कलेक्टर – कमिश्नर की अनदेखी से बन रही ये स्थिति
मूकनायक | बुद्धप्रकाश बौद्घ
ग्वालियर। मध्यप्रदेश सरकार की किसान हितैषी मंशा ग्वालियर में ही अधर में लटकती दिख रही है। हाल ही में राज्य सरकार ने कैबिनेट में प्रस्ताव पारित कर सर्कुलर जारी किया था, जिसके तहत नायब तहसीलदार/तहसीलदारों को न्यायिक एवं गैर-न्यायिक कार्यों के लिए अलग-अलग जिम्मेदारियां सौंपने के निर्देश दिए गए थे। इसके लिए जिला कलेक्टरों को आदेश जारी करने को कहा गया था।प्रदेश के करीब दो दर्जन जिलों में कलेक्टरों ने आदेश लागू भी कर दिए हैं। प्रावधान के अनुसार, तहसीलदार को राजस्व न्यायालय में सुबह 10 से शाम 6 बजे तक उपस्थित रहकर किसानों एवं आम नागरिकों के प्रकरणों का निराकरण करना है, जबकि कार्यपालिक मजिस्ट्रेट को सौंपे गए थाना क्षेत्रों में कानून-व्यवस्था एवं अन्य जिम्मेदारियों का निर्वहन करना है।सरकार की मंशा थी कि तहसील कार्यालय में नियमित रूप से अधिकारी उपलब्ध रहें, ताकि किसानों को चक्कर न काटने पड़ें और उनके कार्य समय पर हो सकें। लेकिन हकीकत यह है कि जिन तहसीलदारों को राजस्व न्यायालय में बैठने के आदेश दिए गए हैं, वे भी दिनभर दफ्तर से नदारद रहते हैं।सूत्रों के मुताबिक, तहसीलदार कार्यालय में बैठने से बचते हैं ताकि सीधे किसानों के संपर्क में न आना पड़े। ऐसे में सरकार के आदेश कागज़ों तक ही सीमित रह गए हैं। सवाल यह है कि क्या कलेक्टर और कमिश्नर स्तर के अधिकारी अपने ही जारी किए गए आदेशों की मॉनिटरिंग नहीं कर रहे हैं? और आखिर क्यों राजस्व न्यायालय के अधिकारी दफ्तर में उपस्थित नहीं रहते?किसानों के हित में जारी यह व्यवस्था केवल आदेशों और सर्कुलरों तक ही सीमित रह गई है, जबकि जमीनी स्तर पर स्थिति जस की तस है।

