मूकनायक/राष्ट्रीय प्रभारी ओमप्रकाश वर्मा
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जिस कुर्सी पर आज हम सभी बैठे हैं, वह केवल आपकी मेहनत की लकड़ी से नहीं बनी है, बल्कि उस कुर्सी के निर्माण में महात्मा ज्योतिबा फुले का पसीना, माता सावित्रीबाई फुले पर फेंका गया कीचड़, छत्रपति शाहू जी महाराज की दूरदर्शिता और बाबा साहेब डॉ. अंबेडकर के बच्चों का बलिदान लगा है। आप कहते हैं कि आप अपनी “मेहनत” से आईएएस, आईपीएस, इंजीनियर, डॉक्टर प्रोफेसर, कर्मचारी, अधिकारी, जज या बड़े अफसर बने हैं। बेशक आपने पढ़ाई की, लेकिन याद रखिए—काबिलियत तो उन पूर्वजों में भी थी जिन्हें पढ़ने ही नहीं दिया गया। आपकी मेहनत को ‘अधिकार’ में बदलने के लिए महापुरुषों ने सदियों की गुलामी की जंजीरें अपने हाथों से काटी हैं। अगर संविधान ना होता, तो आपकी काबिलियत आज भी किसी खेत में मजदूरी कर रही होती।
बाबा साहब डॉ. भीमराव अंबेडकर और महात्मा ज्योतिबा फुले ने भारत में समानता, शिक्षा और सामाजिक न्याय की नींव रखकर मानवता व बंधुत्व को बढ़ावा दिया। फुले ने शोषित जातियों व महिलाओं की शिक्षा-सशक्तीकरण (1848 में पुणे में लड़कियों का स्कूल) हेतु संघर्ष किया, जबकि डॉ. अंबेडकर ने संविधान के माध्यम से अस्पृश्यता का अंत (अनुच्छेद 17) और कानूनन अधिकार सुनिश्चित कर समतावादी समाज का मार्ग प्रशस्त किया। इन महापुरुषों के प्रयासों का उद्देश्य एक ऐसे राष्ट्र का निर्माण करना था, जहाँ धर्म, जाति, लिंग या जन्मस्थान के आधार पर भेदभाव ना हो। इनके द्वारा स्थापित समानता, स्वतंत्रता और बंधुत्व के आदर्श आज भी भारतीय लोकतंत्र का मार्गदर्शक हैं।
बिरदी चंद गोठवाल
प्रदेश प्रभारी मूकनायक, हरियाणा

