Thursday, June 11, 2026
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सब कुछ पाकर खुश होना महज एक प्रतिक्रिया है, लेकिन सब कुछ खोकर या संकट में भी खुश रहना ही है एक कला और साधना

मूकनायक/राष्ट्रीय प्रभारी ओमप्रकाश वर्मा
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जीवन में जब सब कुछ अनुकूल हो—मनचाही सफलता हो, धन-दौलत हो और अपनों का साथ हो—तब खुश होना बेहद स्वाभाविक है। इसे हम एक प्रतिक्रिया कह सकते हैं, जो बाहरी परिस्थितियों पर निर्भर करती है। लेकिन जब परिस्थितियाँ विपरीत हों, सब कुछ बिखर रहा हो, या कोई बड़ा संकट सामने खड़ा हो, तब भी मन के भीतर की शांति और मुस्कान को बनाए रखना महज़ एक प्रतिक्रिया नहीं, बल्कि एक उच्च स्तरीय कला और साधना है। अनुकूल परिस्थिति मिली तो हम खुश हो गए, प्रतिकूल परिस्थिति आई तो हम दुखी हो गए। यह केवल एक ‘रिएक्शन’ है । संकट के समय खुश रहने की कला हमें यह सिखाती है कि हम परिस्थिति को नहीं, बल्कि उसके प्रति अपने नजरिए को बदलें और जो खो गया है, उस पर शोक मनाने के बजाय, जो बचा है, उसके साथ जीवन को नए सिरे से कैसे संवारा जाए ?
संकट में शांत और प्रसन्न रहना किसी कठिन तपस्या से कम नहीं है। इसके लिए गहरे आत्म-नियंत्रण और मानसिक शक्ति की आवश्यकता होती है । संसार में सब कुछ परिवर्तनशील है—ना आज का सुख स्थायी है और ना ही कल का दुख स्थाई है । प्रसन्नता कोई पहले से तैयार वस्तु नहीं है। यह आपके अपने कर्मों और विचारों से आती है। सब कुछ खोकर भी खुश रहने का मतलब यह कतई नहीं है कि हम अपनी समस्याओं के प्रति लापरवाह हो जाएं या दुःख का ढोंग करें। इसका सीधा अर्थ है कि हम संकटों को अपने आत्मबल पर हावी नहीं होने देते। परिस्थितियों के अनुकूल होने पर खुश होना ‘जीने की मजबूरी’ हो सकता है, लेकिन प्रतिकूलताओं को मुस्कुराकर मात देना ही ‘जीने की असली कला’ है। जो इस कला को सीख लेता है, उसका जीवन स्वयं एक पवित्र साधना बन जाता है।
बिरदी चंद गोठवाल
प्रदेश प्रभारी मूकनायक, हरियाणा

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