मूकनायक न्यूज/ एम एसगौतम /सिरोही/राजस्थान।
सिरोही: राष्ट्रीय मूलनिवासी बहुजन कर्मचारी संघ ट्रेड यूनियन और भारत मुक्ति मोर्चा के तत्वावधान में रामदेव मंदिर उत्तरी मेघवाल समाज सिरोही अध्यक्षता सीईसी सदस्य RMBKS नई दिल्ली और बामसेफ प्रदेश महासचिव समन्वय राजस्थान सिरोही के तोलाराम फाचरिया और विशिष्ट अतिथि भारत मुक्ति मोर्चा के जिला उपाध्यक्ष मदनलाल चौहान एवं राष्ट्रीय आदिवासी एकता परिषद जिला कार्यकारी अध्यक्ष बाबूलाल मीणा रहे ।मान्यवर मदनलाल चौहान ने उद्बोधन में कहा किइतिहास साक्षी है कि जब-जब समाज के किसी वर्ग ने अपनी अस्मिता और गरिमा को खोया है, तब-तब किसी दूरदर्शी महापुरुष ने जन्म लेकर वैचारिक क्रांति का सूत्रपात किया है। आधुनिक भारत के सामाजिक और वैधानिक क्षितिज पर मान्यवर कांशीराम एक ऐसे ही प्रकाश-पुंज बनकर उभरे, जिन्होंने हाशिए पर खड़े करोड़ों लोगों को ‘संवैधानिक अधिकारों’ के प्रति सचेत कर उनमें स्वाभिमान का संचार किया।प्रदेश महासचिव तोलाराम फाचरिया ने कहा कि *वह रात, जिसने जीवन की दिशा बदल दी*पुणे की एक प्रयोगशाला में वैज्ञानिक के रूप में प्रतिष्ठित राजकीय सेवा करने वाले कांशीराम जी के जीवन में 1964 की वह रात एक वैचारिक मोड़ लेकर आई, जब उन्होंने बाबा साहेब डॉ. अम्बेडकर के क्रांतिकारी साहित्य का अध्ययन किया। उन कालजयी शब्दों ने उनके भीतर सामाजिक परिवर्तन की ऐसी अलख जगाई कि उन्होंने अपना संपूर्ण जीवन समाज के वंचित वर्गों के उत्थान हेतु समर्पित कर दिया। उनका यह त्याग निजी सुखों से ऊपर उठकर ‘लोक-कल्याण’ के प्रति उनकी अटूट प्रतिबद्धता का प्रतीक था। जिला कार्यकारी अध्यक्ष बाबूलाल मीणा ने कहा कि *संगठन से वैचारिक जागृति तक का सफर*साहेब कांशीराम का मानना था कि संगठित शक्ति ही सामाजिक न्याय का आधार है। उन्होंने BAMCEF (1978) के माध्यम से शिक्षित वर्ग को ‘Pay Back to Society’ (समाज को लौटाने का ऋण) का अनुपम मंत्र दिया। उन्होंने सिखाया कि बौद्धिक संपदा का उपयोग केवल व्यक्तिगत उन्नति के लिए नहीं, बल्कि सामूहिक उत्थान के लिए होना चाहिए। प्रकाश कुमार डांगी ने बताया कि DS-4 के माध्यम से उन्होंने सामाजिक समता के संदेश को जन-जन तक पहुँचाया।*लोकतांत्रिक सहभागिता के सिद्धांत*उनकी रणनीति सामाजिक न्याय पर आधारित थी। उन्होंने स्पष्ट किया कि लोकतंत्र में ‘भागीदारी’ ही वह माध्यम है जिससे सदियों की विषमता को समाप्त किया जा सकता है। *उनका नारा जिसकी जितनी संख्या भारी, उसकी उतनी हिस्सेदारी* वास्तव में भारतीय संविधान की प्रस्तावना में निहित ‘सामाजिक, आर्थिक और राजनीतिक न्याय’ का ही एक व्यावहारिक स्वरूप था। उन्होंने बहुजन समाज (SC, ST, OBC और अल्पसंख्यक) को एक वैचारिक सूत्र में पिरोकर उन्हें राष्ट्र निर्माण में अपनी भूमिका सुनिश्चित करने के लिए प्रेरित किया।अंत में लालाराम परमार ने सभी आभार व्यक्त करते हुए कहा कि9 अक्टूबर 2006 को यह मनीषी भले ही हमसे भौतिक रूप से विदा हो गया, लेकिन वे एक ऐसा विचार छोड़ गए जो आज भी प्रासंगिक है। उन्होंने हमें सिखाया कि लोकतंत्र में ‘जागरूकता’ ही वह साधन है जिससे समानता का लक्ष्य प्राप्त किया जा सकता है।आज साहेब की विरासत हमें आह्वान करती है कि हम शिक्षित हों, संगठित हों और संवैधानिक मूल्यों के संरक्षण के लिए तत्पर रहें। साहेब कांशीराम केवल एक व्यक्तित्व नहीं, बल्कि मानवीय गरिमा और सामाजिक न्याय का वह जीवंत आंदोलन हैं जो समतामूलक समाज की स्थापना का स्वप्न देखता है।इस अवसर पर वेलाराम डांगी, दिनेश कुमार, अशोक कुमार डांगी, किशन डांगी आदि महिला, विद्यार्थी सम्मिलित हुए ।

