Thursday, February 26, 2026
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सेवा, स्वच्छता और शिक्षा के प्रतीक संत गाडगे बाबा: पुण्यतिथि पर उनके सामाजिक सुधार और जीवन प्रसंगों का स्मरण

आजाद परिंदा।
महरौनी/ललितपुर।
महान समाज सुधारक संत गाडगे बाबा की पुण्यतिथि पर आयोजित श्रद्धांजलि कार्यक्रम में वक्ताओं ने उनके सामाजिक सुधारों और संघर्षपूर्ण जीवन प्रसंगों को याद किया। कार्यक्रम की अध्यक्षता मथुरा प्रसाद एवं सुरेश कुमार अध्यापक ने की, जबकि मुख्य अतिथि सेवानिवृत्त बाबूजी हलकरन चंचल रहे। संचालन दयाशंकर रजक ने किया। शांति निकेतन इंटर कॉलेज महरौनी के पूर्व प्रधानाचार्य सूर्यकांत जी ने बताया कि 23 फरवरी 1876 को महाराष्ट्र के अमरावती जिले के शेंडगांव में जन्मे देबूजी ज़िंगरूजी जानोरकर (संत गाडगे बाबा) ने निर्धनता, पारिवारिक संकट और सामाजिक अन्याय को निकट से देखा। बचपन में पिता के असमय निधन और रिश्तेदारों द्वारा मेहनत से उपजाऊ बनाई गई जमीन हड़प लिए जाने की घटना ने उनके मन में यह दृढ़ विश्वास पैदा किया कि शिक्षा ही शोषण के विरुद्ध सबसे बड़ा हथियार है।

वक्ताओं ने बताया कि संत गाडगे बाबा ने भिक्षा को साधन बनाकर समाज सुधार का अनूठा मार्ग चुना। वे गाँव-गाँव घूमकर पहले स्वयं झाड़ू लगाते, सार्वजनिक स्थलों, मंदिरों और सड़कों की सफाई करते और फिर लोगों को स्वच्छता, नशामुक्ति और समानता का संदेश देते थे। श्रीकांत गौतम ने कहा कि बाबा का मानना था, गंदगी गरीबी नहीं, बल्कि लापरवाही का परिणाम है। सामाजिक कार्यकर्ता सुखदयाल अहिरवार ने कहा कि गाडगे बाबा ने जाति-पांति, छुआछूत, अंधविश्वास और नशाखोरी के विरुद्ध खुला संघर्ष किया, जिसकी वजह से उन्हें कई बार विरोध और बहिष्कार का सामना भी करना पड़ा। सेवानिवृत्त अध्यापक थोवनलाल अहिरवार ने बताया कि बाबा चाहते थे कि उनके द्वारा स्थापित शैक्षणिक संस्थान डॉ. भीमराव अंबेडकर के मार्गदर्शन में चलें, ताकि वंचित समाज की शिक्षा का मिशन निरंतर आगे बढ़े।

पत्रकार विजयराम आजाद ने कहा कि संत गाडगे बाबा ने अपने लिए कुछ भी संग्रह नहीं किया; भिक्षा में मिले धन से उन्होंने विद्यालय, छात्रावास, धर्मशालाएँ, गौशालाएँ और वृद्धाश्रम स्थापित कराए। बाबा साहब अंबेडकर के महापरिनिर्वाण का समाचार मिलने पर उन्होंने दवाइयाँ तक लेना छोड़ दिया और 14 दिनों बाद, 20 दिसंबर 1956 को उनका देहावसान हो गया, यह प्रसंग उनके संवेदनशील और सिद्धांतनिष्ठ जीवन को दर्शाता है। मुख्य अतिथि बाबूजी हलकरन चंचल ने कहा कि बाबा का जीवन संघर्ष से उपजा सुधार का उदाहरण है, जबकि क्षमाधर प्रसाद अध्यापक ने गीतों के माध्यम से उन्हें “राष्ट्रीय संत” बताया। बाबा साहब अंबेडकर द्वारा निकले गए समाचार मूकनायक को लेकर सभी के चेहरे खिल उठे, और सभी ने पेपर साप्ताहिक य मासिक उपलब्ध करवाने पर जोर दिया, मूकनायक समाचार पत्र आज भी उनकी विचारधारा को लेकर संचालित है। अंत में अध्यक्ष सुरेश कुमार अध्यापक ने कहा कि संत गाडगे बाबा का संदेश आज भी प्रासंगिक है, ईश्वर मंदिरों में नहीं, बल्कि पीड़ित मानव की सेवा में है।

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