मूकनायक/राष्ट्रीय प्रभारी ओमप्रकाश वर्मा
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महान संत रविदास जी ने कहा था कि “मन चंगा तो कठौती में गंगा” यानी इंसान की असली पहचान उसके बाहरी रंग-रूप या दिखावे से नहीं, बल्कि उसके आंतरिक विचारों और नीयत से होती है, लेकिन आज के समाज में एक कड़वी सच्चाई यह भी है कि लोग अपने भीतर द्वेष, ईर्ष्या और कपट (मैल) छुपाकर बाहर से बेहद सीधे और परोपकारी बनने का नाटक करते हैं। ऐसा ढोंग ठीक वैसा ही है जैसे किसी ‘कीचड़ के ढे़र पर रंग लगा देना’। ऊपर से तो वह चमकदार दिख सकता है, लेकिन उसकी असलियत बदबूदार और गंदी ही रहती है। जैसे ही बारिश की एक बूंद या पानी का झोंका उस पर पड़ता है, रंग बह जाता है और नीचे छिपा कीचड़ बाहर आ जाता है। ठीक इसी प्रकार, जो व्यक्ति दिल में खोट रखकर मीठी बातें करता है, उसका असली चेहरा भी ज्यादा दिनों तक छिपा नहीं रहता। संकट के समय या किसी स्वार्थ के टकराने पर उसकी असलियत सबके सामने आ ही जाती है।
बाहरी अच्छाई का मुखौटा केवल एक भ्रम है, जो कुछ समय के लिए लोगों की आँखों में धूल झोंक सकता है, लेकिन किसी का दिल नहीं जीत सकता। ढोंग करने वाले व्यक्ति पर समाज कभी लंबा भरोसा नहीं कर पाता। जब उसका झूठ पकड़ में आता है, तो वह समाज में अपनी रही-सही इज्जत भी खो देता है और खुद का मानसिक सुकून भी खत्म कर देता है । इसलिए बनावटी अच्छाई से कहीं बेहतर है कि हम अपनी कमियों को स्वीकार करें और उन्हें सुधारने का प्रयास करें। कीचड़ पर रंग लगाने के बजाय, प्रयास उस कीचड़ को साफ करने का होना चाहिए। सच्ची इंसानियत और बड़प्पन बाहरी दिखावे में नहीं, बल्कि मन की निर्मलता और विचारों की शुद्धता में है। इसलिए, हमें मुखौटे उतारकर भीतर से सुंदर बनने का प्रयास करना चाहिए।
बिरदी चंद गोठवाल, नारनौल
प्रदेश प्रभारी मूकनायक, हरियाणा

