मूकनायक/राष्ट्रीय प्रभारी ओमप्रकाश वर्मा
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मैदान में हारा हुआ व्यक्ति फिर से जीत सकता है, लेकिन मन से हारा हुआ इंसान कभी नहीं जीत सकता है। इसका अर्थ है कि हार सिर्फ शारीरिक या बाहरी परिस्थितियों से नहीं, बल्कि मन की हार से भी होती है। मन से हार मानने का मतलब है कि आपने बिना कोशिश किए ही खुद को हार के लिए तैयार कर लिया है तो आपके अंदर जीतने का जज़्बा खत्म हो जाता है और आप मानसिक रूप से ही पराजित हो जाते हैं। इसके साथ ही मन से हार जाने से आगे बढ़ने की प्रेरणा और इच्छा भी खत्म हो जाती है।
मन की हार एक मानसिक स्थिति है, जिसमें व्यक्ति अपनी क्षमताओं पर विश्वास खो देता है और प्रयास करना छोड़ देता है। यह हार व्यक्ति को अंदर से कमज़ोर कर देती है और उसे कोई भी नया प्रयास करने से रोकती है। मन से हारने वाला व्यक्ति इसलिए नहीं जीत पाता क्योंकि वह खुद पर विश्वास खो देता है कि वह फिर से सफल हो सकता है। उसके मन में नकारात्मक विचार घर कर जाते हैं, जिससे वह हर काम में केवल हार देखता है। वह दोबारा कोशिश करने से डरता है क्योंकि उसे पहले ही यकीन हो चुका होता है कि वह हार जाएगा। इसीलिए कहा जाता है, “मन के हारे हार है, मन के जीते जीत”। अगर मन में जीतने का जज्बा है, तो कोई भी हार आपको रोक नहीं सकती।
बिरदी चंद गोठवाल, नारनौल
प्रदेश प्रभारी मूकनायक, हरियाणा

