Friday, April 17, 2026
Homeदेशजोतिराव फुले : शूद्रों-अतिशिद्रों, महिलाओं, उत्पादक-मेहनतकाश किसानो की मुक्ति के आधुनिक युग...

जोतिराव फुले : शूद्रों-अतिशिद्रों, महिलाओं, उत्पादक-मेहनतकाश किसानो की मुक्ति के आधुनिक युग के पहले चिंतक-विचारक और क्रांतिकारी व्यक्तित्व

जयंती ( 11अप्रैल) पर सादर नमन के साथ

तुम कैसे बेशर्म हुए, ब्राह्मणों के वश हुए, नित चरण छूने को।
आर्यों की मनुस्मृति देखो, उसमे धोखा देखो, पढो ग्रंथ को ।।

                                            *जोतिराव फुले*

मेरे तीसरे गुरु जोतिराव फुले हैं। केवल उन्होंने ही मानवता का पाठ पठाया। शुरूआती राजनीतिक आंदोलन में हमने जोतिबा के पथ का अनुसरण किया। मेरा जीवन उनकी शिक्षओं से प्रभावित है।

                                        डॉ. आंबेडकर 

आधुनिक भारत में शूद्रों-अतिशूद्रों,महिलाओं और किसानों के मुक्ति संघर्ष के पहले नायक जोतिराव फुले हैं। डॉ. आंबेडकर ने गौतम बुद्ध और कबीर के साथ जोतिराव फुले को को अपना तीसरा गुरू माना है।

28 अक्टूबर 1954 को पुरूदर स्टेडियम, मुंबई में भाषण देते हुए डॉ. आंबेडकर ने कहा कि “ मेरे तीसरे गुरु जोतिराव फुले हैं। केवल उन्होंने ही मानवता का पाठ पठाया। शुरूआती राजनीतिक आंदोलन में हमने जोतिबा के पथ का अनुसरण किया। मेरा जीवन उनकी शिक्षओं से प्रभावित है।”

अपनी किताब ‘शूद्र कौन थे?’ महात्मा फुले को समर्पित करते हुए उन्होंने ( आंबेडकर) लिखा है कि “ जिन्होंने हिंदू समाज की छोटी जातियों को उच्च वर्णों के प्रति उनकी गुलामी की भावना के संबंध में जाग्रत किया और जिन्होंने विदेशी शासन से मुक्ति पाने से भी सामाजिक लोकतंत्र की स्थापना अधिक महत्वपूर्ण है, इस सिद्धांत का प्रतिपादन किया। उस आधुनिक भारत के महान शूद्र महात्मा फुले की स्मृति में सादर समर्पित।”

जाति-भेद से मुक्ति को फुले ने अपने जीवन का सबसे महत्वपूर्ण मिशन बनाया। उन्होंने ‘जाति भेद विवेकानुसार’ ( 1865) में लिखा कि “ धर्मग्रंथों में वर्णित विकृत जाति-भेद ने हिंदुओं के दिमाग को सदियों से गुलाम बना रखा है। उन्हें इस पाश से मुक्त करने के अलावा कोई दूसरा महत्वपूर्ण काम नहीं हो सकता है।”

जोतिराव फुले को पराधिनता और असमनाता कोई रूप स्वीकार नहीं था। वर्ण-जाति, स्त्री-पुरूष या किसी अन्य आधार मनुष्य-मनुष्य के बीच भेदभाव उन्हें स्वीकार नहीं था।

