संत रविदास जी भारतीय भक्ति आंदोलन के प्रमुख संत-कवि और समाज सुधारक थे।
वे मध्यकालीन भारत में समानता, भक्ति और जातिवाद के विरोध के प्रतीक बने।
जन्म और प्रारंभिक जीवन
संत रविदास जी का जन्म 1377 ईस्वी (विक्रम संवत 1433) में माघ पूर्णिमा (रविवार) के दिन उत्तर प्रदेश के वाराणसी (काशी) के निकट सीर गोवर्धनपुर (या गोबर्धनपुर) गांव में हुआ था।
पिता का नाम: संतोख दास (या संतोक दास, रग्घु)
माता का नाम: कर्मा देवी (या कालसा देवी, कलसा)
वे चर्मकार (चमार) समुदाय से थे, जो उस समय अछूत माने जाते थे।
उनका बचपन गरीबी और सामाजिक भेदभाव में बीता, लेकिन बचपन से ही वे अपने कार्य में लीन रहते थे।
12 वर्ष की आयु में उनका विवाह लोना देवी (या लोनाजी) से हुआ। उनके एक पुत्र थे – विजय दास।
जीवन और कार्य
रविदास जी अपना पेशा मोची (जूते बनाने) का करते थे,
वे निर्गुण भक्ति के धार्मिक संत थे और ईश्वर को निराकार मानते थे।
उन्होंने जाति-पाति, ऊँच-नीच के भेदभाव को कड़ा विरोध किया और सभी मनुष्यों में समानता का संदेश दिया।
उनकी प्रसिद्धि इतनी फैली कि मीराबाई उनकी शिष्या बनीं और उन्होंने उन्हें अपना गुरु माना। कुछ कथाओं में कबीर जी से उनका मिलन भी बताया जाता है।
सुल्तान सिकंदर लोदी ने भी उनकी ख्याति सुनकर उन्हें दिल्ली बुलाया था।
एक प्रसिद्ध कथा है कि चित्तौड़ की रानी (मीराबाई के ससुराल पक्ष से संबंधित) ने उन्हें गुरु बनाया और जब जब किसी ने जाति के आधार पर भेदभाव किया, तो रविदास जी ने ज्ञान के चमत्कार से सभी को एक समान दिखाया (सबके बीच रविदास जी दिखाई दिए)।
उनका प्रसिद्ध वाक्य है:
“मन चंगा तो कठौती में गंगा”
(अर्थ: यदि मन शुद्ध है, तो घर की कठौती में भी गंगा मौजूद है। अर्थात् बाहरी तीर्थ से अधिक महत्व आंतरिक शुद्धि का है।)
रचनाएँ और योगदान
रविदास जी ने सरल सधुक्कड़ी भाषा में अनेक भजन, पद और दोहे रचे, जो भक्ति, प्रेम, समानता प्राप्ति पर केंद्रित हैं।
उनके 40 भजन श्री गुरु ग्रंथ साहिब में शामिल हैं (रागों में: राग रामकली, आसा, गउड़ी, सोरठ आदि)।
उनकी कुछ प्रसिद्ध पंक्तियाँ:
ऐसा चाहूं राज मैं जहां सबन को मिले अन्न छोटे बडे सब सम बसे रविदास रहें प्रसन्न
वे रविदासिया संप्रदाय के संस्थापक माने जाते हैं, जिसके अनुयायी आज भी उन्हें सतगुरु या संत शिरोमणि कहकर पूजते हैं।
समाधि (मृत्यु)
उनकी मृत्यु के बारे में विभिन्न मत हैं। सामान्यतः 1518 ईस्वी के आसपास काशी में या कुछ स्रोतों के अनुसार चित्तौड़गढ़ में मानी जाती है।
कुछ परंपराओं में उन्हें 150+ वर्ष जीवित रहने वाला बताया जाता है।
आज का महत्व
संत रविदास जी का जीवन दलित-उत्थान, सामाजिक न्याय और मानवतावाद का प्रतीक है।
उनकी जयंती माघ पूर्णिमा को गुरु रविदास जयंती के रूप में बड़े उत्साह से मनाई जाती है, विशेषकर उत्तर भारत से लेकर पूरे देश और विदेशों में मनाई जाती है।
उनका जन्मस्थान श्री गुरु रविदास जन्म स्थान वाराणसी में एक प्रमुख तीर्थ है।
बौद्धाचार्य पूरणमल बौद्ध प्रदेश अध्यक्ष भारतीय बौद्ध महासभा राजस्थान दक्षिण
जय गुरु रविदास!
नमो बुद्धाय

