मूकनायक/राष्ट्रीय प्रभारी ओमप्रकाश वर्मा
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कहते हैं कि एक मजबूत रिश्ता विश्वास की नींव पर टिका होता है, लेकिन इस नींव को सबसे ज्यादा खतरा किसी बाहरी दुश्मन से नहीं, बल्कि एक सूक्ष्म ‘दीमक’ से होता है जिसे हम गलतफहमी कहते हैं। जिस तरह दीमक लकड़ी को बाहर से साबुत छोड़ देती है परंतु अंदर से उसे मिट्टी बना देती है, ठीक वैसे ही गलतफहमी रिश्तों की मिठास और मजबूती को धीरे-धीरे खत्म कर देती है। अक्सर हम मान लेते हैं कि सामने वाला हमारे मन की बात बिना कहे ही समझ जाएगा। जब ऐसा नहीं होता, तो निराशा गलतफहमी का रूप ले लेती है। अक्सर कई बार सुनी-सुनाई’ बातों पर भी यकीन करना इस दीमक के लिए खाद-पानी का काम करता है।
जब गलतफहमी किसी रिश्ते में घर कर जाती है, तो उसके परिणाम अत्यंत दुखद होते हैं और लोग एक ही छत के नीचे रहते हुए भी मीलों दूर हो जाते हैं। बातचीत बंद हो जाती है । ऐसी स्थिति में रिश्ता ऊपर से तो बना रहता है, लेकिन उसमें वह गर्मजोशी और सुकून खत्म हो जाता है, जो कभी उसकी जान हुआ करता था। इसके साथ ही छोटी बातों को नजरअंदाज करना और अपनी गलती होने पर ‘सॉरी’ कहना इस दीमक के लिए सबसे बड़ा कीटनाशक है। रिश्ते कांच की तरह नाजुक नहीं, बल्कि लकड़ी की तरह ठोस होने चाहिए। लेकिन याद रखिए, लकड़ी कितनी भी मजबूत क्यों ना हो, वह दीमक का मुकाबला नहीं कर सकती। गलतफहमी को संवाद की धूप दिखाएं, क्योंकि जहां स्पष्टता और सच्चाई की रोशनी होती है, वहां भ्रम की दीमक कभी नहीं टिक सकती।
बिरदी चंद गोठवाल
प्रदेश प्रभारी मूकनायक, हरियाणा