उन्होंने साफ शब्दों में अपनी किताब ‘सार्वजनिक सत्य धर्म’ घोषणा किया था कि “ इस पृथ्वी पर सभी स्त्री-पुरूष को गांव, घर, एक परिवार की तरह रहना चाहिए। ईश्वर ने स्वतंत्र मनुष्य़ की रचना की है। उसने प्रसन्नतापूर्वक रहने का अधिकार सभी मनुष्यों को दिया है। विधाता ने सभी स्त्री-पुरूष को सोच और विचार के आधार पर बिन दूसरे को दुख पुहंचाए अपनी बात कहने की स्वतंत्रता दी है। यही सात्विक व्यवहार है। परमात्मा ने सभी को समान मानव अधिकार दिया है। अत:कोई भी व्यक्ति या समुदाय दूसरे व्यक्ति या समुदाय पर अधिकार नहीं जमा सकता। इसका अनुपालन ही सच्चा कर्म है। सर्जनहार ने सभी स्त्री-पुरूषों को धार्मिक एवं राजनीतिक अधिकार दिए हैं… पृथ्वी की छाती पर जन्म लेने वाला हर इंसान खुदा की नजर में एक समान है तो फिर कैसे हो सकता है कि कुछ लोग जन्मना श्रेष्ठ हों और कुछ नीच और निकृष्ट।”

 डॉ. आंबेडकर के तीसर गुरू और शूद्रों-अतिशूद्रों, महिलाओं और किसानों के लिए आजीवन संघर्ष करने वाले जोतिराव फुले का जन्म 11 अप्रैल 1827 को शूद्र वर्ण के माली जाति में महाराष्ट्र  में हुआ था। उनके पिता का नाम गोविन्दराव और माता का नाम चिमणाबाई था। फुले जब एक वर्ष के थे, तभी उनकी मां चिमणाबाई का निधन हो गया। उनका पालन-पोषण उनके पिता की मुंहबोई बहन सगुणाबाई ने किया। सगुणाबाई ने उन्हें आधुनिक चेतना से लैस किया।

1818 में ब्राह्मणों का पेशवाई शासन भले ही अंग्रेजों ने खत्म कर दिया, पर सामाजिक जीवन पर उनका नियंत्रण कायम था। पुणें में शूद्रों-अतिशूद्रों और महिलाओं के लिए शिक्षा के दरवाजे बंद थे। ईसाई मिशनरियों ने शूद्रों-अतिशूद्रों और महिलाओं के लिए शिक्षा के दरवाजे खोले।

सात वर्ष की उम्र में जोतिराव को पढ़ने के लिए स्कूल भेजा गया, लेकिन जल्दी ही सामाजिक दबाव में जोतिराव के पिता गोविंद राव ने उन्हें स्कूल से बाहर निकाल लिया। वे अपने पिता के साथ खेतों में काम करने लगे। उनकी जिज्ञासा और प्रतिभा से उर्दू-फारसी के जानकार गफ्तार वेग और ईसाई धर्मप्रचारक लिजीटसाब बहुत प्रभावित थे। उन्होंने गोविंद राव को सलाह दी कि वे जोतिराव को पढ़ने के लिए भेजें और फिर से जोतिराव स्कूल जाने लगे।

इसी बीच 13 वर्ष की उम्र में ही 1840 में जोतिराव को विवाह 9 वर्षीय सावित्रीबाई फुले कर दिया गया। 1847 में जोतिराव स्कॉटिश मिशन के अंग्रेजी स्कूल में पढ़ने लगे। होनहार विद्यार्थी जोतिराव का परिचय आधुनिक ज्ञान-विज्ञान से हुआ।

स्कॉटिश मिशन स्कूल में दाखिले के बाद जोतिराव फुले के रग-रग में धीरे-धीरे समता और स्वतंत्रता का विचार बसने लगा। उनके सामने एक नई दुनिया खुल गई। तर्क उनका सबसे बड़ा हथियार बन गया। हर चीज को वे तर्क और न्याय की कसौटी पर कसने लगे। अपने आस-पास के समाज को एक नए नजरिए से देखने लगे।

इसी दौरान उन्हें व्यक्तिगत जीवन में जातिगत अपमान का सामना करना पड़ा। उन्हें उनके ब्राह्मण मित्र ने शादी में आमंत्रित किया। बारातियों के साथ जोतिराव को देखकर एक ब्राह्मण ने उनका गिरेवान पकड़ लिया और कहा कि “ शर्म नहीं आती? शूद्र कहीं के? ब्राह्मणों के साथ चलते हो? जाति-पांति की कोई मर्यादा है या नहीं? या सबकुछ ताक पर रख दिया है? हटो यहां से! सबसे पीछे चलना और आगे मत आना। बहुत बेशरम हो गए हैं, ये लोग आजकल।”

