मूकनायक/ डॉ. नीरज कुमार
शिमला/ हिमाचल प्रदेश
ग्राम पंचायत को लोकतंत्र की सबसे बुनियादी इकाई माना जाता है, जहाँ आम आदमी सीधे सत्ता में भागीदारी करता है। लेकिन सिरमौर के टटियाना जैसे उदाहरण इस बुनियादी ढांचे पर गहरा सवाल खड़ा करते हैं। यहाँ “निर्विरोध चुनाव” के नाम पर जो खेल चल रहा है, वह न सिर्फ लोकतंत्र का मज़ाक है बल्कि 73वें संविधान संशोधन की आत्मा की सीधी हत्या है।
निर्विरोध या ‘रेट-लिस्ट’ चुनाव?
टटियाना में प्रधान बनने के लिए 4 लाख, उप-प्रधान के लिए 2 लाख, बीडीसी मेंबर के लिए 1 लाख और वार्ड मेंबर के लिए 50 हजार की “फीस” तय कर दी गई है। सवाल यह है—
क्या यह चुनाव है या बोली लगाकर कुर्सी खरीदने की प्रक्रिया?
स्पष्ट संदेश है:
“तेरी 4 लाख देने की औकात है तो पर्ची डाल, नहीं तो चुप बैठ।”
यह व्यवस्था गरीब, ईमानदार और योग्य लोगों को सीधे बाहर का रास्ता दिखाती है और सत्ता को केवल सेठों—भूपतियों, जमीदारों, जागीरदारों और मालदारों—के लिए सुरक्षित कर देती है। यही तो कुलीनतंत्र (Oligarchy) है, जहाँ सत्ता कुछ गिने-चुने अमीर लोगों के हाथ में कैद हो जाती है।
73वां संशोधन: कागज़ पर जिंदा, ज़मीन पर मृत
73वां संविधान संशोधन पंचायतों को सशक्त बनाने, सहभागिता बढ़ाने और सामाजिक न्याय सुनिश्चित करने के लिए लाया गया था। इसका उद्देश्य था कि समाज के हर वर्ग—गरीब, दलित, महिला—को नेतृत्व का अवसर मिले। लेकिन जब चुनाव ही “फीस आधारित” हो जाए, तो:
समान अवसर खत्म हो जाता है
लोकतंत्र की जगह “पैसातंत्र” हावी हो जाता है
और पंचायतें जनता की नहीं, पैसे वालों की जागीर बन जाती हैं और बाद में भ्रष्टाचार की क्योंकि कोई निर्विरोध चुने प्रतिनिधियों से सवाल भी नही कर पाता क्योंकि विपक्ष का यहां अभाव होता है।
इसलिए असली खेल चुनाव के बाद शुरू होता है
कहानी यहीं खत्म नहीं होती, असली खेल तो जीत के बाद शुरू होता है।
मान लीजिए:
प्रधान ने 4 लाख “पर्ची” के लिए दिए
1-2 लाख के बकरे कटवाए
कुल खर्च = 5-6 लाख
जबकि 5 साल का कुल मानदेय= लगभग 4.2 लाख
यानी शुरुआत में ही 1-2 लाख का घाटा।
अब सवाल उठता है—
कोई व्यक्ति घाटे में क्यों जाएगा?
जवाब साफ है:
वह घाटा नहीं, “निवेश” करता है।
फिर 5 साल में क्या होता है?
एक आध स्कॉर्पियो या बोलेरो
घर पर एक मंजिल और
पौंटा या नाहन में जमीन
यानी पंचायत का विकास पीछे छूट जाता है, और “व्यक्तिगत विकास” तेज़ी से आगे बढ़ता है।
विकास नहीं, ‘वसूली तंत्र’
जब कुर्सी खरीदकर ली जाती है, तो वह सेवा का माध्यम नहीं रहती— वह वसूली का जरिया बन जाती है।
पंचायत अपने विकास के लिए फिर अगले 5 साल का इंतजार करने लगती है, पर्ची निकलेगी तो कुछ पैसा पंचायत को मिल जाये।
लोकतंत्र या लंगूरतंत्र?
सबसे बड़ा सवाल जनता से है—
आख़िर लोग यह सब बर्दाश्त क्यों कर लेते हैं?
जब लोग चुप रहते हैं, तो लोकतंत्र धीरे-धीरे “लंगूरतंत्र” में बदल जाता है—
जहाँ कुछ लोग खेल करते हैं और बाकी सिर्फ तमाशा देखते हैं।
“निर्विरोध” शब्द सुनने में अच्छा लगता है, लेकिन अगर उसके पीछे दबाव, पैसे और सौदेबाज़ी हो, तो वह लोकतंत्र नहीं—उसकी हत्या है।
जरूरत है: जागरूकता की, विरोध की, और सही को सही कहने की हिम्मत की क्योंकि अगर आज पंचायत बिकेगी,
तो कल पूरा लोकतंत्र गिरवी होगा।

