Thursday, June 11, 2026
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संकीर्ण और स्वार्थी सोच अपनाकर पिंजरे में बंद मुर्गों जैसी जिंदगी जीना नहीं है किसी सभ्य समाज व परिवार की पहचान

मूकनायक/राष्ट्रीय प्रभारी ओमप्रकाश वर्मा
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पिंजरे में बंद मुर्गों जैसी जिंदगी जीना किसी सभ्य समाज व परिवार की पहचान नहीं है। दाना चुगने की कशमकश से ऊपर उठकर हमें दूसरों के चीखने की आवाज को सुनना होगा। यदि हम आज दूसरों के हक और न्याय के लिए नहीं चिल्लाएंगे, तो कल हमारी बारी आने पर पूरा समाज मौन रहेगा। समय रहते जागना और एकजुट होना ही इस स्वार्थी पिंजरे से मुक्ति का एकमात्र रास्ता है। जब समाज के किसी एक हिस्से, वर्ग या व्यक्ति पर अन्याय होता है, तो बाकी समाज मूकदर्शक बना रहता है। लोग सोचते हैं कि “यह मेरी समस्या नहीं है, मैं क्यों बीच में पडूँ?”, परंतु लोग यह भूल जाते हैं कि जिस व्यवस्था या अपराध ने आज उनके पड़ोसी को अपना शिकार बनाया है, कल वह उनके दरवाजे पर भी दस्तक दे सकता है। आज का ‘दाना’ (भौतिक सुख-सुविधाएं) कल की ‘कटने की बारी’ को टाल नहीं सकता। जब गलत काम करने वालों को पता होता है कि कोई उनका मिलकर विरोध नहीं करेगा, तो उनका साहस दोगुना हो जाता है।
हम दूसरों के दर्द को सिर्फ एक ‘न्यूज’ या सोशल मीडिया ‘ट्रेंड’ की तरह देखते हैं, उसे महसूस नहीं करते। “जब तक हम केवल अपने ‘दाने’ की चिंता करेंगे, तब तक ‘पिंजरे’ का मालिक हमारी नियति तय करता रहेगा।” इसलिए इस संकीर्ण सोच से बाहर निकलन कर हमें यह समझना होगा कि समाज एक शरीर की तरह है, यदि पैर में काँटा चुभेगा, तो दर्द और लंगड़ाहट पूरे शरीर को झेलनी पड़ेगी। हमें पिंजरे के मुर्गों की तरह केवल अपनी बारी का इंतजार नहीं करना है, बल्कि एक सजग और जागरूक नागरिक बनकर हर अन्याय के खिलाफ आवाज उठानी होगी। जब हम दूसरों के हक के लिए खड़े होना शुरू करेंगे, तभी हम इस अदृश्य पिंजरे को तोड़कर एक सुरक्षित और संवेदनशील समाज का निर्माण कर पाएंगे।
बिरदी चंद गोठवाल, नारनौल
प्रदेश प्रभारी मूकनायक, हरियाणा

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