Friday, April 17, 2026
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संविधान सदियों की गुलामी के बाद मिले संघर्षों और बलिदानों का है निचोड़

मूकनायक/राष्ट्रीय प्रभारी ओमप्रकाश वर्मा
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भारतीय संविधान केवल कानूनों का संग्रह या सरकारी नियमावली नहीं, बल्कि भारत की लोकतांत्रिक चेतना, सामाजिक न्याय और राष्ट्र की आत्मा है। यह 26 नवंबर 1949 को अंगीकृत एक जीवंत दस्तावेज़ है, जो “हम भारत के लोग” के मूल भाव के साथ समानता, स्वतंत्रता और बंधुत्व की रक्षा करता है। यह सत्ता के दुरुपयोग को रोकता है और नागरिकों को न्यायपूर्ण जीवन सुनिश्चित करता है।भारत जैसे विशाल और विविधतापूर्ण देश में, संविधान वह सूत्र है जो अलग-अलग भाषाओं, धर्मों और संस्कृतियों को एक माला में पिरोता है। यह अल्पसंख्यकों के अधिकारों की रक्षा करता है और हर नागरिक को यह एहसास दिलाता है कि वह इस देश का अभिन्न हिस्सा है।
संविधान बदलती परिस्थितियों के साथ खुद को ढालने की क्षमता रखता है। यह समाज की धड़कनों को समझता है, इसीलिए इसमें संशोधन की व्यवस्था दी गई है ताकि यह आने वाली पीढ़ियों के लिए भी उतना ही प्रासंगिक बना रहे। कानून तोड़े जा सकते हैं या बदले जा सकते हैं, लेकिन संविधान की आत्मा—जो कि ‘न्याय और बंधुत्व’ है—अटल रहती है। जिस दिन हम इसे केवल एक किताब समझना छोड़ देंगे और अपने आचरण में उतारेंगे, उसी दिन हमारा लोकतंत्र वास्तव में सफल होगा। संविधान निर्माता डॉ भीमराव अंबेडकर ने कहा था कि “संविधान चाहे कितना भी अच्छा क्यों न हो, यदि उसे लागू करने वाले लोग खराब हैं, तो वह खराब साबित होगा। लेकिन अगर संविधान खराब भी हो, और उसे लागू करने वाले लोग अच्छे हैं, तो वह अच्छा साबित होगा।”
बिरदी चंद गोठवाल, नारनौल
प्रदेश प्रभारी मूकनायक, हरियाणा

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