मूकनायक/राष्ट्रीय प्रभारी ओमप्रकाश वर्मा
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मानव होने के नाते हमारी पहली और अंतिम पहचान ‘मनुष्यता’ है । जाति पूछना दरअसल हमारी वैचारिक दरिद्रता को दर्शाता है। जिस दिन हम एक-दूसरे को बिना किसी उपनाम या जाति के चश्मे के देखना शुरू कर देंगे, उसी दिन समाज वास्तव में शिक्षित और आधुनिक कहलाएगा। हमें यह समझना होगा कि श्रेष्ठता जन्म से नहीं, बल्कि कर्मों और विचारों से आती है। भारतीय संविधान जाति-आधारित भेदभाव को प्रतिबंधित करता है, फिर भी यह मानसिकता अभी भी विशेष रूप से ग्रामीण क्षेत्रों में मानसिक और सामाजिक रूप से मौजूद है।
संत रैदास ने सही कहा था कि “सभी मनुष्य एक ही ईश्वर की संतान हैं” और कोई भी जन्म से उच्च या निम्न नहीं है। जातिवाद को मिटाने के लिए यह आवश्यक है कि संकीर्ण मानसिकता को बदलकर तार्किक व मानवीय दृष्टिकोण विकसित हो क्योंकि सभी का खून एक है और कर्म ही व्यक्ति की पहचान है। मानव होने के नाते हमारी पहली पहचान ‘मनुष्य’ है, ना कि कोई जाति। शिक्षा शहरीकरण और तर्कसंगत सोच ही इस संकीर्ण मानसिकता को बदल सकती है। जब तक हम एक-दूसरे को केवल इंसान के रूप में नहीं देखेंगे, तब तक सच्चा सामाजिक विकास संभव नहीं है।
बिरदी चंद गोठवाल, नारनौल
प्रदेश प्रभारी मूकनायक, हरियाणा

