मूकनायक/राष्ट्रीय प्रभारी ओमप्रकाश वर्मा
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‘जबान’ (वाणी) प्रकृति द्वारा मनुष्य को दिया गया एक अद्भुत और शक्तिशाली उपहार है। यह शरीर का एक ऐसा छोटा सा अंग है, जिसमें कोई हड्डी नहीं होती, लेकिन यह रिश्ते बना भी सकती है और उन्हें पल भर में तोड़ भी सकती है। इसीलिए कहा जाता है कि जबान ही एकमात्र ऐसी जगह है जहाँ ‘ज़हर’ और ‘अमृत’ एक साथ निवास करते हैं। यह पूरी तरह से मनुष्य के विवेक पर निर्भर करता है कि वह किसका प्रयोग करता है। जबान का ‘अमृत’ रूप
जब जबान से मधुर, सत्य और प्रेरणादायक शब्द निकलते हैं, तो वह अमृत का काम करती है। कड़वे या निराशाजनक दौर से गुज़र रहे व्यक्ति के लिए दो मीठे और ढांढस बंधाते शब्द ही मलहम का काम करते हैं।
मधुर वाणी शत्रु को भी मित्र बना देती है। संत कबीरदास जी ने भी कहा है कि “ऐसी बाणी बोलिए, मन का आपा खोय । औरन को सीतल करे, आपहुँ सीतल होय॥” इसके विपरीत, जब जबान से अहंकार, कटुता, चुगली और अपमानजनक शब्द निकलते हैं, तो यह ज़हर बन जाती है। तलवार का घाव समय के साथ भर जाता है, लेकिन जबान से निकला कड़वा शब्द जीवनभर दिल में चुभता रहता है। इतिहास गवाह है कि कई बड़े युद्ध और पारिवारिक कलह केवल नियंत्रण से बाहर हुई वाणी के कारण ही हुए हैं । हम अपनी जबान से ज़हर घोलकर किसी का जीवन बर्बाद कर सकते हैं, या अमृत बरसाकर किसी के जीवन में आशा की किरण जगा सकते हैं। इसलिए, बोलने से पहले सोचना और अपनी वाणी पर संयम रखना अत्यंत आवश्यक है।
बिरदी चंद गोठवाल
प्रदेश प्रभारी मूकनायक, हरियाणा

