‘शिक्षा’ का अपमान और भ्रष्टाचार की ‘बोली’—तहसील कार्यालय में न्याय की नीलामी?
मूकनायक
महिपाल सिंह टंडन
सक्ती, छत्तीसगढ़
शासन-प्रशासन की उन कड़ियों पर प्रहार करें जहाँ भ्रष्टाचार की दीमक व्यवस्था को खोखला कर रही है। जिला सक्ती के तहसील भोथिया के अंतर्गत ग्राम धनुवारपारा में कोटवार नियुक्ति का मामला अब केवल एक ‘गलत चयन’ का मुद्दा नहीं रह गया है, बल्कि यह एक संगठित भ्रष्टाचार और शिक्षित युवाओं के भविष्य के साथ किए गए भद्दे मजाक का प्रमाण बन चुका है।
भीतरखाने की ‘बोली’ और पारदर्शिता का गला घोंटा गया
सूत्रों और तहसील कार्यालय के अंदरूनी साक्ष्यों से जो खबरें छनकर आ रही हैं, वे रूह कपा देने वाली हैं। चर्चा है कि इस नियुक्ति के लिए तहसीलदार के ‘बड़े बाबू’ द्वारा बाकायदा पर्दे के पीछे से बोली लगाई जा रही थी। विश्वसनीय सूत्रों का संकेत है कि यह नियुक्ति योग्यता के आधार पर नहीं, बल्कि ‘बड़ी कीमत’ और ‘ऊंचे सौदे’ के आधार पर तय की गई है।
हैरानी की बात यह है कि नियमतः भर्ती प्रक्रिया में शामिल सभी उम्मीदवारों को सूचित किया जाना अनिवार्य था, लेकिन यहाँ पारदर्शिता को ताक पर रखकर गोपनीय तरीके से “लेन-देन” के खेल को अंजाम दिया गया। यदि इस मामले की उच्च स्तरीय निष्पक्ष जांच (जैसे ACB या ईओडब्ल्यू) होती है, तो तहसीलदार और उनके बाबू के भ्रष्टाचार का काला चिट्ठा सार्वजनिक होने में देर नहीं लगेगी।
“दबैल नौकर” की तलाश या प्रशासनिक तानाशाही?
नियुक्ति आदेश की भाषा स्वयं तहसीलदार की कुंठित मानसिकता का प्रमाण दे रही है। आदेश में अप्रत्यक्ष रूप से यह दर्शाया गया है कि अधिक पढ़ा-लिखा व्यक्ति कोटवार के पद के लिए अनुपयुक्त है, क्योंकि प्रशासन को शायद ‘प्रतिभा’ नहीं बल्कि एक ऐसा ‘दबैल नौकर’ चाहिए जो उनके गलत निर्देशों पर सवाल न उठा सके।
यहाँ गंभीर सवाल खड़े होते हैं ,
अगर सरकार की नीति शिक्षित युवाओं को प्राथमिकता देने की है, तो तहसीलदार किस अधिकार से शिक्षा को ‘अयोग्यता’ घोषित कर रहे हैं?
क्या उच्च शिक्षा प्राप्त करना अपराध है? यदि कम पढ़ा-लिखा ही सर्वश्रेष्ठ है, तो सरकार करोड़ों रुपए खर्च कर शिक्षण संस्थान क्यों चला रही है?
स्थानीयता की अनदेखी: बाहरी को लाभ, निवासी को वनवास
एक और गंभीर अनियमितता यह है कि स्थानीय निवासी संजू कुमार टंडन, जो कि तकनीकी रूप से दक्ष और स्नातक हैं, उन्हें दरकिनार कर दिया गया। उनकी जगह एक गैर-राजस्व ग्राम के 8वीं पास उम्मीदवार को प्राथमिकता देना इस संदेह को पुख्ता करता है कि यह चयन केवल ‘आर्थिक लाभ’ और ‘निजी सेटिंग’ के आधार पर हुआ है।
न्याय की पुनर्स्थापना
यह सीधे तौर पर शासन और जिला प्रशासन को चेतावनी देता है कि शिक्षित युवाओं के धैर्य की परीक्षा न ली जाए।
1/उच्च स्तरीय जांच: तहसीलदार और संबंधित बाबू के कॉल रिकॉर्ड्स और संपत्तियों की जांच हो ताकि ‘बोली लगाने’ के आरोपों की पुष्टि हो सके।
2/ आदेश का खण्डन: “अधिक शिक्षा अयोग्यता है” जैसे हास्यास्पद और अपमानजनक तर्क वाले नियुक्ति आदेश को तत्काल खारिज किया जाए।
3/ पारदर्शिता:
नियुक्ति प्रक्रिया को फिर से ग्राम पंचायत प्रस्ताव को मंजूरी दी जाए और स्थानीय को प्राथमिकता,सार्वजनिक सूचना देकर और योग्यता के आधार पर पूर्ण किया जाए।
अगर योग्यता की बलि इसी तरह भ्रष्टाचार की वेदी पर चढ़ती रही, तो सरकारी दफ्तर केवल ‘बोली लगाने’ के केंद्र बनकर रह जाएंगे और शिक्षित युवा व्यवस्था से पूरी तरह मोहभंग कर लेंगे।
मुख्यमंत्री महोदय जी, क्या आपके सुशासन में ‘इंजीनियर’ से बेहतर ‘8वीं पास’ को सिर्फ इसलिए माना जाएगा क्योंकि वह ‘दबैल’ रह सके?



