मूकनायक/राष्ट्रीय प्रभारी ओमप्रकाश वर्मा
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जीवन की यात्रा में जब कभी नीरसता, थकान या दिशाहीनता महसूस होती है, तब ‘कला’ एक मार्गदर्शक और संजीवनी बनकर सामने आती है। कला केवल कुछ चुनिंदा लोगों के लिए कैनवास पर रंग बिखेरना या सुर साधना नहीं है, बल्कि यह जीने का एक ढंग है। जीवन के किसी भी पड़ाव पर, चाहे वह चंचल बचपन हो, संघर्षशील युवावस्था हो या ठहराव से भरा बुढ़ापा—कला मनुष्य को ऊर्जा, उद्देश्य और असीम आनंद से सराबोर कर देती है। उम्र बढ़ने के साथ अक्सर शारीरिक और मानसिक ऊर्जा में उतार-चढ़ाव आता है। कला इस ऊर्जा को पुनर्जीवित करने का एक बेहतरीन माध्यम है।जब कोई व्यक्ति किसी भी रूप में कला (जैसे- चित्रकारी, लेखन, संगीत, या बागवानी) से जुड़ता है, तो उसका मस्तिष्क तनाव से मुक्त होकर एक सकारात्मक दिशा में काम करने लगता है। अक्सर सेवानिवृत्ति के बाद या जीवन के खालीपन के क्षणों में लोग खुद को अकेला और उद्देश्यहीन महसूस करने लगते हैं। ऐसे समय में कला एक नया लक्ष्य देती है।
जब एक कुम्हार मिट्टी को सुंदर आकार देता है या एक लेखक अपने विचारों को शब्दों में पिरोता है, तो उस समय जो ‘सृजन का सुख’ मिलता है, उसकी तुलना दुनिया के किसी भी भौतिक सुख से नहीं की जा सकती। यह आनंद बाहरी परिस्थितियों पर निर्भर नहीं करता, बल्कि यह भीतर से फूटने वाला एक ऐसा सोता है जो आत्मा को तृप्त कर देता है। कला हमारे भीतर के उस बच्चे को जीवित रखती है, जो हर छोटी चीज में विस्मय और खुशी ढूंढ लेता है। यह उम्र की सीमाओं को तोड़कर हमें हमेशा युवा और जीवंत बनाए रखती है। इसलिए, जीवन के किसी भी मोड़ पर हों, कला से नाता जोड़ना खुद को जीने का एक और हसीन मौका देना है। कला के बिना जीवन महज सांस लेने की प्रक्रिया है और कला के साथ यही जीवन एक उत्सव बन जाता है।
बिरदी चंद गोठवाल
प्रदेश प्रभारी मूकनायक, हरियाणा