उनके साथ ऐसा व्यवहार होगा, इसकी कल्पना भी कभी उन्होंने नहीं की थी। वे हक्का-बक्का रहे गए। अपमान तिलमिला उठे, लेकिन अपमान का घूंट पीकर रह गए। घर वापस आकर पिता से सारा वाकया बताया । उन्हें उम्मीद थी कि पिता गोविंदराव को इससे उन ब्रह्मणों पर क्रोध आयेगा, जिन्होंने ऐसा किया, लेकिन हुआ इससे उलट। फुले के पिता भी ब्राह्मणवादी परंपराओं को स्वीकार करते थे।

वे भी अधिकांश शूद्रों-अतिशूद्रों और महिलाओं की तरह मानसिक तौर ब्राह्मणवादी मानसिकता के गुलाम थे। उन्होंन काह कि गनीमत है कि उन ब्राह्मणों ने तुम्हें फटकार कर ही छोड़ दिया। तुम्हें समझना चाहिए कि हम जाति से शूद्र हैं। हम ब्राह्मणों की बराबरी नहीं कर सकते। इस घटना ने भी वर्ण-जाति व्यवस्था और ब्राह्मणवाद के संदर्भ में उनकी आंखें खोलने में मदद किया।

1847 में मिशन स्कूल की पढ़ाई पूरी कर ली। जोतिबा फुले एक बात अहसास अच्छी तरह हो गया था कि शिक्षा ही वह हथियार है, जिससे शूद्रों-अतिशूद्रों और महिलाओं की मुक्ति हो सकती है। उन्होंने अपनी एक कविता में लिखा-

विद्या बिना मति गई
मति बिना नीति गई
नीति बिना गति गई
गति बिना वित्त गया
वित्त बिना शूद्र टूटे
इतने अनर्थ
एक अविद्या ने किए

सबसे पहले शिक्षा की जोति उन्होंने अपने घर में जलाई। अपनी पत्नी जीवन-साथी सावित्राबाई फुले को शिक्षित किया। उन्हें ज्ञान-विज्ञान से लैश किया। उनके भीतर यह भाव और विचार भरा कि स्त्री-पुरूष दोनों बराबर हैं। दुनिया का हर इंसान स्वतंत्रता और समता का अधिकारी है। सावित्राबाई फुले, सगुणाबाई, फातिमा शेख और अन्य सहयोगियों के साथ मिलकर हजारों वर्षों से ब्राह्मणों द्वारा शिक्षा से वंचित किए गए समुदायों को शिक्षित करने और उन्हें अपने मानवीय अधिकारों के प्रति सजग करने का बीड़ा उठाया।

इस कार्य में उन्हें मिशनरी स्कूलों से काफी प्रेरणा मिली थी। अछूतों और महिलाओं के लिए शिक्षा की जरूरत के संदर्भ में उन्होंने कहा कि “ मेरे देशबंधुओं में महार, मांग, चमार दुख और अज्ञान में डूबे हुए हैं। दयाधान परमात्मा ने उनकी स्थिति में सुधार लाने की प्रेरणा मुझे दी। स्त्रियों के स्कूल ने सबसे पहले मेरा ध्यान आकर्षिक किया। पूर्ण विचारोपरांत मेरा यह निश्चित मत हुआ कि लड़कों के स्कूल के बजाय लड़कियों का स्कूल होना जरूरी है। महिलाएं दो-तीन साल की आयु में संस्कार अपने बच्चों पर डालती हैं उसी में उन बच्चों के भविष्य के बीच होते हैं। अमहमद नगर के अमेरिकन मिशन में मिस फैरार ने जो स्कूल चलाया, उसे मैंने अपने मित्रों के साथ देखा। जिस ढंग से उन लड़कियों को शिक्षा दी जाती है, वह पद्धति मुझे बहुत अच्छी लगी।”

