मूकनायक/राष्ट्रीय प्रभारी ओमप्रकाश वर्मा
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मानव जीवन में बचपन ही प्रेम की सबसे शुद्ध अवस्था है, जहाँ कोई स्वार्थ नहीं होता । माता-पिता, भाई-बहन और प्रकृति का प्रेम बिना किसी शर्त के मिलता है । इस उम्र में बच्चा प्रेम का ‘स्त्रोत’ होता है, जहाँ उसे केवल स्नेह लेना होता है, बदले में कुछ देने की जिम्मेदारी नहीं होती। यह प्रेम का सबसे शुद्ध और ‘फ्री’ स्वरूप है। वहीं जवानी वह दौर है, जब हम जीवन के उतार-चढ़ावों से गुजरते हैं । प्रेम अब केवल पाना नहीं, बल्कि कमाना पड़ता है । इसमें रिश्ते बनाना, उन्हें निभाना, त्याग करना और मेहनत करना शामिल है । इसीलिए प्रेम मानव जीवन का वह अटूट हिस्सा है, जो उम्र के हर पड़ाव पर अपना रंग बदलता है ।
इसी के चलते जीवन के अंतिम पड़ाव यानी बुढ़ापे में स्थिति सबसे चुनौतीपूर्ण हो जाती है। जिस प्रेम को बचपन में मुफ्त पाया और जवानी में शान से कमाया, बुढ़ापे में उसी प्रेम के लिए अक्सर तरसना पड़ता है। यह विडंबना ही है कि जिस व्यक्ति ने पूरी उम्र दूसरों को प्रेम दिया, अंत में उसे उसी प्रेम की एक बूंद के लिए अपनों की ओर देखना पड़ता है। प्रेम का यह चक्र हमें जीवन की नश्वरता और रिश्तों की अहमियत सिखाता है। यह दर्शाता है कि समय कैसे हमारी स्थिति को बदल देता है। इसलिए, जब हमारे पास प्रेम देने की शक्ति हो, तो उसे दिल खोलकर बांटना चाहिए ताकि जब ‘मांगने’ का समय आए, तो हमारे पास संचित किए हुए मधुर रिश्तों की पूंजी मौजूद हो।
बिरदी चंद गोठवाल
प्रदेश प्रभारी मूकनायक, हरियाणा

