मूकनायक/राष्ट्रीय प्रभारी ओमप्रकाश वर्मा
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जीवन में प्रशंसा सुनना हर किसी को प्रिय होता है, लेकिन अपनी आलोचना या निंदा सुनना सबसे कठिन कार्यों में से एक है। जब कोई हमारी कमियों को उजागर करता है, तो अमूमन मनुष्य का अहंकार जाग उठता है और वह क्रोध या प्रतिशोध की भावना से भर जाता है। ऐसी स्थिति में अपनी निंदा को धैर्यपूर्वक सुनना और सुनकर शांत बने रहना एक महान मानवीय गुण है। यह आत्म-नियंत्रण केवल वही व्यक्ति दिखा सकता है जिसके भीतर गहरे धैर्य और सच्ची नम्रता का वास हो। मानसिक संतुलन का आधारनिंदा सुनते समय तत्काल प्रतिक्रिया ना देना धैर्य की पहली निशानी है क्योंकि धैर्य हमें भीतर से मजबूत बनाता है ताकि हम सामने वाले के कड़वे शब्दों से विचलित ना हों। बिना सोचे समझे बहस करने से केवल मानसिक ऊर्जा नष्ट होती है, जबकि धैर्य उस ऊर्जा को सुरक्षित रखता है।
कबीरदास जी का दृष्टिकोणसंत कबीरदास जी ने इस संदर्भ में एक बहुत ही सटीक और प्रसिद्ध दोहा लिखा है कि “निंदक नियरे राखिये, आँगन कुटी छवाय। बिना पानी, साबुन बिना, निर्मल करे सुभाय॥ “कबीर जी के अनुसार, निंदा करने वाले व्यक्ति को हमेशा अपने पास रखना चाहिए। वे बिना साबुन और पानी के, केवल हमारी कमियों को बताकर हमारे स्वभाव को साफ और पवित्र बना देते हैं। यदि हम शांत रहकर उनकी बात सुनेंगे, तभी हम अपनी कमियों को दूर कर पाएंगे । अपनी निंदा सुनकर शांत रहना कायरता नहीं, बल्कि आंतरिक शक्ति का प्रतीक है। यह दर्शाता है कि आपका रिमोट कंट्रोल आपके खुद के हाथ में है, किसी और के हाथ में नहीं। धैर्य और नम्रता के बल पर हम न केवल समाज में शांति बनाए रख सकते हैं, बल्कि आत्म-सुधार के मार्ग पर चलते हुए सफलता के नए शिखरों को छू सकते हैं।
बिरदी चंद गोठवाल, नारनौल
प्रदेश प्रभारी मूकनायक, हरियाणा

