मूकनायक/ दिल्ली प्रदेश प्रभारी,जे सी सिंघल
नई दिल्ली
अपने हकों अधिकारों के लिए आम जनता अब जागरूक हो रहीं हैं। सरकार ने सोचा होगा कि सोनम वांगचुक को जंतर मंतर से हटा देंगे तो प्रदर्शनकारी भी चले जायेंगें!लेकिन ऐसा नहीं हुआ।पिछले एक महिने से यहां पर 20 बेरोजगार युवक और युवतियां भी अनशन पर बैठे हुए हैं।इनकी मांग है कि नीट के पेपर लीक मामले में शिक्षा मंत्री का त्यागपत्र होना चाहिए! उनके समर्थन में भारी संख्या में उनके समर्थक जंतर-मंतर पर पहुंच गए।दिल्ली बॉर्डर पर प्रदर्शन में शामिल होने वाले लोगों को काफी समय तक रोका गया।संसद मार्ग के आसपास की सभी सड़के प्रदर्शनकारियों से भर गए। संसद भवन के आसपास वाले मैट्रो स्टेशन के बाहर निकलने वाले सभी गेट बँध करा दिए गए। अगले दिन गोदी मीडिया के प्रमुख अखबारों ने इसे पिछले 14 सालों का सबसे बड़ा प्रदर्शन तो बताया लेकिन सारी हकीकत नहीं छापी गई। जबकि बीबीसी,अलजजीरा , वाशिंग्टन पोस्ट,न्यूयार्क टाइम्स जैसे प्रमुख अंतर्राष्ट्रीय मीडिया द्वारा विश्व भर में इस प्रदर्शन की कवरेज दी गई है और बताया है कि मिलियन आफ़ पीपल,जो अपने आप को कॉकरोच कह रहे हैं,उन की “कॉकरोच जनता पार्टी” बन गई है जिसके सदस्यों की संख्या बीजेपी के सदस्यों से भी ज्यादा हो गयी है। अगर सोशल मीडिया ना होता तो सच्चाई सामने नहीं आती। प्रदर्शनकारियों को जबरदस्ती से हटाने के लिए बिना नेमप्लेट वाले संदिग्ध पुलिस कर्मियों ने बेरहमी से मासूम लडकियों पर लाठीचार्ज किया,आसूं गैस के गोले छोड़कर जख्मी किया जिससे अनेकों युवक और युवतियां बेहोश होकर गिर गए। प्रदर्शनकारियों को बदनाम करने के लिए,पुलिस ने पत्थरों से भरा एक ट्रक जन्तर-मन्तर के नजदीक खङा किया हुआ था जिसमें से पत्थर निकल कर,पुलिसकर्मी खुद ही शांतिपूर्ण प्रदर्शन करने वालों पर पत्थर फेंकते हुए, कैमरो में कैद हुए हैं। ज़ुल्म जब भी हद से आगे बढ़ने लगता है,वहीं से बदलाव का सूरज निकलने लगता है।जंतर-मंतर पर मासूम बच्चों और बच्चियों के साथ जिस प्रकार का बर्बरतापूर्ण व्यवहार किया गया,उसने मन को गहराई तक झकझोर दिया।हमनें जलियांवाला बाग का वह दौर नहीं देखा,लेकिन आज जो दृश्य सामने आए,उन्होंने इतिहास के उस काले अध्याय की याद अवश्य दिला दी।क्रूरता की हदे पार करती जातंकवादी और आतंकवादी पुलिस ने ही इस छात्र आंदोलन को कुचलने के लिये नकली पुलिस बनाकर गुंडे खड़े किये,उनसे ही ये सब तोड़फोड़,पत्थरबाजी,लाठियां,भगदड़,शोर शराबा आदि करवा कर सब आरोप इस शांतिपूर्वक आंदोलन एवं प्रोटेस्ट को बदनाम किया गया। युवाओं के सर,हाथ पैर,कमर,आंखे फोड़ दी गई।जातंकवादी, आतंकवादी,अहंकारी, दमनकारी,षड्यंत्रकारी, गुंडावादी,बेहरमी सरकार एवं प्रशासन ने 20 जुलाई के छात्र प्रोटेस्ट व संसद मार्च को इस देश की शिक्षित युवाशक्ति को हद से ज्यादा कुचला। तानाशाही अपनी ताक़त बंदूक़ों और सत्ता के प्रदर्शन से दिखा सकती है, लेकिन लोकतंत्र की असली ताक़त जागरूक,साहसी और संवेदनशील युवाओं से बनती है।सरकार के पास सत्ता,पुलिस और संसाधन हो सकते हैं, लेकिन युवाओं के पास जोश,हौसला और संविधान पर अटूट विश्वास होता है।जंतर-मंतर की आवाज़ केवल एक धरने की आवाज़ नहीं है,बल्कि अपने अधिकारों, लोकतांत्रिक मूल्यों और जनभागीदारी की आवाज़ है।जब युवा जागते हैं, तब बदलाव की नींव रखी जाती है। संविधान के दायरे में रहकर उठाई गई हर शांतिपूर्ण और लोकतांत्रिक आवाज़, देश के लोकतंत्र को और अधिक मज़बूत बनाती है।लोकतंत्र में अपनी बात शांतिपूर्ण ढंग से रखना हर नागरिक का संवैधानिक अधिकार है।यदि उस अधिकार का उत्तर बल प्रयोग से दिया जाए,तो यह केवल कुछ लोगों पर नहीं,बल्कि लोकतांत्रिक मूल्यों पर भी आघात है।इसी पीड़ा और लोकतांत्रिक मूल्यों की रक्षा के संकल्प के साथ,नगीना के सांसद,चन्द्रशेखर आजाद,संसद भवन परिसर में परम पूज्य बाबा साहेब की प्रतिमा के नीचे धरने पर बैठ गए हैं। जब तक न्याय सुनिश्चित नहीं होता और इस घटना के लिए जिम्मेदार लोगों के विरुद्ध उचित कार्रवाई नहीं होती,उनका यह शांतिपूर्ण लोकतांत्रिक संघर्ष जारी रहेगा।

