Thursday, February 26, 2026
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*हिंदू-मुस्लिम सांप्रदायिकता : धार्मिक समस्या अथवा राजनीतिक साज़िश..?*

अशोक साकेत
राष्ट्रीय प्रवक्ता
बहुजन द्रविड पार्टी, नई दिल्ली
9717366805

हमारे देश में विभिन्न धर्मावलंबी लोग निवास करते हैं। ऐसे में जब किसी धार्मिक उत्सव का समय आता है, तो लोगों का उत्साह देखते ही बनता है। वह अपने धर्म, भगवान, खुदा, गॉड, पैगम्बर आदि के प्रति पूरी आस्था (भक्ति) और श्रद्धा के साथ नतमस्तक होते हैं। ऐसे समय में बाकी दिनों की अपेक्षा धर्म या भगवान के प्रति भक्तों पर भावुकता कुछ ज्यादा ही हावी होती है। अब चूंकि हिंदू-मुस्लिम, सिख-ईसाई-बौद्ध धर्मी लोग आसपास ही बसे होते हैं इस वजह से ऐसे मौकों पर कभी कभार एक-दूसरे के कुछ धार्मिक अतिक्रमण भी हो जाते हैं जिसकी वजह से आपस में कुछ खटास भी पैदा हो जाया करती है।

बस फिर क्या, धर्म की आड़ में भक्तों की बलि चढ़ा कर अपनी राजनीतिक रोटियां सेंकने वाले लोगों की चांदी हो जाती है, क्योंकि वे ऐसे ही मौकों के इंतजार में रहते हैं।

इसी तर्ज पर, पिछले अप्रैल माह से ब्राह्मण-सय्यदवादी लोगों _(नोट : वर्तमान में हिंदू ब्राह्मणों की संघी शाखा नागपुर, महाराष्ट्र से संचालित होती है और अशराफी मुसलमानों की सय्यदी शाखा हैदराबाद, आंध्र प्रदेश से संचालित होती है। दोनों शाखाओं का कार्य एक ही है, हिंदू-मुस्लिम में साम्प्रदायिक भावना को उभार कर साम्प्रदायिकता की आग में अपनी राजनीतिक रोटियां सेंकना।)_ द्वारा हिंदू-मुस्लिम के नाम पर धार्मिक कट्टरता परोसकर देश का सौहार्द बिगाड़ने के प्रयास किए जा रहे थे। परिणामस्वरूप देश के कुछ हिस्सों में थोड़े-बहुत फ़साद भी हुए, लेकिन संयोगवश इन फसादों में किसी की जान नहीं गई।

जब देश का आम जनमानस बेतहाशा बढ़ती महंगाई, बेरोजगारी, शिक्षा, स्वास्थ्य और रोजगार की बातें करने लगा तो *’ज्ञानवापी मस्जिद बनाम शिवलिंग’* का मुद्दा उछाल दिया गया। इसी मुद्दे की बहस को लेकर एक दिन भाजपा की एक ‘भद्र’ ब्राह्मण नेत्री *(नुपुर शर्मा)* टीवी डिबेट में आई और मुसलमानों के पैगम्बर मुहम्मद साहब पर ‘अभद्र’ टिप्पणी करके चली गई।

इसके बाद उसकी ‘अभद्र’ टिप्पणी के खिलाफ देश-विदेश में आलोचनाओं, समर्थनों और धमकियों का माहौल गर्म हो गया; और अंततः उसकी परिणति दिनांक *28 जून, 2022 को उदयपुर (राजस्थान) में दो धर्मांध मुस्लिम युवाओं द्वारा कन्हैयालाल नामक एक हिंदू ‘दर्जी’ की दिनदहाड़े गला रेतकर हत्या के रूप में हुई।* इस हत्या की वजह यह बताई जा रही है कि, “उस दर्जी ने अपने व्हाट्सएप पर नुपुर शर्मा की उक्त टिप्पणी का समर्थन किया था, जिसमें उसने पैगम्बर मुहम्मद साहब के खिलाफ ‘अभद्र’ टिप्पणी की थी।”

