आज से 173 वर्ष पहले, 28 जनवरी 1853 को, भारत की पहली महिला शिक्षिका और महान समाज सुधारक सावित्रीबाई फुले ने Infanticide Prohibition Home (शिशु हत्या निषेध गृह) की स्थापना की। यह अपने आप में भारत का पहला ऐसा आश्रय गृह था, जहाँ विधवा महिलाएँ बिना भय और अपमान के अपने बच्चों को जन्म दे सकती थीं और चाहें तो उन्हें वहीं सुरक्षित छोड़ सकती थीं।
1853 से 1873 के बीच 66 महिलाओं ने यहाँ बच्चों को जन्म दिया।
उस दौर की ब्राह्मणवादी सामाजिक व्यवस्था महिलाओं के प्रति अत्यंत दमनकारी थी—चाहे वे किसी भी जाति की हों। समाज में पुरुष वर्चस्व को समर्थन देने वाले असंख्य कर्मकांड, परंपराएँ और रूढ़ियाँ प्रचलित थीं, जिनका सबसे बड़ा भार स्त्रियों को उठाना पड़ता था।
यह वह समय था जब विधवा पुनर्विवाह की कल्पना तक नहीं की जाती थी। बहुत कम उम्र में लड़कियों की शादी, अक्सर उम्र में बहुत बड़े पुरुषों से कर दी जाती थी। परिणामस्वरूप पुणे और आसपास के क्षेत्रों में कम उम्र की विधवाएँ आम दृश्य बन चुकी थीं—कई तो किशोरावस्था या बाल्यावस्था में ही विधवा हो जाती थीं।
इन विधवाओं को समाज से सार्वजनिक रूप से बहिष्कृत कर दिया जाता था। आर्थिक सहारे के नाम पर कुछ भी नहीं होता था और वे गुप्त रूप से यौन शोषण की शिकार बनती थीं। गर्भनिरोध के साधनों के अभाव में वे गर्भवती हो जातीं, जबकि इसके लिए वे स्वयं जिम्मेदार नहीं थीं।
समाज उन्हें उसी अपराध के लिए दंडित करता था, जो उन्होंने किया ही नहीं था।
अस्वास्थ्यकर और खतरनाक तरीकों से गर्भपात के कारण अनेक महिलाओं को अपनी जान गंवानी पड़ती थी। सामाजिक बहिष्कार के डर से कई बार विधवाएँ नवजात शिशुओं की हत्या करने को मजबूर हो जाती थीं या फिर उन्हें अपना घर छोड़कर भागना पड़ता था।
ऐसे अंधकारमय समय में सावित्रीबाई फुले का यह कार्य केवल सामाजिक सुधार नहीं, बल्कि मानवता की एक साहसी घोषणा था—एक ऐसा कदम, जिसने स्त्रियों को जीवन, सम्मान और विकल्प का अधिकार दिया।
संकलन: बौद्धचार्य पूरणमल बौद्ध अलवर राजस्थान

