Thursday, February 26, 2026
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*पेंसिल स्केच – श्रद्धेया राजेंद्री कुरील*

विख्यात समाजसेविका, बहुजन चिंतक और क्रांतिकारी महिला जिन्होंने कई आंबेडकरी बौद्ध आन्दोलनो में हिस्सा लिया और जिसके लिए उन्हें जेल भी जाना पड़ा। आपकी स्वस्थ दीर्घायु के लिए मेरी *कलात्मक शुभकामनाएं*

🖌️✍🏻 *Artist HARI BHARTI*

*लेखक:* तत्त्वलीन श्रवण कुमार पिपल
एवं श्रीलाल बौद्ध

*श्रद्धेया राजेंद्री कुरील*

श्रद्धेया राजेंद्री कुरील जी का जन्म 28 दिसंबर 1944 को गांव अलीपुर,डाकखाना हैदरपुर, जिला इटावा (उत्तर प्रदेश) में हुआ। आपके पिताजी हालांकि अनपढ़ थे। फिर भी वे सामाजिक गतिविधियों में सदैव हिस्सा लेते थे और आपकी माता माननीय मूला देवी का उन्हें सहयोग मिलता था। आपने श्री अजीतमल जनता इंटर कॉलेज इटावा से 11वीं कक्षा पास की है और उसके बाद 25 मई 1964 को आपकी शादी मान्यवर राजाराम कुरील जी से हो गई जो कि भारत सरकार की सेवा में थे। पांच बच्चों को पलते हुए घरेलू जिम्मेदारियों को भी बाखूबी निभाया और आपके पांचों बच्चे ऊंचे ऊंचे पदों पर अपनी सेवाएं दे रहे हैं।आपके ससुर परिनिवृत्त माननीय हीरालाल कुरील पूरी तरह से बाबा साहेब डॉक्टर भीमराव अंबेडकर के आंदोलन के प्रति समर्पित थे।

माननीय महाराज सिंह भारती व अर्जक संघ के रामस्वरूप वर्मा जी का आपके ससुर के पास काफी आना-जाना था। इस कारण आपकी मुलाकात माननीय महाराज सिंह भारती व अर्जक संघ के रामस्वरूप वर्मा जी, पेरियार ललाई सिंह यादव से कई बार साक्षात्कार हुआ। आपके ससुर के प्रोत्साहन और इन तीनों महामानवों के विचार से आप काफी प्रभावित हुई और आप भी बाबा साहेब डॉक्टर भीमराव अंबेडकर के आंदोलन में योगदान देने का मन बनाया और योगदान करना प्रारंभ किया। आपके पति कभी भी आपकी सामाजिक व धार्मिक गतिविधियों में रुकावट नहीं बने। आपके पति ने सदैव आपको बुद्धिस्ट आंबेडकरी गतिविधियों में हिस्सा लेने के लिए उत्साहित किया। वर्ष 1976 में आप बुद्धि सोसाइटी ऑफ इंडिया की दिल्ली प्रदेश के उपाध्यक्ष चुनी गई और लगभग 6 वर्ष तक इस पद पर रहकर बहुत आंदोलन में अपना महत्वपूर्ण योगदान दिया। सामाजिक गतिविधियों के साथ साथ बुद्ध धम्म के प्रसार के लिए बढ़ चढ़ कर हिस्सा लेने लगीं। इन कार्यों से आपकी पहचान धार्मिक नेता की बनी। आप वर्ष 1985 में शेड्यूल्ड कास्ट वेलफेयर एसोसिएशन से जुड़ी रही लेकिन कुछ कारणों से आपने यहां से त्यागपत्र दे दिया। वर्ष 1986 में महिला जागृति मिशन से जुड़ी और अनेक पदों पर रहते हुए महिलाओं के हकों की आवाज बुलंद की। वर्ष 1977 में आप शोषित समाज यूथ अंबेडकर सेंटर साहिबाबाद, गाजियाबाद की उपाध्यक्ष बनी और आज तक इस पद पर विराजमान हैं।

इसके अतिरिक्त बुद्ध भीम मिशन के अनेकों संगठनों से जुड़ी रहीं और आंदोलन को मजबूती प्रदान करने के लिए कार्य करते रही हैं। धार्मिक नेता के रूप में अपने सबसे ज्यादा महत्वपूर्ण कार्य वर्ष 1998 के अंत में दिल्ली में मीना बाजार, जामा मस्जिद के पीछे स्थित आर्ट गैलरी मार्केट में भगवान बुद्ध की आपत्तिजनक मूर्तियों को पकड़वा कर किया। इस दुआकर कार्य में आपने दुकानदारों की दुकान से यह आपत्तिजनक मूर्तियां बरामद करवाई। इन दुकानदारों को गिरफ्तार कराने के लिए आपने तीस हजारी कोर्ट एवं पटियाला हाउस हाई कोर्ट, नई दिल्ली में अपने साथियों के साथ जोरदार संघर्ष करते हुए आंदोलन किया। इस दौरान आप की जान को खतरा पैदा हो गया था। दुकानदारों ने आपके घर तक आपको मरवाने के लिए गुंडों को भेजा, लेकिन जान की परवाह न करते हुए आप अपने पथ पर अडिग रहें और अंत में जीत आपकी हुई। अपराधी दुकानदारों की गिरफ्तारी और इन दुकानदारों पर मुकदमा चल रहा है। 1964 से लेकर आज तक लगभग 57 वर्षों में सामाजिक धार्मिक गतिविधियों में भाग लेते हुए आपको काफी परेशानियां उठानी पड़ी और कई बार आपकी जेल भी जाना पड़ा। आपकी ईमानदारी, साहस, निडरता और बुद्धिमत्ता का लोग आज भी उदाहरण देते हैं। आप अपना बचा हुआ जीवन भी बाबा साहेब डॉक्टर भीमराव अंबेडकर की मंशा के अनुरूप बुद्धमय भारत के निर्माण में लगाने के लिए कृत संकल्प हैं।

आप ने कलम के साथ भी न्याय की लड़ाई लड़ी। आपके द्वारा लिखे गए लेख अनेक पत्र पत्रिकाओं में छपे गए। आप 2006 से आज तक बुद्ध भीम मिशन की स्थापित पत्रिका मैत्री टाइम्स की मुख्य सलाहकार भी हैं
अपने जीवन में उन्होंने पत्रकारों, चैनलों को स्थापित करने के लिए हमेशा आर्थिक सहयोग भी दिया।
आपने अनेक बार विदेशी यात्राएं भी की हैं, जहां से उनके सामाजिक स्तर को जानने का अवसर मिला।

बुद्ध भीम आंदोलन में हिस्सा लेने के लिए भारत भर में भ्रमण किया। भारत। है में जहां पर भी गई और आंदोलनों में महिलाओं की उपस्थिति को लेकर हमेशा चिंतित रहीं। पुरुषों को प्रोत्साहित करते हुए महिलाओं को भी आंदोलनों में लाने के लिए आह्वान करती रहीं। आपके आंदोलन को देखते हुए आपको महिला विमर्श की मुखर आवाज के रूप में भी पहचान मिली।

जीवन भर संघर्ष करने के बदले अनेक संस्थाओं ने उनको सम्मानित भी किया।

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