Thursday, February 26, 2026
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शिक्षक : मार्गदर्शक या अपमान का कारण ?

बचपन जीवन की सबसे कोमल अवस्था होती है। इस समय बच्चे का हृदय मिट्टी की तरह होता है, जिसमें शिक्षक अपने संस्कार, ज्ञान और मूल्यों की छाप छोड़ते हैं। लेकिन जब यह छाप प्रेम, प्रेरणा और प्रोत्साहन की बजाय अपमान, भेदभाव और हिंसा की हो, तो वह बच्चे की आत्मा को जीवनभर के लिए घायल कर देती है।

मैं स्वयं इस पीड़ा का साक्षी हूँ। यह घटना असवार जिला भिंड के स्कूल सरस्वती शिशु मन्दिर की है। जब मैं कक्षा पाँच का छात्र था, तब विद्यालय मेरे लिए ज्ञान का मंदिर नहीं, बल्कि अपमान का अखाड़ा बन गया था। मेरे शिक्षक मुझे बार-बार बच्चों के सामने अपमानित करते, जातिगत भेदभाव से भरे शब्द कहते, और तिरस्कार का भाव दिखाते। वे मुझे प्रार्थना सभा में सबके सामने खड़ा कर यह जताते— “देखो, यह पढ़ाई में कमजोर है, यह कुछ नहीं जानता।” एक बार तो स्थिति इतनी भयावह हो गई कि मैंने अपना होमवर्क दिखाने पर बेरहमी से पिटाई खाई और अपमान की तीव्रता में वहीं खड़ा-खड़ा मेरे कपड़े गीले हो गए। उस क्षण मैं केवल एक बच्चा नहीं रहा, बल्कि आत्मसम्मान खो चुका एक असहाय प्राणी बन गया। यह घटना मेरे लिए आज भी एक गहरा घाव है।

ऐसे शिक्षक समाज के लिए कलंक

ऐसे शिक्षक , शिक्षक नहीं, बल्कि समाज के लिए कलंक हैं। उनका व्यवहार शिक्षा के उद्देश्य को ही नष्ट कर देता है। शिक्षा का मंदिर यदि जातिवाद, अपमान और हिंसा से भर जाए, तो वह मंदिर नहीं, एक कारागार बन जाता है।

कैसा हो सच्चा शिक्षक ?

वह जो कमजोर से कमजोर छात्र को भी प्रोत्साहन दे।जो बच्चे को प्रश्न करने और सोचने का साहस दे। जो जातिवाद और भेदभाव से ऊपर उठकर केवल मानवता और ज्ञान की दृष्टि से बच्चों को देखे।जो बच्चों के मन में आत्मविश्वास का दीप जलाए, न कि भय और हीनभावना का अंधेरा भर दे।हर बच्चा अपनी एक विशिष्ट प्रतिभा लेकर आता है।

शिक्षक का कर्तव्य है कि वह उस प्रतिभा को पहचानकर उसे संवारें। अपमान और भेदभाव से बच्चे टूटते हैं, लेकिन प्रोत्साहन और सहानुभूति से वे उड़ान भरते हैं। सच्चा शिक्षक वही है, जो अपने विद्यार्थियों के जीवन में प्रेरणा बनकर उतरता है, न कि उनके मन पर घाव छोड़ जाता है।- बुद्धप्रकाश बौद्ध पत्रकार दबोह भिंड

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