मूकनायक/ दुर्गेंद्र सम्राट ब्यूरो प्रभारी बस्ती/ उत्तर प्रदेश
बस्ती। विकासखंड गौर की ग्राम पंचायत रमवापुर में मनरेगा के नाम पर हुए कथित फर्जी भुगतान ने अब बड़ा रूप ले लिया है। जांच में भुगतान “नियम विरुद्ध” पाए जाने के बावजूद महीनों तक कोई ठोस कार्रवाई न होने से प्रशासन की कार्यप्रणाली पर गंभीर सवाल खड़े हो गए हैं। मामला अब सीधे इलाहाबाद हाईकोर्ट की चौखट पर पहुंच चुका है, जहां से नोटिस जारी होने के बाद जिम्मेदारों की मुश्किलें बढ़ती दिख रही हैं।
कैसे खुला राज?
परासडीह निवासी हृदय नारायण मिश्र ने 6 फरवरी 2025 को जिलाधिकारी को शपथ पत्र के साथ शिकायत सौंपी। आरोप था कि अमन शुक्ला और सूरज शुक्ला नामक व्यक्तियों ने, जो कथित तौर पर दूसरे गांव के निवासी हैं, रमवापुर पंचायत से जॉब कार्ड बनवाकर वर्ष 2020 से 2023 के बीच लगभग 20-20 हजार रुपये अपने खातों में प्राप्त कर लिए।
सबसे बड़ा सवाल यही उठा—
दूसरे गांव के व्यक्ति का जॉब कार्ड रमवापुर में आखिर बना कैसे?
जांच में खुली परतें
शिकायत पर गठित जांच टीम ने अपनी रिपोर्ट में साफ माना कि संबंधित खातों में हुआ भुगतान नियमों के विपरीत है।
खंड विकास अधिकारी (गौर) ने भी अनियमितता की पुष्टि की और बताया कि तत्कालीन सचिव व टेक्निकल असिस्टेंट के नाम जिला पंचायत अधिकारी (डीपीआरओ) को कार्रवाई हेतु भेज दिए गए थे।
सूत्रों का दावा है कि यह प्रक्रिया करीब छह माह पहले पूरी हो चुकी थी—लेकिन उसके बाद फाइल आगे क्यों नहीं बढ़ी, यह बड़ा प्रश्न बना हुआ है।
छह माह की चुप्पी, क्यों?
जांच में गड़बड़ी साबित होने के बाद भी
रिकवरी क्यों नहीं हुई?
एफआईआर दर्ज क्यों नहीं की गई?
विभागीय कार्रवाई लंबित क्यों है?
इसी देरी को लेकर शिकायतकर्ता ने न्यायालय का दरवाजा खटखटाया।
हाईकोर्ट से नोटिस, सबकी बढ़ी धड़कनें
मामले में दायर जनहित याचिका पर इलाहाबाद हाईकोर्ट ने नोटिस जारी किया है।
नोटिस अमन शुक्ला, सूरज शुक्ला, तत्कालीन सचिव अखिलेश चौधरी, जेई जानकी सिंह, रोजगार सेवक रेनू शुक्ला और थाना प्रभारी गौर को पक्षकार बनाते हुए भेजा गया है। अब सभी को अदालत में अपना पक्ष रखना होगा।
लोगों में चर्चा है कि—
अलग-अलग जॉब कार्ड संख्या होने के बावजूद भुगतान कैसे हुआ?
बैंक खातों का सत्यापन किसने किया? ऑनलाइन पेमेंट से पहले डिजिटल एंट्री और फिजिकल वेरिफिकेशन क्यों नहीं हुआ?
यदि आरोप सही साबित होते हैं, तो यह सिर्फ प्रशासनिक चूक नहीं बल्कि सरकारी धन के दुरुपयोग का गंभीर मामला बन सकता है।
प्रशासन की चुप्पी पर सवाल
डीपीआरओ स्तर से अब तक कोई आधिकारिक बयान सामने नहीं आया है। फोन कॉल का जवाब न मिलने से पारदर्शिता पर और भी प्रश्नचिह्न लग रहे हैं।
लोगों का कहना है कि यदि समय रहते कार्रवाई होती, तो मामला अदालत तक न पहुंचता।
अब क्या होगा?
हाईकोर्ट की निगरानी में चल रहे इस प्रकरण से प्रशासनिक हलकों में हलचल तेज है।
सबकी निगाहें अब इस बात पर टिकी हैं कि—
क्या दोषियों पर विभागीय और आपराधिक कार्रवाई होगी?
क्या सरकारी धन की रिकवरी सुनिश्चित की जाएगी?
या फिर यह मामला भी फाइलों में दबकर रह जाएगा?
फिलहाल रमवापुर मनरेगा भुगतान प्रकरण ने जिले में पारदर्शिता और जवाबदेही को लेकर बड़ी बहस छेड़ दी है। आने वाले दिनों में अदालत की सख्ती इस मामले की दिशा तय करेगी।