अपने इन विचारों को व्यवहार में उतारते हुए फुले ने 1848 में लड़कियों के लिए पहला स्कूल खोला।यह स्कूल महाराष्ट्र में ही नहीं, पूरे भारत में किसी भारतीय द्वारा अछूतों के लिए विशेष तौर खोला गया पहला स्कूल था। यह स्कूल खोलकर जोतिराव फुले और सावित्रीबाई फुले ने खुलेआम धर्मग्रंथों को चुनौती दी। उन्होंने मनुस्मृति सहित अन्य ब्राह्मण धर्मग्रंथों का खंडन करना भी शुरू कर दिया। ब्राह्मणवादी बौखला उठे। ब्राह्मणवादियों के दबाव में फुले के पिता ने उन्हें और उनकी जीवन-साथी सावित्रीबाई फुले को घर से निकाल दिया।

फुले का पहला स्कूल सिर्फ 6 महीने ही चल पाया। इसके बाद 3 जुलाई 1851 को उन्होंने दूसरा स्कूल खोला। इन स्कूलों के संचालन में सावित्रीबाई फुले और जोतिराव फुले एक साथ कार्य किया। फुले ने प्रौढ़ उम्र के लोगों के लिए 1855 में रात्रि पाठशाला खोली। यह पूरे भारत में अपने तरह की पहली पाठशाला थी। उन्होंने 1852 में मराठी पुस्तकों की पहले पुस्तकालय की स्थापना की। इसी तरह उन्होंने 1851 में ‘फीमेल एजुकेशन सोसाइटी’ तथा 1853 में सोसाइटी फॉर प्रमोंटिग दी एजूकेशन ऑफ महारस और मांगस’ की स्थापना करके शिक्षा प्रबंधन के क्षेत्र में बहुत महत्वपूर्ण योगदान किया। फुले के ये स्कूल भारत में अछूतों और महिलाओं के लिए शिक्षा की रोशनी लेकर आए थे।

फुले द्वारा शूद्रों-अतिशूद्रों और महिलाओं को शिक्षित करने का उद्देश्य अन्याय और उत्पीड़न पर आधारित सामाजिक व्यवस्था को उलट देना था। जब 1873 में अपनी किताब ‘गुलामगिरी’ की प्रस्तावना में उन्होंने इस किताब लिखने का उद्देश्य इन शब्दों में प्रकट किया- “सैकड़ों वर्षों से शूद्रादि अतिशूद्र ब्राह्मणों के राज में दुख भुगतते आए हैं। इन अन्यायी लोगों से उनकी मुक्ति कैसे हो, यह बताना ही इस ग्रंथ का उद्देश्य है।” फुले जितने बडे समर्थक शूद्रों-अतिशूद्रों की मुक्ति के थे, उतने ही बडे समर्थ स्त्री मुक्ति के भी थे।

उन्होंने महिलाओं के बारे में लिखा कि “ स्त्री शिक्षा के द्वार पुरूषों ने इसलिए बंद कर रखे थे, ताकि वह मानवीय अधिकारों को समझ ने पाए। जैसा स्वतंत्रता पुरूष लेता है, वैसी ही स्वतंत्रता स्त्री ले तो? अगर अपनी कामवासनाएं पूरी करने के लिए पुरूष दो-दो, तीन-तीन स्त्रियों से विवाह करता है और उन विवाहों के लिए धर्मशास्त्र का आधार लेता है, स्त्रियों को भी अपनी मनोकामनाएं पूरी करने के लिए दो-दो , तीन-तीन पति करने की सहूलियत मिलनी चाहिए। हम सब पुरूषों को तब कैसा लगेगा? जोतिराव फुले स्त्री-पुरूष के समान अधिकारों के हिमायती थे। उन्होंने व्यवहार में भी यह कर दिखाया।

