मूकनायक/देश
राष्ट्रीय प्रभारी ओमप्रकाश वर्मा
✍🏻✍🏻
संत गुरु रविदास मध्यकाल में एक भारतीय संत, कवि, सदगुरु थे, इन्हें संत शिरोमणि की उपाधि दी गई थी, उन्होंने रविदासिया पंथ की स्थापना की थी। इनका का जन्म 1377 ई. में वाराणसी, उत्तर प्रदेश में हुआ था। पंचांग के अनुसार उनका जन्म माघ मास की पूर्णिमा तिथि को हुआ था. इसके अलावा उनके जन्म के संबंध में एक दोहा भी प्रचलित है, जो इस प्रकार है- चौदस सो तांसिस की माघ सुदी पन्द्रस। दुखियों के कल्याण हित प्रगटे श्री गुरु रविदास। यह त्योहार सामाजिक समानता और भक्ति के प्रति उनके महत्वपूर्ण योगदान को दर्शाता है। गुरु रविदास जी ने जाति-पाति के भेदभाव को खत्म करने के लिए काफी काम किया। इसलिए उनके सम्मान में हर साल उनके जन्मदिन को गुरु रविदास जयंती के रूप में मनाया जाता है।
संत रविदास की कविताओं में कबीर और मीराबाई जैसी उल्लेखनीय हस्तियाँ शामिल हैं। उनके प्रभावशाली लेखन को सिख धर्म के पवित्र ग्रंथ गुरु ग्रंथ साहिब में शामिल किया गया है। उनका लेखन भारतीय धार्मिक जीवन पर उनके महत्वपूर्ण प्रभाव को दर्शाता है। संत रविदास ने सिखाया था कि लोगों का अंतिम लक्ष्य धार्मिकता, करुणा और हृदय की पवित्रता के माध्यम से ईश्वर के साथ एक मजबूत संबंध प्राप्त करना है। उन्होंने एक ऐसी दुनिया की कल्पना की जहाँ सभी का सम्मान किया जाता है और सभी को समान रूप से महत्व दिया जाता है। हालांकि, वे कर्म को ही अपना गुरु मानते थे और उसी की भक्ति करते थे । संत रविदास ने अनेक दोहों के माध्यम से भी संसार को प्रेरणा का संदेश दिया। जैसे:
रविदास’ जन्म के कारनै, होत न कोउ नीच, नर कूँ नीच करि डारि है, ओछे करम की कीच । इसका अर्थ है कि केवल जन्म लेने मात्र से कोई नीच नही बन जाता है बल्कि इंसान के कर्म ही उसे नीच बनाते हैं।
करम बंधन में बन्ध रहियो, फल की ना तज्जियो आस. इसका अर्थ है कि हमें हमेशा अपने कर्म में लगे रहना चाहिए और कभी भी कर्म के बदले मिलने वाले फल की आशा भी नही छोडनी चाहिए ।
संत रविदास ने अपने दोहों में कर्म, प्रेम, भक्ति और मानवता के अनेक संदेश भी दिए।
बिरदीचंद गोठवाल, नारनौल
प्रदेश प्रभारी मूकनायक, हरियाणा

