मूकनायक/राष्ट्रीय प्रभारी ओमप्रकाश वर्मा
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असहमति और मतभेद मानवीय स्वभाव के स्वाभाविक हिस्से हैं। जब इन मतभेदों को सम्मान और संवेदनशीलता के साथ स्वीकार किया जाता है तो ये समाज को तोड़ते नहीं, बल्कि उसे अधिक मजबूत, परिपक्व और समृद्ध बनाते हैं। एकतरफा सोच अक्सर कट्टरता को जन्म देती है, जबकि सम्मानपूर्ण बहस हमें दूसरों के नजरिए से दुनिया को देखना सिखाती है। यह परिपक्वता समाज को अंधभक्ति और उग्रता से बचाकर एक स्वस्थ लोकतंत्र की ओर ले जाती है। जब दो विपरीत या भिन्न विचार आपस में टकराते हैं तो एक तीसरे और बेहतर विचार का जन्म होता है। सम्मानपूर्ण मतभेद ही विज्ञान, कला, साहित्य और राजनीति में नए आयामों को खोलते हैं, जिससे समाज बौद्धिक और सांस्कृतिक रूप से समृद्ध होता है।
जब समाज का हर वर्ग — चाहे उसके विचार, धर्म या मान्यताएँ कुछ भी हों — यह महसूस करता है कि उसकी बातों को सम्मान से सुना जा रहा है, तो उसका व्यवस्था पर भरोसा बढ़ता है। यह भरोसा ही आपसी रिश्तों को मजबूत करता है और किसी भी बड़े संकट के समय समाज को बिखरने से बचाता है। मतभेद होना कोई समस्या नहीं है, समस्या मतभेद को ‘मनभेद’ या दुश्मनी में बदल देना है। एक सभ्य समाज की खूबसूरती इस बात में है कि हम “असहमत होने के अधिकार का सम्मान” करना सीखें। जब हम गरिमा और मर्यादा के दायरे में रहकर अपनी बात रखते हैं और दूसरों को सुनते हैं तो समाज विभाजन की ओर नहीं, बल्कि एक ऐसे गुलदस्ते की तरह विकसित होता है, जहाँ हर रंग के फूल की अपनी महत्ता होती है।
बिरदी चंद गोठवाल
प्रदेश प्रभारी मूकनायक, हरियाणा