सावित्रीबाई फुले जीवन के सभी क्षेत्रों में उनके साथ बराबर का हिस्सेदार थीं। उन्होंने महिलाओं को पुरूषों के बराबर मानते हुए ब्राह्मणवादी विवाह पद्धति को खारिज कर दिया, जिसमें लड़की पिता की संपत्ति जैसी होती है और वह उसे किसी को भी दान दे सकता है, जिसे कन्यादान कहा जाता है।

जोतिराव फुले ने लड़के-लड़की को समान मानते हुए नई विवाह पद्धति तैयार की। जिसे सत्यशोधक विवाह पद्धति कहा गया। सच तो यह है कि स्त्री मुक्ति की कोई भी ऐसा संघर्ष नहीं है, जिसे फुले अपने समय में न चलाया हो। डॉ. मु.ब. शहा बिल्कुल सही लिखा है कि “ स्त्री मुक्ति की कोई ऐसी लड़ाई नहीं है, जिसे जोतिबा ने अपने समय में न लड़ी हो। उच्च वर्ग अपनी स्त्रियों के लिए जो सुधार नहीं कर सके, वे जोतिबा ने उनके लिए किए। वे भली-भांति जानते थे कि परिवार प्रमुख की तानाशाही नहीं नष्ट होगी, तब तक स्त्री की गुलामी भी नहीं नष्ट होगी और सामाजिक विषमता भी नहीं हटेगी। उनकी यही मान्यता थी कि यदि समानता की भावना पर स्थित रहा तो समाज और राष्ट्र भी समानता की डोर में गुथे जाएंगे।”

जोतिराव फुले सावित्रीबाई के साथ मिलकर अपने परिवार को स्त्री-पुरूष समानता का मूर्त रूप बना दिया और एक साथ मिलकर समाज और राष्ट में समानता कायम करने के लिए संघर्ष में उतर पड़े। एक बराबर के साथी की तरह दोनों एक दूसरे का हाथ पकड़े दुख-सुख में एक दूसरे का साथ देते हर तरह के अन्याय के खिलाफ आजीवन लड़ते रहे।

फुले ने समाज सेवा और सामाजिक संघर्ष का रास्ता एक साथ चुना। सबसे पहले उन्होंने हजारों वर्षों से वंचित लोगों के लिए शिक्षा का द्वार खोला। विधवाओं के लिए आश्रम बनाया, विधवा पुनर्विवाह के लिए संघर्ष किया और अछूतों के लिए अपना पानी का हौज खोला। इस सब के बावजूद वह यह बात अच्छी तरह समझ गए थे कि ब्राह्मणवाद का समूलनाश किए बिना अन्याय, असमानता और गुलामी का अंत होने वाला नहीं है।

इसके लिए उन्होंने 24 सितंबर 1773 को ‘सत्यशोधक समाज’ की स्थापना की। सत्यशोधक समाज उद्देश्य ब्राह्मणों की पौराणिक मान्यताओं की विरोध करना, शूद्रों-अतिशूद्रों को ब्राह्मणों की मक्कारी के जाल से मुक्त कराना, पुराणों द्वारा पोषित जन्मजात गुलामी से छुटकारा दिलाना और लोगों को यह बताना कि ईश्वर एक है, जो सर्वव्यापी निर्गुण और निराकार है। वह प्रत्येक वाणी मे बसता है। किसी भी जाति और धर्म का व्यक्ति खंडेराव देव का नाम की शपथ लेकर इस संस्था का सदस्य बन सकता था। सत्यशोधक समाज के सदस्य मुस्लिम, ईसाई,पारसी,यहूदी, ब्राह्मण, मराठा, कोली, महार, मांग, चमार और माली आदि धर्मों और जातियों के लोग बने। इसमें जाति, लिंग, धर्म और वर्ण आदि के आधार पर भेदभाव के लिए कोई जगह न थी। यह एक जनांदोलन बन गया था। इसके माध्यम से फुले ब्राह्मणवाद के विरूद्ध एक सांस्कृतिक क्रांति की शुरूआत की थी।