इस तरह संघी ब्राह्मणों को एक बार फिर से मुसलमानों के ऊपर हमलावर होने तथा हिंदुओं का ध्रुवीकरण कर अपनी राजनीतिक रोटियां सेंकने का मौका हाथ लग गया। इसी मौके का फायदा उठाकर ब्राह्मणवादी मीडिया इस घटना को ऐसे परोस रहा है जैसे इस देश में इस तरह की यह एकलौती घटना हो; जबकि सबको मालूम है कि जाति और धर्म के नाम पर दलित, आदिवासी, धार्मिक अल्पसंख्यकों के साथ देश में आये दिन ऐसी वीभत्स घटनाएं घटित होती रहती हैं। तब यह ब्राह्मणवादी मीडिया अमूमन मूकबधिर ही बना रहता है।

निश्चित तौर पर यह भी एक वीभत्स घटना थी। इसकी जितनी निंदा की जाए, कम है। लेकिन आज देश को और विशेषकर धार्मिक, राजनीतिक अंधभक्तों को यह समझना होगा कि हमारे इस सभ्य समाज में घटित हो रहीं ऐसी वीभत्स घटनाओं का जिम्मेदार कौन है? वे कौन लोग हैं जो लोगों को इस हद तक भड़का देतें हैं कि लोग धार्मिक-जातीय उन्माद में अंधे होकर हत्या जैसे जघन्य अपराध करने के उपरांत भी अपराध भाव महसूस नहीं करते? दूसरा यह कि, ऐसी घटनाएं क्या धार्मिक समस्या हैं अथवा किसी राजनीतिक साज़िश का हिस्सा?

इससे पहले कि हम आगे की बातों का जिक्र करें, भारतीय हिंदू-मुस्लिम समाज की सामाजिक संरचना को समझना जरूरी है। यथा,

*भारतीय हिंदू कौन?* : हिंदू वर्ण-व्यवस्था के अनुसार, ब्राह्मण पहले दर्जे का हिंदू; क्षत्रिय (राजपूत) दोयम दर्जे का हिंदू; वैश्य तीसरे दर्जे का हिंदू। (कुल हिंदू आबादी का 10 से 15 फीसदी)। शूद्र (यानी पिछड़ा वर्ग) चौथे दर्जे का हिंदू और बाद में पांचवें दर्जे के रूप में जबरन हिंदू बना दिया गया अछूत और आदिवासी यानी एससी/एसटी वर्ग। (कुल हिंदू आबादी का 85 से 90 फीसदी)।

*भारतीय मुसलमान कौन?* इस्लाम के मूल में जाति या वर्ण-व्यवस्था का प्रावधान नहीं है, लेकिन भारतीय इस्लाम धर्म हिंदू धर्म की जाति-व्यवस्था से ग्रसित है। फैयाज अहमद फैजी के अनुसार, भारतीय मुसलमान यानी विदेशी मूल का मुसलमान + धर्मांतरित हुए ब्राह्मण, क्षत्रिय (राजपूत), वैश्य। यानी अरबी, ईरानी, तुर्की, मुगल, शेख, सय्यद, मिर्जा, पठान इत्यादि; जिन्हें *अशराफ़* यानी उच्च माना जाता है। यह भारतीय मुस्लिम आबादी का 10 से 15 फीसदी हैं।

वहीं दूसरी तरफ, *अजलाफ़* (असभ्य) यानी धर्मांतरित शूद्र (पिछड़ा वर्ग) यानी शिल्पकार जातियां और *अरजाल* (निम्न) यानी धर्मांतरित हुई अछूत और आदिवासी जातियां। जैसे, कुंजड़े (राईन), अंसारी (जुलाहा/बुनकर), कुरैशी (कसाई), छिपी, मनिहार (सिद्दीकी), बढ़ई, लुहार, तेली, सक्के, धोबी (हवारी), नाई, हज्जाम (सलमानी), दर्जी (इदरीसी), ठठेरे, मोची, कुम्हार, धुनिया (मंसूर), डफ़ली, भक्को, कोरी, मेहतर (हलालखोर), फ़कीर (अलवी), गोरकन, वन-गुजर, तड़वी, भील, सेपिया, बकरवाल इत्यादि। यह जातियां *पसमांदा मुस्लिम* के नाम से पहचानी जाती हैं और भारतीय मुस्लिम आबादी का 85 से 90 फीसदी हैं।

*अब यहां विशेष रूप से ध्यान देने वाली बात यह है कि हिंदुओं में जो सामाजिक, धार्मिक, आर्थिक, राजनीतिक और प्रशासनिक हैसियत ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य यानी तथाकथित सवर्णों की है; भारतीय मुसलमानों में वहीं सामाजिक, धार्मिक, आर्थिक, राजनीतिक और प्रशासनिक हैसियत सय्यद, शेख, मुग़ल, पठान इत्यादि यानी अशराफ़ की है।*

