अक्सर यह माना जाता है कि अपराधी पैदाइशी होते हैं या फिर वे किसी गहरी सोची-समझी साजिश के तहत अपराध की दुनिया में कदम रखते हैं। लेकिन अपराध के जमीनी मनोविज्ञान (Psychology of Crime) का अध्ययन कुछ अलग ही कहानी बयां करता है। वास्तविकता यह है कि कोई भी इंसान जन्म से अपराधी नहीं होता। उसकी यह यात्रा सामाजिक परिस्थितियों, मानसिक भटकाव और हमारे समाज के ताने-बाने से तय होती है।
- सामाजिक स्वीकृति (Social Validation) की भूखइंसान स्वभाव से सामाजिक प्राणी है। उसे हर मोड़ पर अपनों से, दोस्तों से और समाज से ‘स्वीकृति’ यानी सराहना की जरूरत होती है। जब किसी व्यक्ति को अच्छे कार्यों के लिए समाज, परिवार या दोस्तों से सराहना और सम्मान मिलता है, तो उसका झुकाव स्वाभाविक रूप से सकारात्मकता की ओर बढ़ता है।इसके विपरीत, जब किसी व्यक्ति को सही राह पर चलने के बाद भी केवल उपेक्षा, तिरस्कार या नकारात्मकता मिलती है, तो उसका मानसिक संतुलन डगमगाने लगता है। ऐसी स्थिति में, यदि उसे किसी गलत रास्ते या आपराधिक गिरोह में थोड़ी भी सराहना या ‘अपनत्व’ की झलक मिलती है, तो वह अनजाने में ही सही, उस दलदल की तरफ खिंचा चला जाता है।
- रणनीतिक भोलापन (Strategic Naivety) और लालच का जालआज के डिजिटल और आधुनिक युग में अपराधियों का नेटवर्क बहुत चालाकी से काम करता है। वे आम और भोले-भाले युवाओं को फंसाने के लिए ‘हनीपॉट’ (Honeypot) जैसी तकनीकों का इस्तेमाल करते हैं। इसके तहत युवाओं को तुरंत और आसान तरीके से पैसा कमाने, नाम कमाने या बड़ी सफलता पाने के झूठे सपने दिखाए जाते हैं।चूंकि हमारे समाज में आज सफलता का पैमाना केवल पैसा बन चुका है, इसलिए युवा इस ‘रणनीतिक भोलेपन’ का शिकार हो जाते हैं। वे बिना किसी आपराधिक इरादे (Criminal Intent) के शुरुआत करते हैं, लेकिन धीरे-धीरे लालच और तात्कालिक लाभ के चक्कर में वे उस रास्ते पर इतने आगे निकल जाते हैं जहाँ से लौटना मुश्किल हो जाता है।
- ‘कम्युनिकेशन फिल्टर्स’ का टूटनाजैसे-जैसे कोई व्यक्ति इस भटकाव के रास्ते पर आगे बढ़ता है, समाज और उसके बीच के संवाद के माध्यम यानी ‘कम्युनिकेशन फिल्टर्स’ टूटने लगते हैं। वह केवल उन्हीं लोगों की बातें सुनने और मानने लगता है जो उसके इस गलत रास्ते का समर्थन करते हैं। जब समाज की मुख्यधारा से उसका संपर्क पूरी तरह कट जाता है, तब वह व्यक्ति पूरी तरह से अपराध की दुनिया में समा जाता है।
Moral (नैतिक सीख)अपराध को केवल कानून व्यवस्था से नहीं देख सकते। सामाजिक और मानसिक व्यवस्था को सुधारना जरूरी है। तभी अपराध मुक्त समाज की कल्पना संभव है। युवाओं को सही मार्गदर्शन देना हमारी जिम्मेदारी है
लेखक:दुष्यंत सुरेश सांखरेसंवाददाता (रायपुर, छत्तीसगढ़)मूकनायक मीडिया