सत्यशोधक समाज के मुख्यत: तीन लक्ष्य थे। एक, भक्त और भगवान के बीच किसी बिचौलिए की जरूरत नहीं है और बिचौलियों ( ब्राह्मण पुरोहितों) द्वारा लादी गयी गुलामगिरी को नष्ट करना, अन्धश्रद्धा का खात्मा करना और अज्ञानी लोगों को उनकी गुलामी से मुक्त करना।

दूसरा सभी जातियों के स्त्री-पुरूषों को शिक्षा उपलब्ध कराना और तीसरा साहूकारों एवं जमींदारों के शिकंजे से किसानों को मुक्त करना। सत्यशोधक आंदोलन महाराष्ट्र में एक जनांदोलन बन गया था।सत्यशोधक समाज के कार्यो में जाोतिराव फुले के साथ सावित्रीबाई फुले की बराबर की हिस्सेदारी थी। 1890 में जोतिराव फुले के देहांत के बाद सत्यशोधक समाज की अगुवाई की जिम्मेदारी सावित्रीबाई फुले ने उठायी।

शूद्रों-अतिशूद्रों और महिलाओं के अलावा जिस समुदाय के लिए जोतिराव फुले ने सबसे ज्यादा संघर्ष किया। वह समुदाय किसानों का था। उन्होंने ‘किसान का कोड़ा’ (1883) ग्रंथ में उन्होंन किसानों की दयनीय अवस्था को दुनिया के सामने उजागर किया।

उनका कहना था कि किसानों को धर्म के नाम पर भट्ट-ब्राह्मणों का वर्ग, शासन-व्यवस्था के नाम पर विभिन्न पदों पर बैठे अधिकारियों का वर्ग और सेठ-साहूकारों का वर्ग लूटता-खसोटता है। असहाय सा किसान सबकुछ बर्दाश्त करता है। इस ग्रंथ को लिखने का उद्देश्य बताते हुए वे लिखते हैं कि “फिलहाल शूद्र किसान धर्म और राज्य संबंधी कई कारणों से अत्यन्त विपन्न हालात में पहुंच गया है। उसकी इस हालात के कुछ कारणों की विवेचना करने के लिए इस ग्रंथ की रचना की गई है।”

2 मार्च 1888 को पूना में ब्रिटेन के राजकुमार के सम्मान में बड़ा भोज दिया गया था, जिसमें देश के नामी-गिरामी लोग उपस्थित थे। जोतिराव फुले को भी उसमें बुलाया गया था। आमजन की वेशभूषा में पहुंचे जोतिराव फुले ने ड्यूक ( राजकुमार) को संबोधित करते हुए कहा कि “ यहां उपस्थित मेहमानों के बहुमूल्य कपड़ों और उन पर चमचमाते हीरों की देखकर यह मत समझना कि हिंदुस्तान बड़ा सुखी और समृद्ध देश है। सच्चाई कुछ अलग है। ये सोने-चांदी के गहनों से लदे और सुगंधित वस्त्र पहने हुए अमीर लोग इस देश की जनता के सच्चे प्रतीक नहीं हैं। यहां के अधिकांश किसानों के ये प्रतिनिधि नहीं हो सकते। सच्चा हिंदुस्तान देहातों में है। वहां के लोग निर्धन, भूखे, नंगे और बेखर रहते हैं। नंगे पैर ही चलते हैं।…अगर राजकुमार सच्चा हिंदुस्तान देखना चाहते हैं,तो वे पास-पड़ोस के देहातों में जाएं, वहां की अज्ञानी जनता की भीषण दरिद्रता को प्रत्यक्ष देखें। अछूतों की झुंग्गी झोपड़ियों में जाएं और वहां यह देखें कि कूड़े कर-कट से भी बदत्तर हालात में उनकी बस्तियां कैसे जी रही हैं… यह सब प्रत्यक्ष देखकर राजकुमार और उनकी पत्नी जाकर महारानी विक्टोरिया से कहें कि हिंदुस्तान की गरीब जनता दरिद्रता की खाई में पड़ी सड़ रही है।”