इस जातीय विवरण के बाद समझना मुश्किल नहीं है कि, हिंदुओं के नाम पर मुट्ठीभर ब्राह्मणवादी लोगों के पास और मुसलमानों के नाम पर मुट्ठीभर सय्यदवादी (अशराफी) लोगों के पास ही देश की सत्ता, संपत्ति, प्रशासनिक पद और सामाजिक-धार्मिक श्रेष्ठता केंद्रित है, तथा 85 से 90 फीसदी बहुसंख्यक हिंदू-मुस्लिम आबादी आज जीवनोपयोगी मूलभूत सुविधाओं के लिए भी महरूम बना कर रखी गई है।

ऐसे में जब हिंदुओं का *गैर-सवर्ण वर्ग* (एससी/एसटी, ओबीसी) और मुसलमानों का *पसमांदा वर्ग* अपने हक-अधिकार तथा मूलभूत सुविधाओं के लिए मुखर होने लगता है तो इधर सवर्ण (ब्राह्मणवादी) लोग *’हिंदू धर्म खतरे में है, हिंदुओं संगठित हो जाओ और धर्म बचाओ’* का राग अलापने लगते हैं और उधर अशराफ़ (सय्यदवादी) लोग *’इस्लाम धर्म ख़तरे में है, मुसलमानों संगठित हो जाओ और इस्लाम बचाओ’* का राग अलापना शुरू कर देते हैं। जब इससे भी काम न चले तो फिर एक-दूसरे के सम्मानित पैगम्बर-भगवानों और धार्मिक प्रतीकों के खिलाफ अमर्यादित टिप्पणियां कर लोगों की धार्मिक भावना भड़काने का काम करते हैं। चाहे 2012 में AIMIM के नेता मा. असद्दुदीन ओवैसी के छोटे भाई अकबरुद्दीन ओवैसी द्वारा हिंदुओं के भगवान राम और हिंदुओं के खिलाफ दिया गया भड़काऊ भाषण हो या कुछ दिनों पूर्व भाजपा नेत्री नुपुर शर्मा द्वारा पैगम्बर मुहम्मद साहब को लेकर की गई अभद्र टिप्पणी इत्यादि, ये सब इसी राजनीतिक षड्यंत्र का हिस्सा हैं।

चूंकि इन दलित, पिछड़े, मेहनतकश हिंदू-मुस्लिम लोगों में शिक्षा के अभाव की वजह से धर्मांधता कुछ ज़्यादा ही हावी होती है तथा पूर्व में एक ही पूर्वज की संतान होने की वजह से विधर्मी होने के बावजूद आज भी ये देशभर में एक-दूसरे के नजदीक ही बसे होते हैं।

*इसलिए इस हिंदू-मुस्लिम तुष्टिकरण की राजनीतिक साज़िश के परिणामस्वरूप जब कोई दंगा-फ़साद पैदा होता है तो इन्हीं में सर्वाधिक मार-काट होती है। यानी इधर हिंदू धर्म को बचाने के चक्कर में हमेशा पिछड़ा, दलित, आदिवासी यानी बहुजन समाज की बलि चढ़ती है और उधर इस्लाम धर्म को बचाने के चक्कर में हमेशा ‘पसमांदा मुस्लिम’ (यानी धर्मांतरित पिछड़ा, दलित, आदिवासी) की बलि चढ़ती है; और ब्राह्मण-सय्यदवादी (आपसी रिश्तेदार) लोग इनकी लाशों में बैठकर देश की सत्ता, संपत्ति, प्रशासनिक पद और सामाजिक-धार्मिक उच्चता का बेहिसाब मजा लूटते हैं।*

इसलिए इस देश की बहुसंख्यक हिंदू-मुस्लिम आबादी (जो हमेशा ही ऐसी घटनाओं का शिकार होती है) को इन मुट्ठीभर शोषकों की राजनीतिक साजिश को समझते हुए ऐसी जानलेवा धर्मांधता से बचना होगा तथा आपसी सौहार्द कायम कर अपने हक-अधिकार, मूलभूत सुविधाओं की प्राप्ति हेतु साझा संघर्ष करना होगा। यही आपकी भलाई और तरक्की का एकमात्र मार्ग है। धन्यवाद.!

_कांशीराम मिशन में.

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