यह लेख श्रवण कुमार द्वारा लाड़ली मीडिया फैलोशिप के अंतर्गत लिखा गया है। लाड़ली मीडिया और UNFPA द्वारा समर्थित यह फैलोशिप मीडिया में लैंगिक समानता, लड़कियों की शिक्षा और बाल विवाह जैसे मुद्दों पर संवेदनशील और जमीनी रिपोर्टिंग को बढ़ावा देती है।
इस लेख में व्यक्त विचार लेखक के हैं। लाड़ली मीडिया और UNFPA इन विचारों से आवश्यक रूप से सहमत हों, यह आवश्यक नहीं है।
राजस्थान के बालोतरा में सिणधरी जाने वाले हाईवे के किनारे बसी बागरिया समुदाय की एक अस्थायी बस्ती में रहने वाली 16 साल की दुर्गा ने बाल विवाह के दबाव के बावजूद पढ़ाई छोड़ने से इनकार कर दिया है। दसवीं में 76 प्रतिशत अंक लाने वाली दुर्गा आज झाड़ू बनाते हुए भी अपनी पढ़ाई फिर से शुरू करने का सपना देख रही है।
प्लास्टिक में संभालकर रखी एक मार्कशीट
करीब दस बाई आठ फीट की झोपड़ी के अंदर दुर्गा चटाई पर बैठी है। सामने खजूर के सूखे पत्तों का ढेर पड़ा है।
वह पत्तों को बराबर करती है, उन्हें मोड़ती है और मजबूत धागे से कसकर बांध देती है। थोड़ी देर में एक झाड़ू तैयार हो जाती है।
इसी ढेर के पास एक प्लास्टिक कवर में रखा कागज दिखाई देता है।
यह उसकी दसवीं कक्षा की मार्कशीट है।
उसमें 76 प्रतिशत अंक दर्ज हैं।
दुर्गा उसे संभालकर रखती है।
वह कहती है,
“मैंने 11वीं में साइंस ली थी। बायोलॉजी पढ़ना चाहती थी। डॉक्टर बनना चाहती थी।”
यह कहते हुए उसकी नजर अनायास ही सामने खड़े कॉलेज की ओर चली जाती है।

पढ़ाई शुरू हुई, लेकिन बीच में रुक गई
दुर्गा का परिवार मूल रूप से भीलवाड़ा जिले की आसिंद तहसील के पराग गांव का रहने वाला है।
रोजगार की तलाश में परिवार कुछ साल पहले बालोतरा आ गया।
दसवीं कक्षा पास करने के बाद दुर्गा ने वहीं 11वीं कक्षा में दाखिला लिया था और पढ़ाई शुरू कर दी थी।
लेकिन अर्धवार्षिक परीक्षाओं के दौरान उसके दादा का निधन हो गया।
परिवार की परिस्थितियां अचानक बदल गईं।
इसके बाद दुर्गा को पढ़ाई बीच में ही छोड़कर बालोतरा अपने माता-पिता के पास लौटना पड़ा।
यहीं से उसकी पढ़ाई रुक गई।

झाड़ू बनाकर चलता है परिवार
दुर्गा के बड़े पापा 65 वर्षीय पेमा राम बताते हैं कि उनका परिवार बागरिया समुदाय से है और पिछले लगभग पांच साल से बालोतरा में झाड़ू बनाने का काम कर रहा है।उनकी ही समुदाय के करीब 10 से 15 परिवार सड़क किनारे इस बस्ती में रहते हैं।
यहां लगभग 30 से 35 बच्चे 18 वर्ष से कम उम्र के हैं।
ज्यादातर बच्चे परिवार के साथ झाड़ू बनाने के काम में हाथ बंटाते हैं।
दुर्गा उन बच्चों में से एक है जिसने दसवीं कक्षा तक पढ़ाई पूरी की है।

बस्ती जहां स्कूल से ज्यादा काम दिखता है
इस बस्ती में शौचालय नहीं हैं।
पीने का पानी लोगों को पैसे देकर टैंकर से खरीदना पड़ता है।
बिजली के कनेक्शन भी अस्थायी हैं।
सबसे नजदीकी सरकारी स्कूल लगभग तीन से चार किलोमीटर दूर है।
पास के दुकानदार गिगू खान बताते हैं,
“यहां पानी भी पैसे देकर लाना पड़ता है। बिजली भी ठीक से नहीं है और शौचालय की कोई व्यवस्था नहीं है।”
बस्ती के पास होटल चलाने वाले मंगलाराम कहते हैं,
“मैंने यहां के बच्चों को कभी स्कूल जाते हुए नहीं देखा। ज्यादातर बच्चे परिवार के साथ काम में लगे रहते हैं। कई बार प्रशासन के लोग आते हैं, लेकिन पढ़ाई की बात करने के बजाय इन्हें यहां से हटाने के लिए कहते हैं।”
पढ़ाई रुकी, तो शादी की चर्चा
जब दुर्गा की पढ़ाई रुक गई तो घर में उसकी शादी की चर्चा शुरू हो गई।
परिवार के लोग कहते हैं कि वह अब बड़ी हो रही है और उन्हें “घर की इज्जत” का भी ध्यान रखना पड़ता है।
भारत में बाल विवाह निषेध अधिनियम, 2006 के अनुसार लड़कियों की शादी की न्यूनतम उम्र 18 वर्ष है।
इसके बावजूद राष्ट्रीय परिवार स्वास्थ्य सर्वेक्षण (NFHS-5) के अनुसार राजस्थान में 20 से 24 वर्ष की आयु वर्ग की लगभग एक चौथाई महिलाओं की शादी 18 वर्ष से पहले हो चुकी थी।