जोतिराव फुले चिंतक, लेखक और अन्याय के खिलाफ निरंतर संघर्षरत योद्धा थे। वे दलित-बहुजनों, महिलाओं और गरीब लोगों के पुनर्जागरण के अगुवा थे। उन्होंने शोषण-उत्पीड़न और अन्याय पर आधारित ब्राह्मणवादी व्यवस्था की सच्चाई को सामने लाने और उसे चनौती देने के लिए अनके ग्रंथों की रनचा की। जिसमें प्रमुख रचनाएं निम्न हैं-

1- तृतीय रत्न ( नाटक, 1855),2-छत्रपति राजा शिवाजी का पंवड़ा (1869), 3- ब्राह्मणों की चालाकी( 1869), 4-गुलामगिरी(1873), 5- किसान का कोड़ा (1883), 6-सतसार अंक-1 और 2 (1885), 7- ईशारा (1885), 8-अछूतों की कैफियत (1885),9- सार्वजनिक सत्यधर्म पुस्तक (1889), 10- सत्यशोधक समाज के लिए उपयुक्त मंगलगाथाएं तथा पूजा विधि (1887), 11-अखंड़ादि काव्य रचनाएं ( रचनाकाल ज्ञात नहीं)

महात्मा जोतिराव फुले अन्याय के सभी रूपों के खिलाफ खुली जंग छेड़ने वाले आधुनिक भारत के पहले योद्धा थे। ब्रह्मणवाद-मनुवाद के चलते शूद्रों, अतिशूद्रों, महिलाओं और किसनों और निम्न वर्गों पर जो अन्याय हो रहा था, उसके खिलाफ खड़े होने का साहस सबसे पहले जोतिराव फुले ने दिखाया।

वे जिस तरह के समाज का सपना देखते थे, वैसै समाज के निर्माण में जाति व्यवस्था और महिलाओं की गुलामी उन्हें सबसे बडा अवरोध दिखाई देती थी। जाति व्यवस्था और महिलाओं की दासता को हिंदू धर्म का समर्थन प्राप्त है। उन्होंने हिंदू धर्म पर निर्णायक हमला बोल दिया।

ब्राह्मणवाद-मनुवाद के समूलनाश का संकल्प उनके जीवन का सबसे बड़ा ध्येय था, क्योंकि उनका मानना था कि यह सभी प्रकार के अन्यायों को जायज ठहराता है,लोगों को अज्ञान और अंधविश्वास में रखकर उनका शोषण और उत्पीडऩ करने वालों का समर्थन करता है।

भले ही 1890 में जोतिराव फुले हमें छोड़कर चले गए, लेकिन जोतिराव फुले ने सावित्रीबाई फुले के साथ मिलकर अतिशूद्रों और महिलाओं के जागरण की जो मशाल जलाई, उसे उनके बाद सावित्रीबाई फुले ने जलाए रखा।

सावित्रीबाई फुले के बाद इस मशाल को शाहू जी महराज ने अपने हाथों में ले लिया। बाद में उन्होंने यह मशाल डॉ. भीमराव आंबेडकर के हाथों में थमा दिया।

डॉ. आंबेडकर ने मशाल को एक धधकती आग में बदल दिया। उस आग की ताप और रोशनी ही आज भी दलित-बहुजनों और महिलाओं की सबसे बड़ी ताकत है। आज हजारो दलित-बहुजन कार्यकर्ता अपने हाथों में उस मशाल को लेकर स्वतंत्रता, समता और बंधुता पर आधारित लोकतांत्रिक भारत के निर्माण के लिए संघर्ष कर रहे हैं।

सिद्धार्थ रामू

- Advertisment -

Most Popular

Recent Comments