Saturday, March 14, 2026
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मान्यवर कांशीराम की जयंती केवल एक उत्सव नहीं, बल्कि सामाजिक न्याय और समानता के लिए उनके दिखाए मार्ग पर चलने व संकल्प लेने का है दिन

मूकनायक/राष्ट्रीय प्रभारी ओमप्रकाश वर्मा
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भारतीय राजनीति और समाज में ‘बहुजन नायक’ के रूप में विख्यात मान्यवर कांशीराम की जयंती केवल एक कैलेंडर की तारीख नहीं, बल्कि करोड़ों वंचितों के स्वाभिमान का उत्सव है। मान्यवर कांशीराम का 15 मार्च का यह दिन हमें उस महापुरुष की याद दिलाता है जिसने सत्ता की चाबी को “सामाजिक परिवर्तन” का सबसे सशक्त माध्यम माना। कांशीराम जी का मानना था कि “जिसकी जितनी संख्या भारी, उसकी उतनी हिस्सेदारी।” उनका पूरा जीवन इस बात का प्रमाण था कि राजनीतिक शक्ति वह ‘मास्टर चाबी’ है, जिससे प्रगति के हर बंद दरवाजे खोले जा सकते हैं। उन्होंने अपना घर, परिवार और सुख-सुविधाएं त्याग दीं ताकि समाज के अंतिम पायदान पर खड़े व्यक्ति को सत्ता के गलियारों तक पहुँचाया जा सके।
मान्यवर कांशीराम ने शोषित, वंचित और दलित वर्गों को संगठित कर राजनीतिक रूप से जागरूक किया। उन्होंने 1984 में बहुजन समाज पार्टी की स्थापना की। यह पार्टी दलितों के अधिकारों की बात करती थी। इसके बाद उन्होंने कलेक्टर बनने का सपना देख रही एक युवा शिक्षिका मायावती को राजनैतिक मार्गदर्शन दिया। यही शिक्षिका बाद में ना सिर्फ कांशीराम की राजनैतिक वारिस बनी बल्कि चार बार देश के सबसे बड़े राज्य उत्तर प्रदेश की मुख्यमंत्री भी बनी, जो कांशीराम की दूरदृष्टि की अनुपम उदाहरण हैं। मान्यवर कांशीराम का मिशन बाबा साहेब आंबेडकर के अधूरे सपनों को पूरा करना था, जिसमें समाज के अंतिम पायदान पर खड़े व्यक्ति को समानता और सम्मान दिलाना था। मान्यवर कांशीराम जी ने सोए हुए समाज को जगाने का जो कार्य किया, वह अद्वितीय है। उनकी जयंती हमें याद दिलाती है कि हक माँगने से नहीं, बल्कि संगठित होकर संघर्ष करने से मिलता है। उनके प्रति सच्ची श्रद्धांजलि यही होगी कि हम उनके बताए न्याय, समानता और भाईचारे के रास्ते पर अडिग रहें।
बिरदी चंद गोठवाल, नारनौल
प्रदेश प्रभारी मूकनायक, हरियाणा

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