भी परिनिर्वाण हो गया।
जिस समाज की भलाई के लिए सावत्रीबाई फुले ने पूरा जीवन लगा दिया उसी अज्ञानी रूढ़िवादी समाज ने बदले में उनका तिरस्कार किया, उपहास उड़ाया, उन पर कीचड़़ गोबर तक फेंका गया। लेकिन सही मायने में समता ममता शिक्षा की साक्षात देवी सावत्रीबाई फूले ने उनकी अज्ञानता पर दया करते हुए समाज सेवा का कार्य कभी भी बन्द नहीं किया।
आज के सामाजिक कार्य करने वालों को चाहिए कि वे महात्मा ज्योतिबा राव फूले जी की क्रियाओं को ध्यान में रखें।
अपने आत्मसम्मान को जगाना जरूरी है जैसे महात्मा ज्योतिबा राव फूले जी अपने ब्राह्मण दोस्त की शादी से अपमानित करके भगा दिए जाने पर इस घटना से दुःखी होकर वे सोचते हैं कि मेरा अपमान क्यों हुआ ? वे इस निष्कर्ष पर पहुंचते हैं कि मैं धर्म की चतुर्वर्णीय व्यवस्था में नीच शूद्र हूँ।
इस घटना से वे सोचने पर मजबूर हुए कि मैं एक पढ़ा- लिखा हूँ फिर भी मेरा कोई सम्मान नहीं है, तो ये हमारे मददगार शूद्र(अछूत) जिनके गले में हांडी और कमर में झाड़ू बंधा है।
जमीन पर चलने और थूकने का भी अधिकार नही है। इन्हें इस घोर अपमान का अहसास क्यों नही हो रहा ? क्योंकि ए शिक्षित नहीं हैं। मैं पढ़ा लिखा हूँ । इसलिए मान और अपमान के अंतर को समझता हूँ लेकिन ये अछूत अनपढ़़ होने की वजह से अपनी इस दुर्दशा को नियति समझकर स्वीकार कर चुके हैं।
अपमान के इस अहसास ने फूले जी को आधुनिक भारत का क्रान्तिसूर्य बना दिया। इस अपमान ने उन्हें ब्राह्मण संस्कृति के खिलाफ विद्रोही बना दिया।
*सामाजिक कार्य करने वाले को दुश्मन और दोस्त की पहचान होना आवश्यक है। महात्मा ज्योतिबा राव फूले जी ने समाज में एक स्पष्ट विभाजन रेखा खींच दी कि, *भट्टजी/लाठजी/शेठजी V/s शूद्र/अतिशूद्र* उनका स्पष्ट मानना था कि ब्राह्मण क्षत्रिय वैश्य का गठजोड़़ अपने को मालिक मानकर शूद्र/अतिशूद्र को गुलाम समझता हैं, अतः मालिक और गुलाम के बीच में स्पष्ट विभाजन रेखा होनी चाहिए।
सामाजिक कार्य करने के लिए आत्मनिर्भर बनकर दुश्मन का बहिष्कार करना जरूरी है। जब तक गुलाम समाज मालिक समाज पर निर्भर रहेगा वह उनके खिलाफ विद्रोह नही कर सकता। शूद्र/अतिशूद्र (बहुजन समाज में) जन्म से लेकर मृत्यु पर्यन्त तक सारे संस्कार पुरोहित करवाता है, इसलिए महात्मा ज्योतिबा राव फूले ने सत्य शोधक समाज की स्थापना कर सत्य शोधक पद्धति से संस्कार करवाना शुरू किया ताकि समाज पुरोहित की निर्भरता से मुक्त होकर पुरोहितों का बहिष्कार कर सके और अपनी लड़ाई आत्मनिर्भर बनकर स्वयं लड़़ सके।
अन्त में हम कह सकते हैं कि महात्मा ज्योतिबा राव फूले जी आत्मसम्मान का संघर्ष छेड़़कर ब्राह्मणी व्यवस्था के खिलाफ सत्य शोधक समाज के माध्यम से भगवान बुद्ध, सम्राट अशोक, सद्गुरु कबीर,सद्गुरु रैदास, सद्गुरु चोखामेला आदि की श्रमण परंपरा की नींव आधुनिक भारत के युग में रखकर उसे पुनर्जीवित किया। *यही वजह है कि बाबा साहेब डॉ. भीमराव अम्बेडकर ने उन्हें अपना गुरु माना है।*
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सामाजिक क्रान्ति के पितामह महात्मा ज्योतिबा राव फूले जी अमर रहें।
माता सावित्रीबाई फूले जी अमर रहें।
प्रेरणा श्रोत बाबा साहेब डॉ. भीम राव अम्बेडकर अमर रहें।
जय भीम जय भारत जय संविधान।
डॉ. जी. पी. मानव
(सेवानिवृत्त उपप्राचार्य के. वि. सं.भारत सरकार नई-दिल्ली ) संस्थापक एवं वर्तमान अध्यक्ष
मानव विकास संस्थान, उत्तर- प्रदेश।