दुर्गा का फैसला
दुर्गा ने शादी के प्रस्ताव को स्वीकार नहीं किया।
वह कहती है,
“मैंने साफ कह दिया — पहले पढ़ाई करूंगी, शादी बाद में।”
जब परिवार का दबाव बढ़ा तो उसने अपने बाल छोटे कर लिए।
फिलहाल उसकी शादी तय नहीं हुई है।
प्रशासन का पक्ष
इस मामले में बालोतरा के उपखंड अधिकारी (SDM) अशोक कुमार कहते हैं कि प्रशासन झुग्गी बस्तियों में रहने वाले बच्चों को शिक्षा से जोड़ने की कोशिश कर रहा है।
वे कहते हैं,
“हम प्रयास कर रहे हैं कि झुग्गी क्षेत्रों में रहने वाले बच्चों को स्कूल से जोड़ा जाए। नगर पालिका को भी निर्देश दिए गए हैं कि ऐसे परिवारों को शिक्षा से जोड़ने में सहयोग करें।”
हालांकि वे यह भी मानते हैं कि सड़क किनारे बसी अस्थायी और प्रवासी बस्तियों तक लगातार पहुंच बनाए रखना आसान नहीं होता।
उनके अनुसार,
“इन परिवारों का अक्सर स्थान परिवर्तन होता रहता है। ऐसे में बच्चों की पढ़ाई को लगातार ट्रैक करना चुनौतीपूर्ण हो जाता है।”
एक सपना जो अभी बाकी है
दुर्गा फिर झाड़ू बांधने लगती है।
काम करते हुए वह धीमी आवाज में कहती है,
“मैंने 76 प्रतिशत अंक लिए हैं। इसका मतलब है कि मैं पढ़ सकती हूं।”
हाईवे के एक तरफ कॉलेज खड़ा है — अवसर का प्रतीक।
दूसरी तरफ झोपड़ियां हैं — अस्थिर जीवन का प्रतीक।
इन दोनों के बीच बैठी एक किशोरी अपनी शादी टालकर सिर्फ एक मौका मांग रही है।
दुर्गा कहती है,
“शादी इंतजार कर सकती है, लेकिन पढ़ाई नहीं।”
बाल विवाह रोकने के लिए काम कर रहे सामाजिक संगठन
बालोतरा और आसपास के क्षेत्रों में बाल विवाह की समस्या को लेकर कुछ सामाजिक संगठन भी सक्रिय हैं। इनमें से एक है Sharsathi Foundation, जो समुदाय स्तर पर बाल विवाह रोकने और जागरूकता फैलाने का काम करती है।
संस्था से जुड़े प्रतिनिधि Mahesh Kumar बताते हैं कि पिछले कुछ वर्षों में लोगों में कानून को लेकर जागरूकता बढ़ी है, लेकिन सामाजिक दबाव अभी भी एक बड़ी चुनौती है।
वे कहते हैं,
“अब ज्यादातर परिवार जानते हैं कि लड़कियों की शादी की कानूनी उम्र 18 साल है। लेकिन जब कोई लड़की पढ़ाई छोड़कर घर पर बैठ जाती है, तो परिवार और समाज दोनों की ओर से शादी का दबाव बढ़ने लगता है।”
वहीं लड़कियों की शिक्षा को बढ़ावा देने वाली संस्था Educate Girls से जुड़े फील्ड कोऑर्डिनेटर Krishna Kumar का कहना है कि माध्यमिक शिक्षा के बाद का समय लड़कियों के लिए सबसे संवेदनशील होता है।
वे बताते हैं,
“कक्षा 10 के बाद अगर किसी कारण से लड़की की पढ़ाई छूट जाती है, तो कई परिवारों में शादी की बात जल्दी शुरू हो जाती है। इसलिए लड़कियों को स्कूल में बनाए रखना बाल विवाह रोकने का सबसे प्रभावी तरीका है।”

