मूकनायक/राष्ट्रीय प्रभारी ओमप्रकाश वर्मा
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महात्मा बुद्ध के अनुसार, धर्म कोई बाहरी आडंबर या कर्मकांड नहीं है, बल्कि यह स्व-अनुशासन है। जब व्यक्ति स्वयं सत्य, अहिंसा और प्रेम के मार्ग पर चलता है, तो वह वास्तव में धर्म का पालन कर रहा होता है।अक्सर लोग अपने ‘सत्य’ को श्रेष्ठ मान लेते हैं और उसे दूसरों पर थोपने की कोशिश करते हैं। यहीं से संघर्ष का जन्म होता है। किसी को बलपूर्वक अपने विचारों को मानने पर मजबूर करना उसकी मानसिक स्वतंत्रता का हनन है। सत्य जब दबाव में स्वीकार किया जाता है, तो वह सत्य नहीं रह जाता, बल्कि पाखंड बन जाता है।
आज के युग में जहाँ वैचारिक मतभेद अक्सर संघर्षों और युद्धों का कारण बनते हैं, बुद्ध का यह सूत्र एक शांति-मंत्र की तरह है। चाहे वह राजनीति हो, धर्म हो या पारिवारिक जीवन, जब हम दूसरों की पसंद और उनके सत्य के प्रति सम्मान खो देते हैं, तो हम धार्मिक होने का अधिकार भी खो देते हैं । इसलिए वास्तविक धर्म वही है, जो मनुष्य को भीतर से मुक्त करे। यदि सत्य के नाम पर किसी को जंजीरों में जकड़ा जाए या भय दिखाया जाए, तो वह धर्म नहीं, अधर्म है। ‘धर्म’ एक व्यक्तिगत साधना है, जबकि ‘अहिंसा’ दूसरे के अस्तित्व का सम्मान है। जिस दिन मनुष्य स्वयं सुधरने पर ध्यान देगा और दूसरों को स्वीकार करना सीख जाएगा, उस दिन यह संसार वास्तव में बुद्ध के सपनों का संसार बन जाएगा।
बिरदी चंद गोठवाल
प्रदेश प्रभारी मूकनायक, हरियाणा

